चार कुर्सियां खाली थीं, सवाल बड़ा था! सेन शक्ति सम्मेलन में रायपुर के चारों विधायक नदारद, निमंत्रण में थे विशिष्ट अतिथि, क्या गौरीशंकर श्रीवास का बढ़ता कद बना सियासी चर्चा की वजह?

चार कुर्सियां खाली थीं, सवाल बड़ा था! सेन शक्ति सम्मेलन में रायपुर के चारों विधायक नदारद, निमंत्रण में थे विशिष्ट अतिथि, क्या गौरीशंकर श्रीवास का बढ़ता कद बना सियासी चर्चा की वजह?
रायपुर – सेन समाज का सम्मेलन था, सामाजिक सम्मान और समरसता का मंच था। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से लेकर विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह तक मौजूद थे, लेकिन राजधानी के चारों विधायक कार्यक्रम से गायब रहे। खास बात यह कि रायपुर उत्तर के पुरंदर मिश्रा, रायपुर दक्षिण के सुनील सोनी, रायपुर पश्चिम के राजेश मूणत और रायपुर ग्रामीण के मोतीलाल साहू निमंत्रण में विशिष्ट अतिथि थे। चारों की गैरमौजूदगी ने अब राजनीतिक हलकों में चर्चा छेड़ दी है। चिकित्सा महाविद्यालय परिसर स्थित अटल बिहारी वाजपेयी सभागार में आयोजित सेन शक्ति सम्मेलन एवं केश शिल्पी सम्मान समारोह में मुख्यमंत्री ने समाज के सामुदायिक भवन के लिए 50 लाख रुपये देने की घोषणा की। विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह, मंत्री गुरु खुशवंत साहेब और विधायक रिकेश सेन सहित कई प्रमुख चेहरे मंच पर मौजूद रहे। ऐसे में चारों विधायकों की एक साथ गैरमौजूदगी को महज संयोग माना जाए या इसके पीछे कोई सियासी संकेत है।
श्रीवास ने खुद घर जाकर दिया था न्योता –
इस पूरे मामले में गौरीशंकर श्रीवास ने किसी तरह की राजनीतिक नाराजगी या असहजता की बात नहीं कही। जब उनसे क्षेत्रीय विधायकों के कार्यक्रम में नहीं पहुंचने को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने स्वयं घर जाकर चारों विधायकों को आमंत्रित किया था। श्रीवास ने कहा कि विधायक कार्यक्रम में क्यों नहीं आए, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है। संभव है कि उनकी अपनी व्यस्तता रही हो। उन्होंने किसी तरह की टिप्पणी करने से इनकार करते हुए इसे विधायकों का व्यक्तिगत निर्णय बताया। यानी आयोजक की ओर से निमंत्रण में कोई कमी नहीं थी। इसके बावजूद चारों विशिष्ट अतिथियों का एक साथ मंच से दूर रहना ही इस आयोजन को राजनीतिक चर्चा का विषय बना रहा है।
मंच पर श्रीवास, नजरें सियासत पर –
इस चर्चा का एक सिरा सीधे गौरीशंकर श्रीवास से जुड़ता है। केश शिल्पी कल्याण बोर्ड की जिम्मेदारी मिलने के बाद श्रीवास की सक्रियता सामाजिक दायरे में भी दिखाई दे रही है। लेकिन उनकी पहचान केवल पद से नहीं बनी। कांग्रेस शासन के दौरान पीएससी विवाद से लेकर सड़क के आंदोलनों तक श्रीवास लगातार सक्रिय रहे। उनकी राजनीति की जमीन संघर्ष और आंदोलन से तैयार हुई है।
कार्यक्रम में विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह का उन्हें संघर्ष का दूसरा नाम कहना भी इसी पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।मुख्यमंत्री का उनके नेतृत्व पर भरोसा जताना और विधानसभा अध्यक्ष का सार्वजनिक रूप से उनकी भूमिका की सराहना करना, सेन समाज के मंच पर श्रीवास के बढ़ते प्रभाव की ओर संकेत करता है।
चारों की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी अलग –
पुरंदर मिश्रा और मोतीलाल साहू पहली बार विधायक बने हैं। सुनील सोनी पहली बार विधायक के तौर पर विधानसभा पहुंचे हैं, हालांकि वे सांसद और रायपुर के महापौर रह चुके हैं। वहीं राजेश मूणत लंबे राजनीतिक अनुभव और मंत्री पद की पृष्ठभूमि रखते हैं।
रायपुर की राजनीति में ये सभी स्थापित चेहरे हैं। ऐसे में जिस सामाजिक आयोजन में मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष मौजूद हों, वहां चारों स्थानीय विधायकों की एक साथ गैरमौजूदगी स्वाभाविक रूप से चर्चा पैदा करती है।
सामाजिक कार्यक्रम से दूरी क्यों?
यह विधायक बड़े कॉरपोरेट आयोजनों, उद्घाटनों और राजनीतिक कार्यक्रमों में अक्सर नजर आते हैं। फिर सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण इस आयोजन से दूरी क्यों रही? क्या यह महज व्यस्तता थी या इसके पीछे कोई और राजनीतिक वजह? इसका जवाब फिलहाल संबंधित विधायकों की ओर से सामने नहीं आया है। लेकिन सम्मेलन ने एक सवाल जरूर छोड़ दिया है क्या गौरीशंकर श्रीवास अब सिर्फ सेन समाज के संगठनात्मक चेहरे नहीं, बल्कि ऐसा उभरता हुआ सामाजिक राजनीतिक चेहरा हैं, जिसकी बढ़ती स्वीकार्यता रायपुर की सियासत में भी महसूस की जाने लगी है? और इस पूरे आयोजन की सबसे दिलचस्प तस्वीर शायद मंच पर मौजूद चेहरों की नहीं, बल्कि विशिष्ट अतिथियों के लिए रखी गई चार खाली कुर्सियों की रही।










