विधानसभा सचिवालय में कुर्सी चढ़ती गई, नियम झुकते गए? दिनेश शर्मा के करीबी मनीष शर्मा की 17 साल की पदोन्नति पटकथा 2004 की नियुक्ति से 2021 के लेवल-14 तक, कहीं नियमों ने रास्ता बनाया, कहीं रास्ते ने नियम!

 

रायपुर – विधानसभा सचिवालय में कुर्सियां सिर्फ चार पायों पर नहीं टिकतीं, कभी-कभी सवालों के चार दस्तावेजों पर भी टिक जाती हैं। मनीष कुमार शर्मा की 2004 से 2021 तक की पदयात्रा अब ऐसी ही एक कहानी बन गई है। RTI में मिली जानकारी, छत्तीसगढ़ राजपत्र और विधानसभा सचिवालय के सरकारी आदेशों को जोड़ें तो सवाल उठता है कि यह सामान्य पदोन्नति थी या नियमों के बदलते रास्तों से बनी एक खास राह? कहानी शुरू होती है 14 दिसंबर 2004 से उपलब्ध रिकॉर्ड में मनीष शर्मा की नियुक्ति सत्कार अधिकारी के पद पर दर्ज है। उस समय इस पद पर लागू भर्ती व्यवस्था, चयन प्रक्रिया और नियुक्ति का आधार अब इस पूरे मामले की पहली अहम कड़ी है। क्योंकि इसके करीब 14 साल बाद तस्वीर बदलती है।

2018 में नियम आए, विज्ञापन निकला सवाल पुरानी नियुक्ति पर –
20 जुलाई 2018 के छत्तीसगढ़ राजपत्र में विधानसभा सचिवालय के भर्ती एवं सेवा शर्तों में संशोधन हुआ और सत्कार अधिकारी पद की अर्हता तय की गई। इसके बाद 30 अगस्त 2018 को इसी पद पर सीधी भर्ती का विज्ञापन भी जारी हुआ। यानी 2004 की नियुक्ति के करीब 14 साल बाद पद की नियमबद्ध भर्ती व्यवस्था दस्तावेजों में साफ दिखाई देती है। सवाल यह है कि 2004 में मनीष शर्मा की नियुक्ति किस नियम के तहत हुई थी और 2018 में उसी पद के लिए नई नियमबद्ध भर्ती की जरूरत क्यों पड़ी? अगर 2004 में भी नियम थे तो उनकी मूल प्रति, विज्ञापन और पूरी चयन फाइल सामने आनी चाहिए।

अड़चन के बाउजूद खुलता गया रास्ता –
RTI से मिली शिकायत संबंधी सामग्री के अनुसार, मनीष शर्मा वरिष्ठता सूची में काफी नीचे थे और सत्कार/प्रोटोकॉल अधिकारी के पद से आगे बढ़कर अवर सचिव तक पहुंचने का उनके लिए कोई पदोन्नति मार्ग ही नहीं था। ऐसे में उनकी पदोन्नति की राह स्वाभाविक रूप से सीमित दिखाई देती थी। इसके बाद व्यवस्था में बदलाव आया और अवर सचिव (सत्कार/प्रोटोकॉल) के पद का रास्ता सामने आया। आगे चलकर इस पद पर पदोन्नति के लिए पात्रता का दायरा भी बढ़ाया गया और अन्य अधिकारियों को भी इसके दायरे में लाया गया। यहीं से मामले की टाइमलाइन महत्वपूर्ण हो जाती है। शिकायत में दावा किया गया है कि यदि यह पात्रता पहले से लागू होती तो वरिष्ठ अधिकारियों की उपलब्धता के कारण मनीष शर्मा की पदोन्नति की स्थिति अलग हो सकती थी। यानी पहले जिस रास्ते पर आगे बढ़ने की गुंजाइश सीमित थी, बाद की व्यवस्था में उसी दिशा में एक नया पद और पात्रता का रास्ता सामने आया और फिर इसी बदली हुई व्यवस्था के बाद मनीष शर्मा की पदयात्रा आगे बढ़ती है।यह बदलाव सामान्य प्रशासनिक जरूरत का हिस्सा था या इससे किसी की पदोन्नति की राह आसान हुई?

7 दिसंबर 2021 अवर सचिव से लेवल-14 के संचालक तक –
बदली हुई व्यवस्था के बाद मनीष शर्मा की पदोन्नति यात्रा यहीं नहीं रुकी 7 दिसंबर 2021 के विधानसभा सचिवालय के आदेश ने इस पूरी कहानी को एक निर्णायक पड़ाव पर पहुंचा दिया। आदेश के मुताबिक तत्कालीन अवर सचिव (सत्कार) मनीष कुमार शर्मा को संचालक, पुस्तकालय, अनुसंधान एवं संदर्भ के पद पर पदोन्नत किया गया जबकिं ऐसा न तो कोई नियम न प्रावधान, यानी जिस यात्रा की शुरुआत 14 दिसंबर 2004 को सत्कार अधिकारी के पद से हुई थी, वह 17 साल बाद लेवल-14 के संचालक तक पहुंच चुकी थी। सत्कार अधिकारी से अवर सचिव और फिर संचालक पद ऊपर बढ़ते गए, लेकिन इस पूरी यात्रा के बीच बदले नियमों और पदोन्नति की प्रक्रिया ने अब कई सवाल खड़े कर दिए हैं। साथ ही वरिष्ठ अधिकारियों की पदोन्नति छह से आठ महीने तक लंबित रखा गया। मामला सिर्फ एक अधिकारी की पदोन्नति का नहीं है बल्कि वरिष्ठता और पूरी पदोन्नति व्यवस्था की निष्पक्षता का भी है।

