कुर्सी छूटी, लेकिन कुर्सी की तलाश नहीं पूर्व वन प्रमुख श्रीनिवासन राव के कार्यकाल भ्रष्टाचार और घोटालों की फाइलें और सेवानिवृत्ति के बाद की जद्दोजहद –

कुर्सी छूटी, लेकिन कुर्सी की तलाश नहीं पूर्व वन प्रमुख श्रीनिवासन राव के कार्यकाल भ्रष्टाचार और घोटालों की फाइलें और सेवानिवृत्ति के बाद की जद्दोजहद –

रायपुर – छत्तीसगढ़ वन विभाग के पूर्व प्रमुख रहे आईएफएस श्रीनिवासन राव भले ही सेवानिवृत्त हो चुके हों, लेकिन उनके कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार और घोटालो की फाइलें आज भी विभाग और सरकार के सामने सवाल बनकर खड़ी हैं। इनके कार्यकाल में हुए कैम्पा फंड का दुरुपयोग , तेंदूपत्ता बोनस घोटाला, वन रक्षक भर्ती घोटाले से लेकर विभागीय निर्णयों को लेकर उठे विवादों के बीच अब चर्चा इस बात की भी है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी राव विभिन्न बोर्ड, आयोग और संस्थाओं में जगह पाने के लिए लगातार क्यो जद्दोजहद कर रहे है?

सात अधिकारियों को सुपरसीड कर मिली थी कमान –
वर्ष 2023 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने सात वरिष्ठ आईएफएस अधिकारियों को सुपरसीड कर श्रीनिवासन राव को वन विभाग का प्रमुख बनाया था। उस समय इसे कांग्रेस सरकार का बड़ा और विवादास्पद फैसला माना गया था। विभाग के भीतर भी इस नियुक्ति को लेकर चर्चाओं का दौर चला था। फिर शुरू हुआ इनके कार्यकाल में विवादों का दौर राव के कार्यकाल में कैम्पा फंड के उपयोग, विभागीय निर्माण कार्यों, तेंदूपत्ता बोनस वितरण और वन रक्षक भर्ती प्रक्रिया को लेकर ट्रांसफर पोस्टिंग तक हर जगह यह अफ़सर भ्रष्टाचार के आकंठ तक डूब चुके थे। वन रक्षक भर्ती मामले में विभागीय दस्तावेज बताते हैं कि भर्ती प्रक्रिया के दौरान हजारों अभ्यर्थियों की लंबी कूद का परीक्षण डिजिटल प्रणाली के साथ-साथ मैनुअल तरीके से कराया गया तथा हजारों अभ्यर्थियों का परीक्षण कृत्रिम प्रकाश में भी हुआ। बाद की फाइल नोटिंग में इन प्रक्रियाओं को भर्ती नियमों के अनुरूप नहीं माना गया।
इसी भर्ती प्रक्रिया को लेकर अधिवक्ता विजय मिश्रा ने शिकायत की और आरटीआई के माध्यम से दस्तावेज सामने लाए। वहीं पूर्व मंत्री ननकी राम कंवर ने भी प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृहमंत्री को पत्र भेजकर विभिन्न मामलों में जांच की मांग की थी।

दिलचस्प बात यह रही कि जिन श्रीनिवासन राव को तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने सात वरिष्ठ आईएफएस अधिकारियों को सुपरसीड कर वन विभाग की कमान सौंपी थी, वे सत्ता परिवर्तन के बाद भी अपने पद पर बने रहे। दिसंबर 2023 में भाजपा सरकार बनने के बाद भी लगभग ढाई वर्ष तक वे वन विभाग के सर्वोच्च पद पीसीसीएफ (HOFF) पर बने रहे। ऐसे में यह सवाल भी उठता रहा कि जिन मामलों को लेकर विपक्ष में रहते हुए भाजपा सवाल उठाती थी, उन्हीं विवादों के बीच राव की कुर्सी आखिर इतनी मजबूत कैसे बनी रही।

सेवानिवृत्ति के बाद शुरू हुई नई कवायद –
कांग्रेस शासनकाल में मिली ताकत और भाजपा शासनकाल में भी बनी रही स्वीकार्यता ने राव को लंबे समय तक प्रभावशाली बनाए रखा। लेकिन जैसे ही वन विभाग की कमान नए हाथों में गई और सेवानिवृत्ति के बाद का दौर शुरू हुआ, वैसे ही विभिन्न बोर्ड, परिषद और संस्थाओं में नई भूमिका तलाशने की कवायद तेज हो गई। सूत्र बताते है कि पहले राव ने पर्यावरण संरक्षण मंडल में जिम्मेदारी पाने की कोशिश की लेकिन बताया जाता है कि मंत्री ओपी चौधरी इस विवादित अफसर से मिलना तक उचित नही समझा। जब यहां दरवाजा बंद हुआ तब राव ने छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद अपनी जोर आजमाइश लगाई लेकिन यहाँ भी इन्हें उल्टे पांव ही वापस लौटना पड़ा। बताते है कि मंत्री विजय शर्मा ने इन्हें रत्ती भर का भाव नही दिया। इसके बाद नागपुर संघ कार्यालय से फोन करवाया गया और गौ सेवा आयोग में जगह तलाशनी शुरू हुई लेकिन जब इस अधिकारी का फीडबैक लिया गया तो यहाँ से लेकर नागपुर तक इस अफसर को फटकार लगाई गई।

