विधानसभा में नियुक्तियों का खेल! 47 पदों की भर्ती सात साल से अटकी, पिछले दरवाजे से नियुक्तियां, एक-एक नौकरी पर करोड़ों के लेनदेन का आरोप, पैसे लेते वीडियो में दिखे सचिव दिनेश शर्मा को फिर सेवावृद्धि

रायपुर – विधानसभा में सरकार से सवाल पूछे जाते हैं, कानून बनाए जाते हैं और व्यवस्था में पारदर्शिता का पाठ पढ़ाया जाता है। लेकिन अब विधानसभा सचिवालय की अपनी नियुक्ति व्यवस्था ही सवालों के घेरे में है। मामला सिर्फ कुछ कर्मचारियों की नौकरी का नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का है जिसमें एक तरफ परीक्षा देकर नौकरी का इंतजार करने वाले अभ्यर्थी सालों से बैठे रहे और दूसरी तरफ विधानसभा सचिवालय में नियुक्तियों के लिए पिछले दरवाजे खुलते रहे।
कहानी शुरू होती है 2019 की उस भर्ती से, जिसमें सहायक ग्रेड-3 के 47 पदों पर सीधी भर्ती के लिए बाकायदा विज्ञापन जारी किया गया था। पदों का वर्गवार आरक्षण निर्धारित था। आवेदन लिए गए, परीक्षा प्रक्रिया हुई और वर्षों बाद 2024-25 में परिणाम भी घोषित हुआ। इसके बावजूद नियुक्तियां लंबित रहीं। यानी जिस भर्ती के लिए नियम, विज्ञापन, परीक्षा और परिणाम सब कुछ था, उसके अभ्यर्थी सात साल तक नियुक्ति की बाट जोहते रहे। इसी दौरान विधानसभा सचिवालय में दूसरी नियुक्तियों का सिलसिला चलता रहा।
47 पदों की भर्ती रुकी रही, अपने लोगों की नियुक्तियां होती रहीं –
विधानसभा सचिवालय के नियुक्ति आदेश बताते हैं कि 2022 में सहायक ग्रेड-3 सह अनुवादक के पद पर नियुक्तियां हुईं। वाहन चालक नियुक्त हुए और बुक लिफ्टर के पद पर भी नियुक्ति की गई। यह सब उस दौर में हुआ जब 2019 की खुली भर्ती प्रक्रिया के अभ्यर्थी अपनी नियुक्ति का इंतजार कर रहे थे। मामला तब और गंभीर हो जाता है जब इन नियुक्तियों में विधानसभा से पहले से जुड़े परिवारों के लोगों के नाम सामने आते हैं। इनमें विधानसभा कर्मचारी के पुत्र, विधानसभा से जुड़े व्यक्ति के भाई, विधानसभा में कार्यरत बढ़ई के पुत्र, प्लंबर के पुत्र और विधानसभा अधिकारी के पुत्र तक शामिल बताए गए हैं। इससे भर्ती प्रक्रिया की समानता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। आम अभ्यर्थियों के लिए विज्ञापन और परीक्षा का रास्ता था, जबकि विधानसभा से जुड़े परिवारों के लोगों की नियुक्तियों ने पिछले दरवाजे की व्यवस्था के आरोपों को जन्म दिया।
मामला रिश्तेदारी से आगे, करोड़ों के लेनदेन तक पहुंचा –
इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर पहलू नियुक्तियों में एक-एक नौकरी पर करोड़ों रुपये के लेनदेन के गंभीर आरोप हैं। आरोप है कि प्रभावशाली लोगों के रिश्तेदारों को नियुक्तियां दिलाने के साथ-साथ इन नियुक्तियों के पीछे करोड़ों रुपये का आर्थिक खेल भी चला। अगर यह आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला सिर्फ भर्ती नियमों के उल्लंघन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी नौकरियों के सौदे का गंभीर मामला बन जाएगा। इसलिए जांच का केंद्र सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि किसे नौकरी मिली, बल्कि नियुक्तियों के पीछे आर्थिक लेनदेन हुआ या नहीं और हुआ तो उसका नेटवर्क कहां तक फैला था।
दिनेश शर्मा का पैसे लेते वीडियो –
