भवन बदला, अध्यक्ष बदले, सचिव की कुर्सी नहीं, विधानसभा की सुरक्षा से खिलवाड़? 8.65 करोड़ के आवंटन पर सवाल, 125 स्मार्ट टीवी और पुराने भवन की करोड़ों की संपत्ति का भी हिसाब सवालों में –

रायपुर – जिस विधानसभा में बैठकर जनप्रतिनिधि सरकार से जनता के पैसे और व्यवस्था का हिसाब मांगते हैं, आज वही विधानसभा खुद गंभीर सवालों के घेरे में है। मामला किसी सामान्य सरकारी कार्यालय का नहीं, बल्कि राज्य की सबसे संवेदनशील संवैधानिक संस्थाओं में से एक विधानसभा भवन की सुरक्षा और करोड़ों रुपये की सरकारी संपत्ति का है। दस्तावेजों में विधानसभा की सुरक्षा के लिए आवंटित करीब 8 करोड़ 65 लाख रुपये को लेकर उठ रहा है। इतनी बड़ी राशि उपलब्ध होने के बावजूद नवीन विधानसभा भवन जैसे अति-संवेदनशील परिसर में सुरक्षा उपकरण स्थापित नहीं किए जाने का आरोप है। यदि यह तथ्य गलत है तो विधानसभा सचिवालय को स्पष्ट करना चाहिए कि इतनी बड़ी राशि किस मद में खर्च हुई, क्या-क्या खरीदा गया और उन उपकरणों की स्थापना कहां हुई? सुरक्षा के नाम पर स्वीकृत राशि का उपयोग यदि सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने में नहीं हुआ तो फिर हुआ कहां?
यह सवाल इसलिए और गंभीर है क्योंकि विधानसभा में सिर्फ विधायक और मंत्री नहीं आते। यहां मुख्यमंत्री, मंत्रिमंडल, अधिकारी, देश-प्रदेश के महत्वपूर्ण व्यक्ति और आम नागरिकों की भी आवाजाही होती है। ऐसे परिसर की सुरक्षा में लापरवाही को सामान्य प्रशासनिक चूक मानकर टाला नहीं जा सकता।
125 टीवी खरीदे, लगाए और फिर निकाल दिए –
दूसरा मामला करीब 125 नए स्मार्ट टीवी का है। 1 नवंबर 2025 को नवीन विधानसभा भवन के उद्घाटन कार्यक्रम के दौरान अलग-अलग कक्षों में ये टीवी लगाए गए। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मौजूद थे। लेकिन कार्यक्रम समाप्त होते ही सभी 125 टीवी निकाल दिए गए। अगर टीवी स्थायी उपयोग के लिए खरीदे गए थे तो उन्हें तत्काल क्यों हटाया गया? और अगर सिर्फ उद्घाटन कार्यक्रम के लिए लगाए गए थे तो इतनी बड़ी संख्या में इनकी खरीद क्यों की गई? इन 125 टीवी की खरीद पर खर्च हुई राशि भी लाखों में नहीं, करोड़ों रुपये तक पहुंचने वाली सरकारी खरीद बताई जा रही है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि आज ये टीवी कहां हैं, किसके आधिपत्य में हैं और किस स्टॉक रजिस्टर में दर्ज हैं। दस्तावेजों में इस पूरी प्रक्रिया में विधानसभा सचिवालय की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। इसलिए खरीद से लेकर स्थापना और फिर हटाने तक की पूरी फाइल सार्वजनिक जांच के दायरे में आनी चाहिए।
पुराने भवन की करोड़ों की संपत्ति का हिसाब भी बाकी –
