कलेक्टर साहब की दूसरी परीक्षा, फाइलों से निकला अफसर अब राजनीति की लंबी रेस में, सुधार, निवेश और 2028 की कसौटी –

रायपुर – छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक ऐसा अफसर है, जिसने 2005 में IAS की परीक्षा पास की, दंतेवाड़ा से रायपुर तक कलेक्टरी की, शिक्षा और प्रशासन में पहचान बनाई और करीब 13 साल की सेवा के बाद राजनीति का रास्ता चुना। पहली राजनीतिक परीक्षा में खरसिया ने रोक दिया, लेकिन पांच साल बाद रायगढ़ ने 64,443 वोट की बढ़त देकर तस्वीर बदल दी। 2023 में इससे बड़ी जीत प्रदेश में सिर्फ एक सीट पर हुई थी। यानी पहली हार के बाद वापसी सिर्फ वापसी नहीं थी, राजनीतिक वजन बढ़ने की घोषणा थी।

वित्त की कुर्सी, और उससे बड़ा कैनवास –
अब वही चेहरा वित्त के साथ वाणिज्यिक कर, आवास एवं पर्यावरण, योजना तथा आर्थिक एवं सांख्यिकी जैसे विभाग संभाल रहा है। यानी सरकार की कमाई, खर्च, निवेश, योजना, शहर और आंकड़ों का एक बड़ा हिस्सा इसी मेज से होकर गुजरता है। छत्तीसगढ़ में IAS से राजनीति तक का रास्ता अजीत जोगी पहले बना चुके हैं। मगर दोनों दौर की राजनीति अलग है। जोगी ने अफसरी की पहचान को धीरे-धीरे संगठन, सामाजिक समीकरण और सत्ता के राजनीतिक व्याकरण में बदला। आज का प्रयोग ज्यादा डेटा, तकनीक और नीति को राजनीतिक पूंजी बनाने वाला दिखाई देता है। लेकिन यहां एक महीन फर्क है। अफसर के पास फाइल होती है, नेता के पास वही फाइल पढ़ने वाला आदमी अफसर आदेश लागू करा सकता है, नेता को उसके असर की जिम्मेदारी भी उठानी पड़ती है। यानी अब सिर्फ अफसर अच्छा होना काफी नहीं। जनता के लिए काम करना, लोगों की उम्मीद को अपनी जिम्मेदारी समझना और फैसले का परिणाम सामने रखना यही अगली परीक्षा है।

रजिस्ट्री से निकला पहला सबक –
पंजीयन में डिजिटल व्यवस्था, सुगम जैसे प्रयोग और प्रक्रिया आसान करने की कोशिशें हुईं। पुरानी कागजी व्यवस्था से बाहर निकलने की दिशा निश्चित रूप से बदलाव है। लेकिन गाइडलाइन दरों ने दूसरा चेहरा भी दिखाया। सरकार ने इसे पुराने मूल्यांकन को वास्तविक बाजार के करीब लाने की कवायद बताया, जबकि प्रभावित वर्गों और विरोधियों ने कई जगह इसे अतिरिक्त बोझ माना। यहीं प्रशासनिक सुधार का असली अर्थ निकलता है। सुधार वही नहीं जो फाइल में अच्छा दिखे, सुधार वह है जिसकी शिकायत सुनने की व्यवस्था भी तेज हो। तकनीक लगाने से सिस्टम आधुनिक हो सकता है, लेकिन जनता का अनुभव बेहतर हुआ या नहीं, इसका जवाब जमीन ही देती है।

डेटा से आगे परिणाम –
वित्तीय तंत्र में IFMIS Next Gen जैसी व्यवस्था डेटा आधारित निर्णयों की दिशा में कदम है। लेकिन डैशबोर्ड यह बता सकता है कि पैसा कितना खर्च हुआ यह नहीं बता सकता कि उस पैसे से गांव में क्या बदला। इसलिए अगली छलांग ‘डेटा सरकार’ से ‘परिणाम सरकार’ की होनी चाहिए। बजट में घोषणा हो तो उसके साथ समयसीमा भी दिखे। पैसा निकले तो काम की स्थिति भी दिखे। परियोजना बने तो रोजगार का आंकड़ा भी सामने आए। इससे आंकड़ा भाषण नहीं रहेगा, सरकार का रिपोर्ट कार्ड बन जाएगा।

सेमीकंडक्टर से लेकर निवेश तक –

नवा रायपुर में सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर और नई तकनीक के निवेश की दिशा बन रही है। राज्य की निवेश नीति भी अब पारंपरिक खनन-स्टील से आगे IT, डेटा सेंटर, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और दूसरे उभरते क्षेत्रों को जगह दे रही है। यह छत्तीसगढ़ के लिए बड़ा मोड़ हो सकता है। लेकिन सेमीकंडक्टर की फैक्ट्री लग जाए और छत्तीसगढ़ का बच्चा सिर्फ गेट पर नौकरी का इंतजार करे तो तस्वीर अधूरी रहेगी। स्किलिंग, स्थानीय विश्वविद्यालय, रिसर्च, MSME सप्लायर और उद्योग को एक ही श्रृंखला में जोड़ना होगा। निवेश आए और स्थानीय हुनर पीछे रह जाए तो विकास आधा रह जाएगा। निवेश के बड़े प्रस्तावों की चर्चा हो रही है। सरकार का निवेश पोर्टल भी सेमीकंडक्टर, AI, डेटा सेंटर और उभरती तकनीक को प्राथमिकता वाले क्षेत्र के रूप में आगे बढ़ा रहा है। लेकिन असली कहानी MoU के बाद शुरू होती है। कंपनी कब जमीन पर आई? मशीन कब लगी? उत्पादन कब शुरू हुआ? स्थानीय युवक को नौकरी कब मिली? निवेश की प्रेस रिलीज एक दिन की खबर है, रोजगार का आंकड़ा पांच साल की राजनीति की दिशा तय करेगा। विदेश यात्रा भी इसी कसौटी पर देखी जानी चाहिए। निवेशकों से मिलना जरूरी है, मगर लौटने के बाद उसका हिसाब भी जरूरी है कौन आया, कितना लगाया, कितने रोजगार बने? दौरे कम करने की जरूरत नहीं। दौरों का ऑडिट करने की जरूरत है।