नियुक्तियों के विवाद में सबसे सनसनीखेज कड़ी तब सामने आई जब विधानसभा सचिव दिनेश शर्मा का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें उन्हें पैसे लेते हुए दिखाया गया। इस वीडियो को भाजपा आईटी सेल की ओर से भी वायरल किया गया था। यह कोई सामान्य कर्मचारी से जुड़ा विवाद नहीं था। वीडियो में दिखाई देने वाले व्यक्ति को विधानसभा सचिव दिनेश शर्मा बताया गया, जो सचिवालय का प्रशासनिक मुखिया है और भर्ती समेत पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालता है। वीडियो सामने आने के बाद मामला नियुक्तियों में आर्थिक लेनदेन से सीधे जुड़ गया। इसी प्रकरण को लेकर भर्ती प्रक्रिया में शामिल अभ्यर्थियों की शिकायत EOW तक पहुंची। पूछताछ हुई और शिकायत के अनुसार जांच के बाद कार्रवाई के लिए विधानसभा अध्यक्ष कार्यालय को रिपोर्ट भेजे जाने की बात सामने आई।
EOW तक पहुंचा मामला, कार्रवाई पर लगा ब्रेक – इसके बाद मामला विधानसभा अध्यक्ष कार्यालय तक पहुंचा। शिकायत के अनुसार दिनेश शर्मा के खिलाफ कार्रवाई इस आधार पर आगे नहीं बढ़ी कि विधानसभा अध्यक्ष की पूर्व अनुमति के बिना कार्रवाई नहीं की जा सकती। यहीं से विशेषाधिकार और आपराधिक कार्रवाई का सवाल सामने आता है। लोकसभा सचिवालय की Practice and Procedure of Parliament में भी स्पष्ट किया गया है कि सदस्यों को मिलने वाला गिरफ्तारी संबंधी विशेषाधिकार आपराधिक मामलों में सामान्य सुरक्षा कवच नहीं है। ऐसे में विधानसभा सचिवालय के किसी कर्मचारी के खिलाफ पुलिस कार्रवाई रोकने के लिए इस्तेमाल किए गए प्रावधान की वैधानिक स्थिति भी जांच का विषय बनती है।
सचिवालय के भीतर पुलिस कार्रवाई को लेकर भी विवाद –
विधानसभा सचिव के एक डिप्टी सेक्रेटरी पर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से विवाद, उसे प्रताड़ित करने, पुलिस बुलाकर डराने-धमकाने और शराब पीने का मामला बनाकर मेडिकल परीक्षण कराने की तैयारी जैसे आरोप लगाए गए हैं। विधानसभा भवन में कर्मचारियों की सुरक्षा से जुड़े एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी के साथ विवाद का भी उल्लेख है। आरोप है कि सुरक्षा अधिकारी द्वारा विरोध किए जाने के बाद उसके खिलाफ शिकायत की गई और विधानसभा परिसर में कर्मचारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई रोकने की कोशिश की गई। अगर विधानसभा परिसर में किसी कर्मचारी के खिलाफ पुलिस कार्रवाई के लिए अलग अनुमति व्यवस्था है, तो उसकी वैधानिक सीमा और समान अनुप्रयोग भी स्पष्ट होना चाहिए। यही वजह है कि यह विवाद अब केवल भर्ती तक सीमित नहीं रह गया है।
सचिव दिनेश शर्मा की अपनी नियुक्ति भी सवालों में –
जिस सचिवालय की भर्ती व्यवस्था सवालों में है, उसके शीर्ष प्रशासनिक पद पर बैठे दिनेश शर्मा की अपनी नियुक्ति और सेवा यात्रा भी अब चर्चा के केंद्र में है। वर्ष 1987 में उनकी नियुक्ति मध्यप्रदेश विधानसभा में हुई थी। इससे पहले 1985-86 में एक विश्वविद्यालय में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में उनके कार्यरत होने की बात सामने आती है। इसके बाद 1987 में मध्यप्रदेश विधानसभा में द्वितीय श्रेणी राजपत्रित पद पर सीधी भर्ती से नियुक्ति का उल्लेख है। ऐसे में उनकी 1987 की मूल नियुक्ति, विज्ञापन, चयन प्रक्रिया, अभ्यर्थियों की संख्या, मेरिट और नियुक्ति का पूरा वैधानिक आधार जांच का अहम बिंदु बन जाता है। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से राजपत्रित पद तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया उसी नियुक्ति फाइल से स्पष्ट हो सकती है।
वोरा सरकार से महंत की निजी स्थापना और फिर विधानसभा सचिव की कुर्सी –