विभागीय और राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी रही कि विभिन्न स्तरों पर संपर्क साधे गए, लेकिन कही से भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिला। लेकिन यह विवादित अफसर अब भी जी तोड़ मेहनत में लगा हुआ है कि कही तो जगह बनेगी। और यह प्रयास अब भी जारी है।

चर्चा यह भी है कि कुछ वरिष्ठ मंत्रियों और प्रभावशाली लोगों तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश की जा रही है , लेकिन सुत्र तस्दीक करते है कि सरकार के लगभग महत्वपूर्ण चेहरों ने इस विवादित अफसर से दूरी बनाए रखना ही बेहतर समझा। विभागीय लोग बताते है कि साहब रिटायरमेंट से पहले कहते थे कि

“हम एक जून को झोला उठाएगा और सीधे हैदराबाद निकल जाएगा।”

लेकिन एक जून गुजर गई, दूसरा पहर भी बीत गया और हैदराबाद जाने के बजाय साहब अब भी रायपुर के सत्ता गलियारों में नई जिम्मेदारी की तलाश में सक्रिय बताए जा रहे हैं। ऐसे में विभागीय हलकों में तंज भी सुनाई दे रहा है कि झोला तो तैयार हो गया, लेकिन कुर्सी की तलाश अभी खत्म नहीं हुई।

क्यों जरूरी थी नई कुर्सी?
वन विभाग के भीतर चर्चा का सबसे बड़ा विषय यही है। आखिर सेवानिवृत्ति के बाद यह अफसर आखिर क्यों किसी न किसी पद पर बने रहने की इतनी कोशिशें में लगा हुआ है। जानकार बताते है कि इस अफसर के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार की लंबी चौड़ी फेहरिश्त है अगर उक्त मामले में जांच हुई तो यह अफसर जेल की सलाखों के पीछे नजर आएगा लिहाजा यह अफ़सर कैसे भी नई कुर्सी चाहता है ताकि अपने काले कारनामो पर पर्दा डाल सके। इनके कार्यकाल में लंबी शिकायते जांच की मांग और विवाद मौजूद हो , तब पद पर बने रहने या किसी नई जिम्मेदारी में बने रहने से प्रभाव और पहुंच दोनों कायम रहती है।
यही वजह है कि विभागीय गलियारों में यह सवाल लगातार पूछा जा रहा है कि क्या यह सिर्फ सार्वजनिक जीवन में सक्रिय बने रहने की इच्छा थी या फिर कार्यकाल से जुड़ी फाइलों और विवादों की वजह से पद की आवश्यकता महसूस की जा रही थी।

अब निगाहें जांच और फाइलों पर – 
वन रक्षक भर्ती से जुड़े दस्तावेज, कैम्पा फंड पर उठे सवाल और विभिन्न शिकायतें, कहते है कि लूट के पैसे से घर नही बनता लेकिन सरकार चाह ले और कोई अधिकारी सरकार का एजेंट बन जाएं तो घर ही नही पूरा का पूरा साम्राज्य खड़ा हो सकता है। इसी का जीता जागता उदाहरण है श्रीनिवासन राव जिसने कैम्पा फंड और वन प्रमुख रहते हुए हैदराबाद में लगभग 25 करोड़ की लागत से आलीशान बंगला , कई शॉपिंग मॉल , लक्जरी गाड़ियों का काफिले के साथ कई सौ करोड़ की बेनामी संपत्ति बनाई है। इतना ही नई कई स्कूल और छत्तीसग़ढ़ की जनता की गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा साउथ भारत मे इन्वेस्ट किया गया है। अगर उक्त मामले की जांच हो जाए तो यह स्पष्ट होगा कि राज्य के बजट का एक बड़ा हिस्सा इस अधिकारी ने ही डकार लिया है। इस लूट और घोटाले की रकम से इसने आज पूरा का पूरा साम्राज्य खड़ा कर दिया है। इधर विभागीय रिकॉर्ड करोड़ो की लंका है और दूसरी तरफ सेवानिवृत्ति के बाद पद पाने की कोशिशों ने पूरे मामले को नया राजनीतिक रंग दे दिया है।

अब देखने वाली बात यह होगी कि सरकार इन शिकायतों और फाइलों को सिर्फ पुराने विवाद मानकर छोड़ देती है या फिर उन मामलों की स्वतंत्र जांच कराकर स्थिति स्पष्ट करती है जिनकी गूंज आज भी वन विभाग के गलियारों में सुनाई दे रही है।

 

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