छत्तीसगढ़ PSC-2003 घोटाला 20 लाख नहीं दिए तो करियर खत्म के आरोपों के बीच 20 साल की लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट में, जहां अंतिम अध्याय लिखा जाना बाकी – पढ़िए पूरी कहानी

छत्तीसगढ़ PSC-2003 घोटाला 20 लाख नहीं दिए तो करियर खत्म के आरोपों के बीच 20 साल की लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट में, जहां अंतिम अध्याय लिखा जाना बाकी – पढ़िए पूरी कहानी
रायपुर : छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (PSC) परीक्षा-2003 से जुड़ा कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं का मामला एक बार फिर चर्चा में है। इस मामले में लंबे समय से न्यायिक लड़ाई लड़ रहे याचिकाकर्ताओं ने स्पष्ट कहा है कि वे किसी भी समझौते या सेटलमेंट के पक्ष में नहीं हैं और इस पूरे प्रकरण का अंतिम निर्णय अब केवल सुप्रीम कोर्ट से ही चाहते हैं।
करीब दो दशक पुराने इस मामले में याचिकाकर्ताओं कु. वर्षा डोंगरे, संतोष कुमार कुंजाम, चमन सिन्हा और रविन्द्र सिंह ने वर्ष 2006 में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में रिट याचिका क्रमांक 4028/2006 सहित अन्य याचिकाएं दायर कर PSC परीक्षा-2003 में भ्रष्टाचार, अनियमितता और चयन प्रक्रिया में पक्षपात के आरोप लगाए थे।
इसी प्रकरण में चयनित पक्षों की ओर से दायर अपीलों में चंदन संजय त्रिपाठी एवं अन्य नाम भी सामने आए, जिनका उल्लेख बाद में केंद्र सरकार की अधिसूचनाओं और सुप्रीम कोर्ट में लंबित सिविल अपीलों में दर्ज हुआ। यही कारण है कि यह मामला केवल कुछ अभ्यर्थियों की शिकायत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि चयनित अधिकारियों, राज्य सरकार और न्यायिक व्यवस्था से जुड़ा व्यापक विवाद बन गया।
8 साल तक वकील लड़े, फिर खुद करनी पड़ी पैरवी –
याचिकाकर्ताओं के अनुसार शुरुआती वर्षों में अधिवक्ताओं के माध्यम से मामले की पैरवी की गई, लेकिन आर्थिक कठिनाइयों और प्रकरण की जटिलताओं के कारण वर्ष 2013 के बाद उन्हें स्वयं अदालत में अपना पक्ष रखना पड़ा। उन्होंने दावा किया कि सुनवाई के दौरान कई असामान्य परिस्थितियां सामने आईं। उनके अनुसार छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के कई न्यायाधीशों ने तकनीकी कारणों से सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया था।
इसके बाद उन्होंने मामले को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट जबलपुर स्थानांतरित करने तक का आवेदन दिया। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि न्यायालय के बाहर भी मामले के सेटलमेंट के प्रयास हुए और उन्हें समझौते के लिए विभिन्न स्तरों पर दबाव झेलना पड़ा। हालांकि उन्होंने दावा किया कि उन्होंने किसी भी प्रकार के समझौते को स्वीकार नहीं किया।
20 लाख नहीं दिए तो करियर खत्म –
उम्मीदवार के परिवार का आरोप इस पूरे विवाद में एक गंभीर आरोप तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक बी.पी. कश्यप को लेकर भी लगाया गया। याचिकाकर्ताओं और संबंधित पक्षों का दावा है कि एक ऐसे अभ्यर्थी, जो लिखित परीक्षा में राज्य स्तर पर तीसरे स्थान पर था और जिसका डिप्टी कलेक्टर बनना लगभग तय माना जा रहा था, उसके परिवार तक कथित तौर पर दूत भेजकर 20 लाख रुपये की मांग की गई।
आरोप है कि अभ्यर्थी के परिजनों से कहा गया कि यदि रकम नहीं दी गई तो अन्याय हो सकता है। बाद में वही अभ्यर्थी साक्षात्कार में अपेक्षा से बेहद कम अंक दिए जाने के कारण अंतिम वरीयता सूची में नीचे चला गया। दावा किया गया कि 250 अंकों के इंटरव्यू में उसे केवल 70 अंक दिए गए। हालांकि इन आरोपों की अंतिम सत्यता न्यायिक परीक्षण और सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय के अधीन है, लेकिन यही आरोप PSC-2003 विवाद को वर्षों तक जीवित रखने वाले प्रमुख कारणों में गिने जाते रहे हैं।
टॉप टू बॉटम भ्रष्टाचार वाली टिप्पणी –
इस पूरे मामले में सबसे अधिक चर्चित बिंदु 26 अगस्त 2016 का हाईकोर्ट फैसला रहा,जिसमें तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक गुप्ता की बेंच ने PSC-2003 चयन प्रक्रिया पर गंभीर टिप्पणियां की थीं।
