भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा 38 करोड़ का हरदीडीह एनीकट, तत्कालीन मंत्री से लेकर इंजीनियरों की भूमिका सवालों में, करोड़ों खर्च, जवाबदेही शून्य घेरे में पूरा विभाग –

भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा 38 करोड़ का हरदीडीह एनीकट, तत्कालीन मंत्री से लेकर इंजीनियरों की भूमिका सवालों में, करोड़ों खर्च, जवाबदेही शून्य घेरे में पूरा विभाग –

रायपुर : – वर्ष 2012-13 में लगभग 38 करोड़ रुपये की लागत से महानदी पर निर्मित हरदीडीह एनीकट आज अपनी निर्धारित आयु से बहुत पहले ही गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो चुका है। इसका 180 मीटर से अधिक हिस्सा बह गया है, जबकि शेष संरचना भी लगातार कमजोर होती जा रही है।

जिस परियोजना को दशकों तक किसानों और क्षेत्र के लोगों के लिए जीवनरेखा बनना था, वह महज 10-12 वर्षों में ही ढहने की स्थिति में पहुंच गई। यह केवल एक निर्माण के टूटने का मामला नहीं, बल्कि सरकारी परियोजनाओं की गुणवत्ता, निगरानी और जवाबदेही पर बड़ा सवाल है।

38 करोड़ का भुगतान पूरा, लेकिन टिक नहीं पाई परियोजना –
निर्माण कार्य पूरा होने के साथ ही ठेकेदार को परियोजना का भुगतान भी कर दिया गया। लेकिन अधिकारियों ने पलट कर कभी इसकी सुध नही ली। जबकिं बताया यह जाता है कि निर्माण कार्य तकनीकी मानकों ने अनुरूप बनाया ही नही गया न ही इसकी गुणवत्ता का परीक्षण किया गया। उक्त करोड़ो का ठेका सुनील अग्रवाल ने 6 % बिलो में काम किया था। 38 करोड़ के इस एनीकट निर्माण में ठेकेदार अधिकारियो ने जमकर भ्रष्टाचार किया। अधिकारी भी इस ठेकेदार के आगे नतमस्तक हुआ करते थे चूँकि यह ठेकेदार तत्कालीन समय मे मंत्री के करीबी ठेकेदार की लिस्ट में शामिल थे। यही कारण था कि मंत्री से लेकर अधिकारी सब लाल पीले हो गए मगर एनीकट वह भ्रष्टाचार में बहता चला गया।

साल-दर-साल टूटता रहा एनीकट, लेकिन विभाग मौन रहा –
यह जो बहाव है यह आज की कहानी नहीं है। एनीकट में कई वर्षों से कटाव और क्षति दिखाई दे रही थी। जिसकी शिकायतें भी होती रहीं, लेकिन किसी व्यापक तकनीकी जांच या जिम्मेदारी तय करने की कार्रवाई नही हुई। जबकिं साल दर साल मेंटनेंस का बजट बराबर निकलता रहा अधिकारी मेंटनेंस से जेब भरते रहे और हालात यह हो गई कि आज एनीकट बहने की स्थिति में पहुँच गया।

निर्माण के समय कौन थे जिम्मेदार?
परियोजना के निर्माण काल में जल संसाधन विभाग की जिम्मेदारी तत्कालीन सरकार के अधीन थी। उस समय विभाग के मंत्री बृजमोहन अग्रवाल थे। परियोजना से जुड़े अधिकारियों में तत्कालीन कार्यपालन अभियंता सुरेश पांडेय, जो आज मुख्य अभियंता दुर्ग में पदस्थ है। तत्कालीन मुख्य अभियंता संजय भागवत जो लगभग 10 वर्षों से इसी विभाग में संविदा की मलाई छान रहे है। तत्कालीन एसडीओ गोपाल मेमन तथा विभाग के अन्य अधिकारी शामिल थे। इन अधिकारियो पर न तब जांच हई न अब जांच हो रही है आज कोई अधिकारी प्रमोशन पर है किसी को भी विभाग भ्रष्टाचार के लिए संविदा में ढो रहा है। इन सभी की भूमिका और उस समय की तकनीकी स्वीकृतियों, गुणवत्ता परीक्षण तथा निगरानी व्यवस्था की जांच अब जरूरी हो गई है।

याद नहीं जब पूछा गया सवाल –
मामले में जब तत्कालीन कार्यपालन अभियंता सुरेश पांडेय से बात की गई तो उन्होंने कहा शायद गेट ज्यादा खोल दिए गए होंगे। मामला 2012 का है, इसलिए ज्यादा याद नहीं है। वहीं संजय भागवत ने भी इसे पुराना मामला बताते हुए विस्तृत टिप्पणी करने से परहेज किया। लेकिन सवाल यह है कि 38 करोड़ रुपये की परियोजना, जो आज टूट रही है, क्या उसकी जिम्मेदारी भी समय के साथ याददाश्त से मिट जाती है?

10 साल बाद बनी जांच समिति –
अब आगे सुनिए मई 2026 में इस मामले की जांच के लिए समिति गठित की गई। पहले समिति के निरीक्षण को लेकर कई तरह की आपत्तियां उठीं। विभागीय सुत्र बताते है कि जांच समिति को स्थल तक पहुँचने ही नही दिया गया। ऊपर ही ऊपर मामले को सेटल किया गया कारण यह था कि अगर मौके का निरीक्षण हो जाता तो 12 साल पहले बने घटिया और निम्न स्तर के काम की पोल ही नही खुलती बल्कि मेंटनेंस के नाम पर कितनी बड़ी राशि का बंदरबांट हो गया इसकी भी पोल खुल जाती। लिहाजा जांच टीम को मौके तक जाने का मौका ही नही मिला। अगर इसकी जांच निष्पक्ष और व्यापक होगी, तभी यह स्पष्ट हो सकेगा आखिर करोड़ो के इस परियोजना घोटाले में कौन कौन शामिल था और किनकी किनकी जेबें भरी गई।

गेट संचालन पर भी उठे सवाल –
हाल की घटना में स्थानीय लोगों का कहना है कि जिम्मेदार अधिकारियों को पहले से सूचना थी। यह भी दावा किया जा रहा है कि एनीकट में कई गेट होने के बावजूद सीमित संख्या में ही गेट खोले गए। विभाग के ईई से जब हमने इनका पक्ष जानना चाहा तो उन्होंने कॉल नही उठाया।

यदि सार्वजनिक धन से बनी करोड़ों रुपये की परियोजना समय से पहले क्षतिग्रस्त हो जाती है, तो केवल मरम्मत पर्याप्त नहीं है। आवश्यक है कि पूरी परियोजना की स्वतंत्र तकनीकी जांच, वित्तीय ऑडिट और जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया पारदर्शी ढंग से हो। इससे यह स्पष्ट होगा कि यह केवल तकनीकी विफलता थी या निर्माण और निगरानी में गंभीर चूक हुई थी।

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