पुराने विधानसभा परिसर में पहले से मौजूद सरकारी संपत्ति का हिसाब भी कम गंभीर नहीं है। दस्तावेज में दर्ज है कि वहां 300 से अधिक एयर कंडीशनर, 100 से अधिक स्मार्ट टीवी और बड़ी मात्रा में नया-पुराना फर्नीचर मौजूद था। इनमें से अधिकांश सामान भवन स्थानांतरण के समय उपयोग योग्य स्थिति में था। फिर सवाल उठा कि स्थानांतरण के समय इन सभी सामानों की सूची कहां है? उनका भौतिक सत्यापन किसने किया? स्टॉक रजिस्टर से मिलान हुआ या नहीं? कौन सा सामान नए परिसर में पहुंचा और कौन सा अनुपयोगी घोषित हुआ? यदि सामान अनुपयोगी था तो उसे राइट-ऑफ किस नियम के तहत किया गया? नीलामी हुई तो रिकॉर्ड कहां है? बिक्री हुई तो रकम सरकारी खाते में कितनी जमा हुई? और जो सामान उपयोग योग्य था, वह आज कहां है? 30 जुलाई 2021 को उद्घाटित पंचकर्म यूनिट के सामान और उसके वर्तमान ठिकाने को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। यानी मामला केवल टीवी या एसी का नहीं, विधानसभा की वर्षों पुरानी सरकारी संपत्ति के समूचे लेखे-जोखे का है।
सवाल सिर्फ सामान का नहीं, सचिव की भूमिका का भी –
पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल विधानसभा सचिवालय और उसके प्रशासनिक नेतृत्व की भूमिका पर है। दस्तावेजों में तत्कालीन जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच की जरूरत बताई गई है और सचिव दिनेश शर्मा की भूमिका की निष्पक्ष जांच का भी उल्लेख है। यह सवाल सिर्फ इस एक मामले तक सीमित नहीं है। सचिव की भूमिका से जुड़े सवाल विधानसभा की खरीद प्रक्रिया, सुरक्षा व्यवस्था, संपत्ति प्रबंधन और यहां तक कि मार्शल भर्ती एवं नियुक्तियों जैसे मामलों तक पहुंचते हैं। यदि इन सभी मामलों में विधानसभा सचिवालय की प्रशासनिक भूमिका रही है तो फिर जवाबदेही भी उसी स्तर पर तय होनी चाहिए। और यहीं से सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है भवन बदल गया। विधानसभा अध्यक्ष बदल गए। सरकार बदल गई। लेकिन सचिव की कुर्सी आज तक नहीं बदली।
चरणदास महंत के विधानसभा अध्यक्ष रहते भी वही सचिव, सत्ता परिवर्तन के बाद डॉ. रमन सिंह विधानसभा अध्यक्ष बने तब भी वही। ऐसे में सवाल किसी अधिकारी के लंबे कार्यकाल पर आपत्ति का मात्र नहीं है। सवाल यह है कि इतने लंबे समय में विधानसभा सचिवालय से जुड़े इतने गंभीर सवाल उठने के बावजूद सचिव की कुर्सी पर स्थायी बदलाव क्यों नहीं हुआ?
क्या विधानसभा अध्यक्षों का इस प्रशासनिक निरंतरता पर भरोसा है? क्या कोई विशेष कारण है कि सरकारें और अध्यक्ष बदलते रहे, लेकिन सचिव की कुर्सी अडिग रही? यह प्रेम है, विश्वास है या व्यवस्था की ऐसी मजबूरी जिसे सार्वजनिक नहीं किया जा रहा? इन सवालों का जवाब विधानसभा अध्यक्ष और विधानसभा सचिवालय दोनों को देना चाहिए। क्योंकि जिस सदन में बैठकर सरकार से पारदर्शिता, जवाबदेही और सरकारी खर्च का हिसाब मांगा जाता है, उसी सदन में 8.65 करोड़ की सुरक्षा राशि, 125 स्मार्ट टीवी, पुराने भवन की करोड़ों की संपत्ति और नियुक्तियों तक पर सवाल उठें तो मामला बेहद गंभीर हो जाता है।
यह सिर्फ एसी, टीवी या फर्नीचर का हिसाब नहीं है। यह सवाल है कि विधानसभा की संपत्ति का रखवाला कौन है, फैसलों का जिम्मेदार कौन है और जवाबदेही से ऊपर आखिर कौन है? विधानसभा नई हो गई। अध्यक्ष बदल गए। चेहरे बदल गए। लेकिन सचिव की कुर्सी नहीं बदली। सवाल सिर्फ यह नहीं कि सामान कहां गया सवाल यह भी है कि जवाबदेही आखिर गई कहां?