दिनेश शर्मा की सेवा यात्रा का राजनीतिक प्रशासनिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है। वर्ष 1987 में मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। स्वर्गीय मोतीलाल वोरा मुख्यमंत्री और स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद शुक्ल विधानसभा अध्यक्ष थे। इसके बाद दिनेश शर्मा लंबे समय तक डॉ. चरणदास महंत की निजी स्थापना से जुड़े रहे। महंत अलग-अलग समय में मध्यप्रदेश सरकार में वाणिज्य कर राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार तथा गृह एवं जनसंपर्क मंत्री रहे और बाद में केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार में राज्य मंत्री भी रहे। 2018 में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनी और डॉ. चरणदास महंत विधानसभा अध्यक्ष बने। दिनेश शर्मा उनकी निजी स्थापना में रहे और बाद में विधानसभा सचिव बने। अप्रैल 2022 में उन्होंने विधानसभा सचिव का पद संभाला। इस पूरी सेवा यात्रा को देखते हुए उनकी शुरुआती नियुक्ति से लेकर सचिव पद तक पहुंचने की प्रक्रिया की पारदर्शिता भी इस विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है।
विवादों के बीच फिर मिली सेवावृद्धि –
मामला यहां भी खत्म नहीं होता। दिनेश शर्मा का विधानसभा सचिव के रूप में कार्यकाल 30 नवंबर 2025 को समाप्त होना था, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने उनका कार्यकाल एक वर्ष बढ़ाकर 30 नवंबर 2026 तक कर दिया। यानी जिस सचिवालय में भर्ती प्रक्रिया पर गंभीर सवाल हैं, जिस सचिव के संबंध में पैसे लेते हुए वीडियो सामने आने का दावा किया गया, जिस मामले की शिकायत EOW तक पहुंची और जिसकी कार्रवाई पर सवाल उठे, उसी सचिव को पद पर बने रहने के लिए सेवावृद्धि भी मिल गई। डॉ. चरणदास महंत के विधानसभा अध्यक्ष रहते दिनेश शर्मा सचिव बने और अब डॉ. रमन सिंह के विधानसभा अध्यक्ष रहते उन्हें सेवावृद्धि मिली। सरकार बदली। विधानसभा अध्यक्ष बदले। लेकिन सचिव की कुर्सी पर दिनेश शर्मा कायम रहे।
सवाल सिर्फ 47 नौकरियों का नहीं –
एक तरफ 2019 का विज्ञापन, परीक्षा और परिणाम। दूसरी तरफ सात साल से नियुक्ति का इंतजार। इसी दौरान दूसरी नियुक्तियां। उन नियुक्तियों में विधानसभा से जुड़े परिवारों के लोगों के नाम। फिर एक-एक नौकरी पर करोड़ों रुपये के लेनदेन के आरोप। फिर दिनेश शर्मा का पैसे लेते हुए वायरल वीडियो। फिर EOW तक पहुंचा मामला और उसके बाद कार्रवाई पर सवाल। अंत में उसी सचिव को एक साल की सेवावृद्धि। इन तमाम कड़ियों को एक साथ देखने पर मामला बेहद गंभीर हो जाता है। यह अब सिर्फ 47 पदों पर नियुक्ति का विवाद नहीं है। यह विधानसभा सचिवालय की भर्ती व्यवस्था, उसकी पारदर्शिता और उसके प्रशासनिक नेतृत्व की जवाबदेही का मामला है। अगर आरोप गलत हैं तो विधानसभा सचिवालय को 2019 की भर्ती से लेकर बाद की नियुक्तियों तक पूरी प्रक्रिया स्पष्ट करनी चाहिए। रिश्तेदारी के आरोपों पर स्थिति साफ होनी चाहिए। करोड़ों रुपये के कथित लेनदेन की जांच का परिणाम सामने आना चाहिए। वायरल वीडियो की सत्यता और उसमें दिखाई देने वाले व्यक्ति की पहचान की जांच होनी चाहिए। EOW की कार्रवाई का पूरा परिणाम सार्वजनिक होना चाहिए और दिनेश शर्मा की 1987 की मूल नियुक्ति से लेकर सचिव पद तक की सेवा यात्रा भी पारदर्शी होनी चाहिए। क्योंकि जिस संस्था में बैठकर विधायकों, मंत्रियों और अधिकारियों से जवाब मांगा जाता है, उसी संस्था के भीतर नियुक्तियों को लेकर उठे सवालों का जवाब भी सार्वजनिक होना चाहिए।
विधानसभा में नौकरी पाने का रास्ता अगर परीक्षा, योग्यता और नियम है तो वह सबके लिए एक होना चाहिए। और अगर कहीं कोई दूसरा रास्ता खुला है, तो उसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं कि विधानसभा में किसे नौकरी मिली सवाल यह है कि नौकरी देने वाली व्यवस्था कितनी निष्पक्ष रही।