अब अफसर नहीं, नेता बनना होगा –
शायद इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है। अफसरी छोड़ना और अफसरी की मानसिकता छोड़ना दो अलग बातें हैं। फाइल पर तर्क मजबूत होना चाहिए, लेकिन जनता के बीच संवाद उससे भी मजबूत। आलोचक और विरोधी अगर बेहतर जवाब मांगते हैं तो उसका जवाब और आंकड़े गिनाकर नहीं, नतीजे दिखाकर दिया जा सकता है और यहां इस चेहरे के पास मौका भी बड़ा है। भाजपा इतनी आसानी से किसी नए राजनीतिक चेहरे को वित्त जैसे महत्वपूर्ण विभाग नहीं सौंपती। इसलिए इस भरोसे का जवाब भी सामान्य राजनीतिक प्रदर्शन से नहीं, असाधारण परिणामों से देना होगा।

रायगढ़ की जमीन, रायपुर की राजनीति –
2023 का 64 हजार वाला जनादेश अब इतिहास है। 2028 की जमीन अलग होगी। रायगढ़ में अब लोग सिर्फ यह नहीं देखेंगे कि उनका विधायक कितना बड़ा मंत्री बना। वे यह भी देखेंगे कि मंत्री बनने के बाद उनका अपना आदमी कितना उपलब्ध रहा कार्यकर्ता देखेगा उसकी सुनवाई कितनी है। संगठन देखेगा राजनीतिक रिश्ते कितने मजबूत हैं और जनता देखेगी कि विकास का फायदा किस तक पहुंचा। यही वह मोड़ है जहां टेक्नोक्रेट को राजनेता बनना पड़ता है। अफसर टीम पद से बनाता है, नेता टीम भरोसे से बनाता है।

सामाजिक समीकरण की अपनी कहानी –
छत्तीसगढ़ की राजनीति में OBC समाज कोई छोटा चुनावी अंक नहीं है। ऐसे में OBC पृष्ठभूमि से आने वाला शिक्षित, प्रशासनिक अनुभव वाला और ग्रामीण-शहरी दोनों समाज की भाषा समझने वाला चेहरा भाजपा के लिए निश्चित रूप से उपयोगी राजनीतिक पूंजी बन सकता है। लेकिन जाति सिर्फ दरवाजा खोल सकती है, घर नहीं बना सकती। घर बनाने के लिए समाज से संवाद चाहिए, कार्यकर्ता का भरोसा चाहिए और जमीन पर लगातार मौजूदगी चाहिए। यही कारण है कि रायगढ़ से आगे की राजनीति में सामाजिक पहचान से ज्यादा सामाजिक स्वीकार्यता महत्वपूर्ण होगी। यहीं असली खेल है। इस चेहरे के पास दुर्लभ मेल है अफसर का अनुभव, बड़ा चुनावी जनादेश, वित्त की जिम्मेदारी, आंकड़ों की समझ और नई अर्थव्यवस्था की सोच। लेकिन यही मॉडल उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी है। बहुत ज्यादा अफसरी दूरी पैदा कर सकती है। बहुत ज्यादा आंकड़े जमीन की आवाज दबा सकते हैं। बहुत तेजी से ऊपर उठना संगठन को असहज कर सकता है और बड़े निवेश अगर रोजगार में नहीं बदले तो वही आंकड़े एक दिन सवाल बन सकते हैं।
इसलिए अब फैसले सिर्फ फाइल देखकर नहीं, स्वविवेक और राजनीतिक संवेदना दोनों से लेने होंगे।

यह छत्तीसगढ़ की माटी का वह आदमी है जो किसानी को समझता है, अर्थशास्त्र पढ़ सकता है, नियम जानता है और राजनीति के पैंतरे भी अब सीख चुका है। अब जरूरत है कि अफसर वाली संकोची दूरी से आगे बढ़कर मुखर नेता वाली मौजूदगी दिखाई दे रामायण में विभीषण को लंका का नक्शा मालूम था। लेकिन नक्शा जानना और पूरी सेना को उसके मुताबिक चलाना दो अलग बातें है।

इस चेहरे को व्यवस्था का नक्शा मालूम है। अब राजनीति उससे दूसरा हुनर मांग रही है लोगों को उस रास्ते पर साथ लेकर चलने का और शायद यहीं से यह कहानी सिर्फ एक मंत्री की नहीं रह जाती अगर प्रशासनिक दक्षता को राजनीतिक संवेदना, निवेश को रोजगार, आंकड़ों को परिणाम और संगठन को भरोसे से जोड़ दिया गया, तो एक अकेला चेहरा भी सूबे की राजनीति को विकास की नई दिशा देने की क्षमता रख सकता है। लंबी रेस का घोड़ा सिर्फ तेज नहीं दौड़ता। वह रास्ता पहचानता है, साथी बचाकर रखता है और सही मोड़ पर अपनी पूरी ताकत लगाता है।

2028 में हिसाब सिर्फ यह नहीं होगा कि कलेक्टर साहब कितनी दूर पहुंचे। हिसाब यह भी होगा कि उनके साथ कितने लोग पहुंचे और छत्तीसगढ़ कितना आगे गया।

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