याचिकाकर्ताओं का दावा है कि अदालत ने अपने फैसले में चयन प्रक्रिया को टॉप टू बॉटम भ्रष्टाचार से प्रभावित बताया था और यह भी कहा था कि परीक्षा प्रक्रिया के विभिन्न स्तरों पर जानबूझकर अनियमितताएं हुईं।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार फैसले के पैरा 69 में यह उल्लेख किया गया था कि राज्य सरकार और PSC की ओर से उन्हें ASP पद के साथ नॉशनल प्रमोशन और 11 वर्षों का वेतन देने का प्रस्ताव रखा गया था, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया। उनका कहना है कि उनका उद्देश्य केवल नौकरी या आर्थिक लाभ नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम में सुधार और न्याय की स्थापना है।
हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट –
हाईकोर्ट के फैसले के बाद राज्य सरकार, PSC और चयनित पक्षों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में सिविल अपीलें दायर की गईं। इन्हीं अपीलों में Smt. Chandan Sanjay Tripathi & Ors. Vs. Ku. Varsha Dongre & Ors. जैसे शीर्षक सामने आए, जिनका उल्लेख केंद्र सरकार की अधिसूचनाओं में भी किया गया। इसके बाद याचिकाकर्ताओं की ओर से भी वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की गई, जो अब भी लंबित है।
याचिकाकर्ताओं ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की लोक अदालत के माध्यम से संभावित सुलह प्रक्रिया की सूचना मिलने पर नाराजगी जताई। उनका कहना है कि इतने गंभीर भ्रष्टाचार और न्यायिक टिप्पणियों वाले मामले को समझौते योग्य मानना दुर्भाग्यपूर्ण है।
हमें पद या पैसा नहीं, सिर्फ न्याय चाहिए –
याचिकाकर्ताओं ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि वे पहले भी किसी प्रस्ताव के सामने नहीं झुके थे और अब भी किसी प्रकार के सेटलमेंट को स्वीकार नहीं करेंगे। उनका कहना है कि यदि न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर उन्हें लोक सेवा में अवसर मिलता है तो वह स्वीकार्य होगा, अन्यथा नहीं। लेकिन वे इस लड़ाई को अंत तक जारी रखेंगे।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि PSC-2003 विवाद के दौरान चयनित कई अधिकारियों को बाद के वर्षों में प्रमोशन और IAS/IPS अवार्ड देकर सिस्टम ने भ्रष्टाचार को वैधता देने का काम किया।
IAS प्रमोशन भी सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले के अधीन –
याचिकाकर्ताओं का दावा है कि PSC-2003 विवाद से जुड़े कई अधिकारियों को बाद में भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में प्रमोशन दिया गया, लेकिन केंद्र सरकार की अधिसूचनाओं में भी यह स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया कि उनकी नियुक्तियां सुप्रीम कोर्ट में लंबित प्रकरण के अंतिम परिणाम के अधीन रहेंगी। यानी जिन अधिकारियों को 2016 बैच अथवा बाद की वरिष्ठता के आधार पर IAS कैडर में स्थान मिला, उनकी सेवा स्थिति पर भी सुप्रीम Court के अंतिम फैसले का प्रभाव पड़ सकता है।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि सारे नियमों को दरकिनार कर अपात्र उम्मीदवारों से कथित अवैध वसूली कर उन्हें उच्च पदों पर बैठाया गया। उनका दावा है कि ऐसे कई अधिकारी आज जिला कलेक्टर, विभागाध्यक्ष और महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर कार्यरत हैं। इसी के साथ उन्होंने बड़ा सवाल उठाया है कि यदि चयन प्रक्रिया पर ही गंभीर न्यायिक टिप्पणियां मौजूद हैं, तो क्या ऐसे अधिकारियों से प्रशासनिक शुचिता और सुशासन की अपेक्षा की जा सकती है?
राजनीतिक और प्रशासनिक बहस तेज –
यह मामला वर्षों से छत्तीसगढ़ की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में बहस का विषय रहा है। आलोचकों का आरोप है कि PSC-2003 परीक्षा ने राज्य की प्रशासनिक विश्वसनीयता को गहरा नुकसान पहुंचाया। वहीं दूसरी ओर, चयनित अधिकारियों और सरकार की ओर से समय-समय पर यह कहा जाता रहा है कि न्यायिक प्रक्रिया अभी अंतिम रूप से पूरी नहीं हुई है और अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट को करना है।
अब लगभग 20 वर्षों बाद भी यह मामला केवल एक भर्ती विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह व्यवस्था, न्यायिक संघर्ष, प्रशासनिक नैतिकता और सिस्टम में पारदर्शिता की बड़ी बहस बन चुका है। फिलहाल सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं, जहां इस बहुचर्चित PSC-2003 मामले का अंतिम अध्याय लिखा जाना बाकी है।










