38 करोड़ का हरदीडीह एनीकट भ्रष्टाचार की भेंट! ड्राइंग-डिजाइन से डायफ्राम वॉल तक तकनीकी गड़बड़िया, कार्यपालन अभियंता को प्रमोशन तो मुख्य अभियंता को संविदा का इनाम –

38 करोड़ का हरदीडीह एनीकट भ्रष्टाचार की भेंट!
ड्राइंग-डिजाइन से डायफ्राम वॉल तक तकनीकी गड़बड़िया, कार्यपालन अभियंता को प्रमोशन तो मुख्य अभियंता को संविदा का इनाम –
रायपुर – वर्ष 2012-13 में महानदी पर ग्राम हरदीडीह (आरंग) में लगभग 38.13 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित हरदीडीह एनीकट किसानों की सिंचाई और जल संरक्षण की महत्वाकांक्षी परियोजना थी। 607 मीटर लंबी, 2.80 मीटर ऊंची और 40 रेडियल गेटों वाली इस संरचना की अनुमानित आयु कई दशकों की मानी जाती है, लेकिन निर्माण के चंद महीनो में ही धीरे धीरे दरारें आना शुरू हो गई। आज एक दशक बाद इसका 180 मीटर से अधिक का हिस्सा भ्रष्टाचार के बहाव में बह गया। और जो बचा हिस्सा है वह भी इस हालात में है कि अब न तो इसका मेंटनेंस हो सकता है न ही इसे सुधारा जा सकता है। मतलब यह करोड़ो की परियोजना पूरी तरह से भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई। किसानों के सिंचाई के लिए पानी भले खेतो तक न पहुँचा हो मगर इस भ्रष्टाचार में अधिकारी लाल पीले हो गए।
607 मीटर लंबी संरचना –
किसी भी एनीकट की मजबूती उसकी ऊपरी संरचना से नहीं, बल्कि उसकी नींव से तय होती है। हरदीडीह एनीकट में अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम दोनों ओर कट-ऑफ/डायफ्राम वॉल का प्रावधान किया गया था। यदि डायफ्राम वॉल कठोर चट्टान (Hard Rock) तक नहीं पहुंचती या निर्धारित गहराई तक नहीं बनाई जाती, तो पानी नींव के नीचे से रास्ता बनाता है। इसे इंजीनियरिंग की भाषा में पाइपिंग (Piping) कहा जाता है, जो धीरे-धीरे पूरी संरचना को भीतर से खोखला कर देती है। करोड़ो की इस परियोजना में भी यही हुआ पानी नींव के नीचे से रास्ता बनाता गया और इसी रास्ते से अधिकरियो के घर भरते चले गए।
ड्राइंग और डिज़ाइन पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
हरदीडीह एनीकट का निर्माण केवल कंक्रीट और लोहे का ढांचा खड़ा करने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसकी मजबूती पूरी तरह ड्राइंग-डिजाइन, फाउंडेशन, डायफ्राम वॉल, एप्रन, बोल्डर पिचिंग और गुणवत्ता नियंत्रण पर निर्भर थी। अनुबंध 4 फरवरी 2013 को हुआ और 3 फरवरी 2015 को निर्माण पूर्ण दिखा दिया गया। करीब 607 मीटर लंबी, 2.80 मीटर ऊंची और 40 रेडियल गेटों वाली इस परियोजना की डिजाइन लाइफ लगभग 50 वर्ष मानी गई थी, लेकिन कुछ ही वर्षों में इसमें दरारें और कटाव दिखाई देने लगे। किसी भी बैराज या एनीकट का डिज़ाइन नदी के प्रवाह, मिट्टी, चट्टान और अधिकतम बाढ़ (Design Flood) को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है। हरदीडीह एनीकट में अपस्ट्रीम स्लोप 1:1 और डाउनस्ट्रीम स्लोप 0.60:1 रखा गया। यही नहीं, बैराज का क्रेस्ट लेवल भी नदी तल से लगभग 20 सेंटीमीटर नीचे रखा गया। यदि ऐसी संरचना में हाइड्रोलिक डिज़ाइन और ऊर्जा अपव्यय (Energy Dissipation) का सही आकलन न किया जाए तो डाउनस्ट्रीम स्कॉर और फाउंडेशन पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। क्या यह डिज़ाइन वास्तविक नदी प्रवाह के अनुरूप था? यदि ड्राइंग और डिज़ाइन में ही त्रुटि रही हो, तो पूरी संरचना पर बाढ़ के समय अतिरिक्त दबाव पड़ना स्वाभाविक है। क्या मूल डिज़ाइन निर्धारित मानकों के अनुरूप था या नहीं। ड्राइंग डिजाइन बनाते समय व्यवस्था एनीकट को बचाने के लिए नही बल्कि ठेकेदार और अधिकारियो के हिसाब से डिजाइन कराई गई।
एप्रन और फ्लोर… क्या यहीं से शुरू हुआ कटाव?
