विधानसभा में अनुकंपा का कैसा हिसाब? न्याय और नियमों की दुहाई देने वाले सदन के सचिवालय में दिवंगत कर्मचारियों के परिजन क्यों काट रहे चक्कर –

रायपुर – छत्तीसगढ़ विधानसभा में कानून बनते हैं, नियमों पर बहस होती है और सरकार से जवाब मांगा जाता है। लेकिन उसी विधानसभा सचिवालय के भीतर दो ऐसे परिवार हैं, जिनके लिए व्यवस्था का दरवाजा अब तक नहीं खुल सका है। मामला इसलिए ज्यादा चुभता है क्योंकि इसी सचिवालय में एक अन्य दिवंगत कर्मचारी के परिवार को एक लाख रुपये की अनुकंपा अनुदान राशि मिल चुकी है। विधानसभा के वाहन चालक ओमप्रकाश यादव के भाई डिगेश्वर यादव के निधन के बाद उनकी माता के नाम पर यह राशि दी गई। दूसरी ओर दिवंगत कर्मचारी हरिश कश्यप और शैलेन्द्र पटवा के परिजन लंबे समय से अपने हिस्से की मदद की प्रतीक्षा कर रहे हैं। एक तरफ राहत पहुंची, दूसरी तरफ इंतजार लंबा होता गया।
नियम है, रास्ता भी तय है… फिर इंतजार क्यों –
सामान्य प्रशासन विभाग ने 14 जून 2013 को सेवाकाल के दौरान शासकीय सेवक की मृत्यु होने पर अनुकंपा नियुक्ति के लिए संशोधित निर्देश जारी किए थे। इसमें पात्र आश्रित को अनुकंपा नियुक्ति देने की प्रक्रिया और शर्तें तय हैं। आवेदन के लिए बाकायदा निर्धारित प्रपत्र है, जिसमें दिवंगत कर्मचारी की सेवा और आश्रित परिवार की जानकारी ली जाती है। यानी व्यवस्था के लिए नियम भी हैं और प्रक्रिया भी। फिर हरिश कश्यप और शैलेन्द्र पटवा के मामले में राहत का रास्ता इतना लंबा क्यों हो गया, यही सवाल इस पूरे प्रकरण को गंभीर बनाता है।
दिनेश शर्मा के सचिवालय में दो परिवारों की प्रतीक्षा –
विधानसभा सचिव दिनेश शर्मा के स्तर पर हरिश कश्यप और शैलेन्द्र पटवा के परिजनों का मामला लंबे समय से अटका हुआ है। दोनों परिवार राहत की उम्मीद में सचिवालय के चक्कर लगाते रहे, लेकिन उनकी प्रतीक्षा खत्म नहीं हुई। यहीं इस पूरे प्रकरण की सबसे कड़वी तस्वीर सामने आती है। जब एक ही व्यवस्था में समान परिस्थितियों से जुड़े मामले का निपटारा हो सकता है, तो इन दोनों परिवारों के लिए रास्ता क्यों नहीं खुला। जिस कर्मचारी ने अपनी सेवा विधानसभा को दी, उसके जाने के बाद उसके घर को उसी संस्था के दरवाजे पर मदद के लिए भटकना पड़े, तो यह सिर्फ देरी नहीं रह जाती। यह व्यवस्था की संवेदनशीलता का सवाल बन जाता है।
महंत के दौर से चला मामला, आज भी बाकी –
इस प्रकरण की शुरुआत पूर्व विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत के कार्यकाल के दौरान हुई थी। उस समय हरिश कश्यप, वाहन चालक और शैलेन्द्र पटवा का सचिव दिनेश शर्मा से विवाद हुआ और अनुकंपा सहायता का मामला उलझता चला गया। समय बदला, विधानसभा अध्यक्ष बदले, लेकिन दोनों परिवारों की प्रतीक्षा खत्म नहीं हुई। आज विधानसभा की जिम्मेदारी डॉ. रमन सिंह के पास है और सचिवालय का प्रशासनिक नेतृत्व दिनेश शर्मा संभाल रहे हैं।
मामला पुराना जरूर है, लेकिन सवाल आज भी वहीं खड़ा है –
अनुकंपा किसी पर एहसान नहीं है। कमाने वाले सदस्य को खो चुके परिवार के लिए यह व्यवस्था का वह सहारा है, जिसकी जरूरत किसी सरकारी प्रक्रिया से ज्यादा होती है। ऐसे परिवारों के लिए दफ्तर का एक चक्कर भी सिर्फ चक्कर नहीं होता, उसमें उम्मीद जुड़ी होती है। विधानसभा में नियम बनते हैं, न्याय की बात होती है और जवाबदेही तय करने की आवाज उठती है। लेकिन जब अपने ही कर्मचारियों के परिवार राहत की आस में उसी सचिवालय का दरवाजा खटखटाएं और इंतजार खत्म न हो, तो सवाल सिर्फ फाइल की गति का नहीं रहता। सवाल यह है कि विधानसभा का सचिवालय अपने दिवंगत कर्मचारियों के परिवारों के प्रति कितना संवेदनशील है।










