सुनी-सुनाई – चंदन से आस्था ऐसी लिपटी कि तबादले भी थक गए! चंदन जहां-जहां, आस्था वहां-वहां…और सुशासन खामोश!

 

राजधानी – राजधानी के गलियारों में एक पुरानी और चर्चित प्रेम कहानी फिर हिलोरे मारने लगी है। इस कहानी में चंदन है, आस्था है और दोनों की ऐसी जुगलबंदी कि तबादले भी इनके आगे बेअसर नजर आते हैं। यह कोई उपन्यास नहीं, बल्कि प्रशासन की उसी दुनिया की दास्तान है, जहां फाइलों पर दस्तखत करने वाले साहब खुद रिश्तों की ऐसी फाइल खोल बैठे हैं, जिसकी नोटशीट आगे बढ़ती जा रही है, लेकिन क्लोजर का रास्ता नजर नहीं आता।

इस कहानी के साहब पहले से शादीशुदा हैं। लेकिन लगता है दिल के विभाग में एक और शाखा खुल गई। इस नई शाखा का नाम जुड़ा आस्था से। बात सिर्फ नजदीकियों तक रहती तो शायद कहानी यहीं रुक जाती, लेकिन इस रिश्ते को बाकायदा ‘गंधर्व विवाह’ का नाम भी दे दिया गया। यानी दिल ने अपनी फाइल खुद खोली, खुद आगे बढ़ाई और अब नोटशीट कहां जाकर रुकेगी, यही सवाल है।

गंधर्व विवाह यानी प्रेम और आपसी सहमति से बना रिश्ता। पुरानी परंपरा में इसकी अपनी जगह रही है, लेकिन आधुनिक कानून की फाइल में कहानी इतनी सीधी नहीं है। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5 विवाह के समय किसी पक्ष के पहले से जीवित पति या पत्नी होने को लेकर साफ शर्त रखती है और धारा 11 ऐसी स्थिति में विवाह की वैधता पर असर डालती है। यानी दिल की फाइल में सहमति की मुहर लग जाए, लेकिन कानून की फाइल में पहली शादी का पन्ना हटाए बिना दूसरी कहानी आसानी से क्लोज नहीं होती।

आस्था में खोए साहब अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी हैं, इसलिए मामला सिर्फ घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता, सर्विस रूल की फाइल भी खुल जाती है। All India Services (Conduct) Rules, 1968 के Rule 19 में जीवनसाथी के रहते दूसरी शादी को लेकर स्पष्ट प्रावधान है। यानी सरकारी सेवा में हर शाखा का नियम-कायदा भी होता है और फाइल नंबर भी।

अब आइए असली कहानी पर…

कहानी की शुरुआत कांकेर से होती है। साहब जहां पदस्थ हुए, आस्था भी उसी लय-ताल में चलती रहीं। फिर साहब की खुशबू जब जगदलपुर तक पहुंची तो आस्था भी दबे पांव वहां पहुंच गईं। असली खेल यहीं से शुरू हुआ। चंदन और आस्था की नजदीकियां जब घर की चौखट तक पहुंचीं तो खूब तनातनी हुई। बात कहासुनी से आगे बढ़कर हाथापाई तक पहुंच गई। उधर कहानी के दूसरे छोर पर आस्था इस पारिवारिक घमासान को देखकर अंदर ही अंदर मुस्कुराती रहीं,

जहां-जहां चंदन, वहां-वहां आस्था

कांकेर से जगदलपुर और अब राजधानी, प्रशासनिक नक्शे में दूरी चाहे जितनी हो, आस्था का विश्वास अपना रास्ता खोज ही लेता है। अब तो सेक्टर 18 से सेक्टर 17 तक का फासला भी महज एक सड़क पार करने जितना है।

कहते हैं, चंदन से आस्था इस तरह लिपटी हैं जैसे चंदन से सांप

अब चंदन का पेड़ भी ऐसी जगह खड़ा है, जहां हवा में बजट की खुशबू और पैसों का बहाव कुछ ज्यादा ही तेज है। कहते हैं बहाव जहां तेज हो, आस्था को वहां तक पहुंचने में भला कितना वक्त लगता है। साहब की कुर्सी बदली तो आस्था का रास्ता भी बदलता रहा। आखिर चंदन की खुशबू हो और बहाव वित्त का, तो आस्था का खिंची चली आना भी कोई आश्चर्य की बात नहीं! और आस्था भी कोई मामूली ठिकाने पर नहीं। जमीन-जायदाद और रियल एस्टेट के उस दरबार जहां लोगों के आशियाने से लेकर निवेश तक का हिसाब-किताब पहुंचता है। यानी एक तरफ चंदन के आसपास बजट और पैसों की आवाजाही, दूसरी तरफ आस्था के पास जमीन और रियल एस्टेट की फाइलें।

अब नाम बदनाम हो तो हो, जब एक तरफ पैसों के बहाव वाली कुर्सी हो और दूसरी तरफ जमीन-जायदाद के हिसाब वाली, तो यह सिर्फ चंदन की खुशबू है या आस्था का भी कोई प्रशासनिक आकर्षण है?

और उधर पहली पत्नी?

वह सब देखती हैं, समझती हैं, जानती हैं। मगर शायद कुछ रिश्तों में बोलने से ज्यादा मुश्किल होता है चुप रहना। घर बचाने की कोशिश में कई बार शब्द खुद ही घर के बाहर खड़े रह जाते हैं। क्योंकि यह कहानी सिर्फ प्रेम की नहीं है। एक तरफ पहली पत्नी का वैवाहिक अधिकार है और दूसरी तरफ वह रिश्ता, जिसे ‘गंधर्व विवाह’ का नाम दिया जा रहा है।

बताते हैं, आस्था तीज हो या करवाचौथ, तमाम व्रत-उपवास भी उसी चंदन के नाम करती हैं। जिस रिश्ते की अपनी कानूनी सीमाएं हैं, उस पर धर्म की चादर डाल देने से क्या उसकी वैधता बदल जाती है?

और यहां चंदन कोई साधारण चंदन नहीं। वह अखिल भारतीय सेवा का अधिकारी है। ऐसी सेवा, जहां आचरण नियम सिर्फ सरकारी फाइलों की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं होते। Rule 19 में विवाहित अधिकारी के दूसरे विवाह को लेकर स्पष्ट प्रावधान है। अगर यह सिर्फ निजी प्रेम है, तो ‘गंधर्व विवाह’ की चर्चा क्यों? अगर विवाह है, तो पहली शादी का क्या? और अगर यह सब महज अफवाह है, तो संबंधित स्तर पर इसकी सच्चाई सामने लाने की जरूरत क्यों नहीं?

क्योंकि प्रदेश में सुशासन की बड़ी-बड़ी बातें होती हैं। महिलाओं के सम्मान के नारे लगते हैं, महिला सशक्तिकरण के मंच सजते हैं। ऐसे में अगर एक शादीशुदा महिला की जिंदगी सचमुच ऐसी परिस्थिति में फंसी है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है क्या प्रशासनिक गलियारों में ‘गंधर्व विवाह’ भी कोई नया सर्विस रूल बन गया है, या किताब में लिखे नियम अभी भी जिंदा हैं?

कहानी में चंदन है, आस्था है, घर है, धर्म है, वित्त है, रियल एस्टेट है और सत्ता की छाया भी। अब देखना बस इतना है कि इस कहानी की अगली पंक्ति कौन लिखता है

घर वाली, सरकार या फिर खुद सर्विस रूल

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