एनीकट के डाउनस्ट्रीम हिस्से में पानी की ऊर्जा को नियंत्रित करने के लिए एप्रन (Apron), फ्लोर और ऊर्जा अपव्यय (Energy Dissipation System) सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यदि एप्रन पर्याप्त लंबाई या गहराई का न हो, तो तेज बहाव सीधे नदी तल को काटता है और स्कॉर (Scour) शुरू हो जाता है। स्कॉर बढ़ने पर फाउंडेशन के नीचे की मिट्टी बहने लगती है और पूरी संरचना अस्थिर हो जाती है। हरदीडीह एनीकट ऐसे ही नीचे की मिट्टी खसक गई और यह पूरी परियोजना धरासाई हो गई।
सुरक्षा पिचिंग भी मानकों पर सवाल –
परियोजना में डाउनस्ट्रीम सुरक्षा पिचिंग, अपस्ट्रीम फ्लोर और प्रोटेक्शन कार्य का भी प्रावधान था। नदी के तेज बहाव से संरचना की रक्षा के लिए बोल्डर पिचिंग और कंक्रीट ब्लॉकों का सही गहराई तक लगाया जाना आवश्यक होता है। यदि पिचिंग कम गहराई तक की गई हो या कंक्रीट ब्लॉकों के नीचे से पानी का बहाव शुरू हो गया हो, तो धीरे-धीरे पूरी सुरक्षा परत निष्प्रभावी हो जाती है। कंक्रीट ब्लॉक निर्धारित गहराई तक नहीं पहुंच पाए, जिससे नीचे से पानी का रिसाव (Under Seepage) बढ़ता गया। तकनीकी रूप से यही स्थिति पाइपिंग और फाउंडेशन फेलियर का कारण बनती है।
40 गेट होने के बावजूद क्यों नहीं बच सका एनीकट?
हरदीडीह एनीकट में 40 गेट, प्रत्येक 2.20 × 1.25 मीटर आकार के लगाए गए थे। लेकिन केवल अधिक गेट होना किसी परियोजना की मजबूती की गारंटी नहीं होता। बाढ़ के दौरान गेट संचालन समय पर और तकनीकी मानकों के अनुरूप हुआ या नहीं। यदि जल निकासी प्रभावित हुई हो, तो संरचना पर अतिरिक्त दबाव पड़ना स्वाभाविक है।
मेजरमेंट और गुणवत्ता परीक्षण पर भी उठ रहे हैं सवाल –
करीब 38.13 करोड़ रुपये की इस परियोजना का भुगतान निर्माण पूर्ण होने के बाद कर दिया गया। अब सवाल यह भी उठ रहा है कि निर्माण के दौरान गुणवत्ता परीक्षण, मापन (Measurement), सामग्री परीक्षण और साइट निरीक्षण कितनी गंभीरता से किए गए। निर्माण कार्य में किसी प्रकार की तकनीकी अनियमितता, माप में विसंगति या गुणवत्ता नियंत्रण में कमी रही या नहीं, यह केवल स्वतंत्र तकनीकी और वित्तीय ऑडिट से ही स्पष्ट हो सकेगा।
साल-दर-साल बढ़ती रही क्षति, लेकिन विभाग मौन क्यों रहा?
एनीकट में कटाव और क्षति कोई एक दिन में नहीं हुई। कई वर्षों से इसके कमजोर होने के संकेत मिल रहे थे। इसके बावजूद समय पर व्यापक तकनीकी परीक्षण, संरचनात्मक ऑडिट और स्थायी मरम्मत के बजाय नियमित रखरखाव के दावों तक ही मामला सीमित रहा। यदि समय रहते वैज्ञानिक मूल्यांकन कराया जाता, तो संभव है कि आज स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती। लेकिन सार दर साल परियोजना के नाम पर मेंटनेंस की राशि निकाली तो गई मगर वह राशि ठेकेदार और अधिकारियों के जेब तक ही पहुँच पाई जहाँ इस राशि का उपयोग होना था वहाँ तक पहुँचने के पहले ही राशि का बंदरबांट हो गया।
निर्माण के समय कौन थे जिम्मेदार?
