भवन बदला, अध्यक्ष बदले, सरकार बदली… सचिव वही! कैंटीन से शिलालेख तक, विधानसभा की बदलती व्यवस्थाओं के बीच दिनेश शर्मा की कार्यशैली पर सवाल

राजधानी – नवीन विधानसभा भवन आ गया, अध्यक्ष बदल गए और सरकार भी बदल गई। लेकिन विधानसभा सचिवालय में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक चेहरा अब भी वही है सचिव दिनेश शर्मा। ऐसे में सचिवालय की कुछ हालिया व्यवस्थाएं उनकी कार्यशैली को लेकर सवाल खड़े कर रही हैं।
मामला विधानसभा परिसर की कैंटीन का है। इसे महज चाय-नाश्ते की सुविधा मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यहां विधायक और मंत्री ही नहीं, मुख्यमंत्री तक चाय-नाश्ता और भोजन करते हैं। ऐसे में कैंटीन में काम करने वाले लोगों की एंट्री, बाहर से आने वाली खाद्य सामग्री और पूरे संचालन की सुरक्षा जांच विधानसभा की आंतरिक सुरक्षा का संवेदनशील हिस्सा है। किसी अनधिकृत व्यक्ति या संदिग्ध सामग्री की पहुंच की स्थिति में यह सुरक्षा व्यवस्था में बड़ी सेंध बन सकती है।
कैंटीन के संचालन को लेकर विधानसभा परिसर में यह भी चर्चा है कि इसे सचिवालय के एक अधिकारी के करीबी माने जाने वाले पांडेय जी के माध्यम से संचालित किया जा रहा है। यदि ऐसा है तो इसकी पुष्टि चयन प्रक्रिया, कार्यादेश या अनुबंध के दस्तावेजों से होनी चाहिए। संचालन की जिम्मेदारी किस प्रक्रिया के तहत दी गई, सक्षम स्वीकृति किस स्तर से मिली और क्या निर्धारित औपचारिकताएं पूरी हुईं यह स्पष्ट होना चाहिए।
कैंटीन पहले बंद की गई थी तो उसके पीछे क्या कारण थे और दोबारा संचालन के समय उन कारणों का निराकरण कैसे हुआ, यह भी रिकॉर्ड से सामने आना चाहिए। साथ ही FSSAI लाइसेंस, खाद्य सुरक्षा निरीक्षण, दर सूची और स्वच्छता व्यवस्था की स्थिति भी स्पष्ट होनी चाहिए।
बात सिर्फ कैंटीन तक सीमित नहीं है। यदि वहां विधानसभा की बिजली, पानी, भवन, फर्नीचर या पुरानी विधानसभा की सामग्री इस्तेमाल हो रही है तो उसके लिए अनुमति और उपयोग का हिसाब भी होना चाहिए। बिजली-पानी का खर्च कौन वहन कर रहा है, इसकी व्यवस्था भी रिकॉर्ड में होनी चाहिए।
दूसरा पक्ष 1 नवंबर 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नए विधानसभा भवन के उद्घाटन से जुड़ा है। प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के लिए केंद्रीय और राज्य सुरक्षा एजेंसियों के बीच तय सुरक्षा प्रोटोकॉल के अनुपालन का रिकॉर्ड विधानसभा सचिवालय के पास होना चाहिए। उद्घाटन से पहले सुरक्षा संबंधी निर्देशों की समीक्षा और उनके अनुपालन की निगरानी किस स्तर पर हुई, यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।
फिर आता है उद्घाटन शिलालेख का मामला। यदि उद्घाटन के समय लगाए गए मूल शिलालेख में राज्यपाल, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष के नाम थे और बाद में उसमें तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत का नाम जोड़ा गया, तो इस बदलाव की प्रशासनिक प्रक्रिया सामने आनी चाहिए। किस सक्षम प्राधिकारी ने अनुमति दी, नया शिलालेख किस आदेश पर तैयार हुआ और उस पर हुआ खर्च किस मद से किया गया इनका जवाब दस्तावेजों में होना चाहिए।
इन मामलों को अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय एक प्रशासनिक सवाल के रूप में देखना ज्यादा उचित है क्या विधानसभा सचिवालय में महत्वपूर्ण फैसलों के पीछे स्पष्ट अनुमति, निर्धारित प्रक्रिया और पूरा अभिलेख मौजूद है?
क्योंकि भवन बदल गया, अध्यक्ष बदल गए, सरकार बदल गई… सचिव वही हैं।
सवाल उस कार्यशैली का है, जिसकी तस्वीर अंततः फाइलों और आदेशों से ही साफ होगी। विधानसभा जैसे संवैधानिक संस्थान में व्यवस्था व्यक्ति से नहीं, प्रक्रिया से चलनी चाहिए।