कुर्सी चढ़ती गई, सवाल बढ़ते गए
सत्कार अधिकारी से अवर सचिव और फिर लेवल-14 के संचालक तक कुर्सी लगातार ऊपर जाती रही। लेकिन इस सफर के हर पड़ाव के साथ एक सवाल भी जुड़ता गया।
RTI से मिली जानकारी में इस पदोन्नति की प्रक्रिया और नियमों की स्पष्टता पर सवाल उठाए गए हैं। वरिष्ठ अधिकारियों की पदोन्नति लंबित रखे जाने का आरोप भी इसी सामग्री में दर्ज है। पूरे घटनाक्रम को एक साथ देखें तो तस्वीर कुछ यूं बनती है 2004 में सत्कार अधिकारी, 2018 में राजपत्र में नियम और उसी पद के लिए सीधी भर्ती। इसके बाद अवर सचिव (सत्कार/प्रोटोकॉल) तक पहुंचने का नया रास्ता, 2021 में अवर सचिव से लेवल-14 के संचालक तक यानी 17 साल की इस यात्रा में पद बदलते गए, पात्रता की तस्वीर बदलती गई और नियमों में भी बदलाव सामने आते गए लेकिन मनीष शर्मा की कुर्सी लगातार ऊपर जाती रही। क्या यह महज प्रशासनिक संयोगों की श्रृंखला थी, या हर पड़ाव ने अगले पड़ाव का रास्ता आसान किया? इसका जवाब आरोपों से नहीं, नियुक्ति और पदोन्नति की पूरी फाइल, नोटशीट और लागू नियमों से मिलना चाहिए।

दिनेश शर्मा की कुर्सी पर भी सवाल –
दिलचस्प यह है कि विधानसभा सचिव दिनेश शर्मा खुद भी पहले से सवालों के घेरे में रहे हैं। 2024 में विधानसभा सचिवालय की भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं को लेकर उनके खिलाफ परिवाद पेश किए जाने की रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। मार्शल भर्ती प्रक्रिया को लेकर भी उनके कार्यकाल में गंभीर आरोप और विवाद सामने आए हैं। यानी एक तरफ सचिव की अपनी कुर्सी पर पुराने सवाल, दूसरी तरफ करीबी बताए जाने वाले अधिकारी की नियुक्ति-पदोन्नति की यह नई दस्तावेजी कहानी पुरानी भर्ती पर सवालों की फाइल बंद भी नहीं हुई और अब पदोन्नति की नई कहानी सामने है।

भूमिका पर सवाल –
मनीष शर्मा को विधानसभा सचिव दिनेश शर्मा का करीबी बताया जाता है। ऐसे में इस पूरी प्रक्रिया में उनकी भूमिका को लेकर भी सवाल उठते हैं। नियम-संशोधन से लेकर पदोन्नति तक संबंधित फाइलों में किस स्तर पर क्या निर्णय हुए, इसका जवाब मूल नोटशीट और रिकॉर्ड ही दे सकते हैं।

स्पीकर की चुप्पी –
विधानसभा सचिवालय में नियुक्ति से लेकर पदोन्नति तक के फैसले यदि सवाल खड़े कर रहे हैं, तो विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह की जवाबदेही से भी इसे अलग नहीं किया जा सकता क्या मनीष शर्मा की 2004 की नियुक्ति से लेकर 2021 की लेवल-14 पदोन्नति तक की पूरी प्रक्रिया की कभी स्वतंत्र समीक्षा हुई? यदि नहीं, तो क्यों? और क्या अध्यक्ष ने यह जानने की कोशिश की कि उनके सचिवालय में दिनेश शर्मा के करीबी बताए जाने वाले अधिकारी की नियुक्ति और पदोन्नति की राह किन नियमों से बनी? जब विधानसभा सचिवालय पर सवाल उठते हैं, तो जवाबदेही सिर्फ सचिव की है या अध्यक्ष की भी? अगर पूरी प्रक्रिया नियमसम्मत है तो फाइल सार्वजनिक हो, नोटशीट सामने आए और दूध का दूध, पानी का पानी हो जाए। क्योंकि विधानसभा की गरिमा सिर्फ सदन में भाषणों से नहीं, उसके सचिवालय में होने वाले फैसलों की पारदर्शिता से भी तय होती है।

अंतिम सवाल क्या मनीष शर्मा ने कुर्सी पाई या कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता बनाया गया? अब जवाब विधानसभा सचिवालय, दिनेश शर्मा और विधानसभा अध्यक्ष तीनों को देना चाहिए।

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