परियोजना के निर्माण काल में जल संसाधन विभाग तत्कालीन सरकार के अधीन था। उस समय विभाग के मंत्री बृजमोहन अग्रवाल थे। निर्माण का ठेका सुनील अग्रवाल को मिला था, जो उस समय विभाग में प्रभावशाली ठेकेदारों में गिने जाते थे। परियोजना से जुड़े अधिकारियों में तत्कालीन कार्यपालन अभियंता सुरेश पांडेय (वर्तमान में मुख्य अभियंता, बिलासपुर), तत्कालीन मुख्य अभियंता संजय भागवत, इनके इस भ्रष्ट कारनामे का इन्हें ऐसा इनाम मिला कि यह सेवानिवृत्त के बाद भी 10 सालों से संविदा पोस्ट पर बैठकर मलाई छान रहे है। अब इसे करोड़ो के भ्रष्टाचार का इनाम कहिए या वरदहस्त यह तो जांच में पता चलेगा यही नही तत्कालीन एसडीओ गोपाल मेमन सहित अन्य अधिकारी इस भ्रष्ट तंत्र के हिस्सा रहे। अब यह जांच का विषय है कि डिज़ाइन स्वीकृति, निर्माण गुणवत्ता, तकनीकी परीक्षण और साइट सुपरविजन में किस स्तर पर क्या निर्णय लिए गए और क्या सभी प्रक्रियाओं का पालन हुआ।
याद नहीं…क्या 38 करोड़ की परियोजना की जिम्मेदारी भी भूल गई?
मामले में जब तत्कालीन कार्यपालन अभियंता सुरेश पांडेय से पक्ष जानने का प्रयास किया गया तो उन्होंने कहा कि मामला पुराना है, संभवतः अधिक गेट खोले गए होंगे और उन्हें ज्यादा याद नहीं है। वहीं तत्कालीन मुख्य अभियंता संजय भागवत ने भी इसे पुराना मामला बताते हुए विस्तृत टिप्पणी से परहेज किया। लेकिन सवाल यह है कि 38 करोड़ रुपये की सार्वजनिक परियोजना, जो आज गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त है, उसकी तकनीकी जवाबदेही क्या समय के साथ समाप्त हो जाती है?
जांच समिति बनी, लेकिन क्या पूरी सच्चाई सामने आएगी?
मई 2026 में मामले की जांच के लिए समिति गठित की गई। अब सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि जांच केवल कागजी औपचारिकता तक सीमित न रहे, बल्कि मूल ड्राइंग, डिज़ाइन, डायफ्राम वॉल, फाउंडेशन, एप्रन, स्कॉर, बोल्डर पिचिंग, गुणवत्ता परीक्षण, मापन पुस्तिका (Measurement Book), भुगतान प्रक्रिया और रखरखाव मद तक हर पहलू की स्वतंत्र तकनीकी एवं वित्तीय जांच की जाए। तभी यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह केवल प्राकृतिक आपदा का परिणाम था या निर्माण, डिज़ाइन और निगरानी में गंभीर तकनीकी चूक हुई।
सवाल सिर्फ एक एनीकट का नहीं, पूरी व्यवस्था का है हरदीडीह एनीकट का मामला केवल एक क्षतिग्रस्त संरचना का नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन से बनने वाली परियोजनाओं की विश्वसनीयता का भी है। यदि 38 करोड़ रुपये की परियोजना अपनी अनुमानित आयु से दशकों पहले ही जवाब दे देती है, तो यह केवल मरम्मत का विषय नहीं रह जाता। यह तय होना चाहिए कि डिज़ाइन किसने स्वीकृत किया, गुणवत्ता किसने प्रमाणित की, निर्माण की निगरानी किसने की, रखरखाव पर खर्च हुई राशि का उपयोग कैसे हुआ और यदि कहीं तकनीकी या प्रशासनिक लापरवाही हुई तो उसकी जवाबदेही किसकी है। जब तक इन सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं मिलते, हरदीडीह एनीकट केवल टूटी हुई संरचना नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये की सार्वजनिक परियोजनाओं पर उठता एक बड़ा सवाल बना रहेगा।










