डीजीपी चयन पर नया विवाद यूपीएससी को भेजे गए चार नाम, वरिष्ठता और हस्तक्षेप पर उठे सवाल –

डीजीपी चयन पर नया विवाद यूपीएससी को भेजे गए चार नाम, वरिष्ठता और हस्तक्षेप पर उठे सवाल –
रायपुर : – छत्तीसगढ़ में डीजीपी नियुक्ति को लेकर चल रहा विवाद अब केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और संस्थागत बहस का विषय बन चुका है। दरअसल राज्य सरकार द्वारा अप्रैल-मई 2025 में यूपीएससी (संघ लोक सेवा आयोग) को चार वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों का पैनल भेजा गया था। इस पैनल में चार आईपीएस अधिकरियो का नाम था जिसमे क्रमशः पवन देव , अरुण देव गौतम जीपी सिंह , हिमांशु गुप्ता शामिल थे। लेकिन इसी पैनल को लेकर अब सबसे बड़ा सवाल वरिष्ठता, पारदर्शिता और चयन प्रक्रिया पर उठ रहा है।
कल्लूरी क्यों बाहर?
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, वरिष्ठता के आधार पर इस पैनल में शिवराम प्रसाद कल्लूरी (SRP Kalluri) का नाम होना चाहिए था। लेकिन उनकी जगह हिमांशु गुप्ता को शामिल किया गया। उल्लेखनीय है कि हिमांशु गुप्ता मूलतः त्रिपुरा कैडर के अधिकारी हैं और वरिष्ठता क्रम में नीचे माने जाते हैं, जबकि कल्लूरी को पहले डीजी पद पर प्रमोट किया जाना चाहिए था। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या वरिष्ठता के स्थापित नियमों की अनदेखी की गई?
यूपीएससी में हस्तक्षेप के आरोप –
इस पूरी प्रक्रिया में एक और गंभीर आरोप सामने आ रहा है। बताया जा रहा है कि पूर्व मुख्य सचिव अमिताभ जैन, जिन्हें पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का करीबी माना जाता है, ने इस चयन प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी का परिणाम है कि उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद वर्तमान सरकार द्वारा सूचना आयुक्त बनाया गया। आरोप है कि उनके हस्तक्षेप से यूपीएससी की बैठक प्रभावित हुई। जिसमें पवन देव (1992 बैच) और जीपी सिंह (1994 बैच) दोनों के नाम चयन सूची से बाहर कर दिए गए। अब यह निर्णय किन आधारों पर लिया गया, यह जांच का विषय है, लेकिन इसका असर राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था पर साफ दिखाई दे रहा है।
अमिताभ जैन सबसे लंबा कार्यकाल, सबसे बड़े सवाल –
अमिताभ जैन को कांग्रेस सरकार के दौरान मुख्य सचिव बनाया गया था और वे तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेहद करीबी माने जाते रहे हैं। सरकार बदली, सत्ता बदली और सुशासन की नई शुरुआत का दावा किया गया, लेकिन प्रशासनिक शीर्ष पर बदलाव की उम्मीद के विपरीत, अमिताभ जैन न केवल पद पर बने रहे बल्कि उन्हें विस्तार (Extension) भी मिला। उनका कार्यकाल राज्य के इतिहास में सबसे लंबा और सबसे ज्यादा विवादों से जुड़ा माना जा रहा है। इसी दौरान शराब घोटाला, कोल घोटाला, महादेव सट्टा ऐप मामला और डीएमएफ फंड विवाद जैसे बड़े मामले सुर्खियों में रहे। शराब घोटाले के संदर्भ में स्थिति और भी सवाल खड़े करती है जहां तत्कालीन आबकारी आयुक्त निरंजन दास और एमडी अरुणमती त्रिपाठी जेल में हैं, वहीं उस समय आबकारी विभाग के अध्यक्ष के रूप में शीर्ष प्रशासनिक जिम्मेदारी संभालने वाले मुख्य सचिव अमिताभ जैन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई और वे बाहर हैं।बावजूद इसके वे बिना किसी दाग के सेवानिवृत्त हुए और बाद में उन्हें राज्य सूचना आयुक्त बनाया गया। बताया जाता है कि इस नियुक्ति में भी भूपेश बघेल की भूमिका महत्वपूर्ण रही। ऐसे में सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या सरकार बदली है या सिस्टम वही है? क्या निर्णय आज भी पुराने प्रभाव में लिए जा रहे हैं?
जीपी सिंह मामला बरी, प्रमोट… फिर भी बिना पद –
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील पहलू जीपी सिंह का मामला है। पूर्ववर्ती सरकार के दौरान उन पर गंभीर आरोप लगाए गए। न्यायालय ने उन्हें दोषमुक्त किया उन्हें डीजी पद पर प्रमोट भी किया गया। लेकिन इसके बावजूद एक साल से अधिक समय से वे बिना किसी पद के हैं यह स्थिति प्रशासनिक इतिहास में बेहद असामान्य मानी जा रही है।
एक पद खाली, एक पर बोझ… और तीन नए पैनल क्यों?
स्थिति और भी जटिल तब हो जाती है जब राज्य में एक डीजी स्तर का पद खाली है। एक डीजी (जीपी सिंह) बिना पद के हैं। वहीं अरुण देव गौतम के पास कई विभागों का केंद्रीकरण है इसके बावजूद विभिन्न कारण बताते हुए अलग से तीन नामों का पैनल भेजा गया जिसमे SRP कल्लूरी , विवेकानंद सिन्हा , प्रदीप गुप्ता का नाम गृह विभाग भेजा गया है। वही जब एक डीजी खाली है, तो नई नियुक्तियों के लिए पैनल क्यों भेजा गय यह बड़ा सवाल है। क्या राज्य में डीजी स्तर के पदों का विस्तार किया जा रहा है? क्या हर संभाग में डीजी बैठाने की तैयारी है? और जब सरकार खुद कह रही है कि नक्सल समस्या अब नियंत्रण में है तो इन पदों की तत्काल जरूरत क्यों आन पड़ी।
प्रभारी डीजीपी और खबर से शुरू हुआ दौरा –
फरवरी 2025 से अरुण देव गौतम प्रभारी डीजीपी हैं। लेकिन जैसे ही खबर चली कि उन्हें नियमित डीजीपी बनाया जा सकता है उनके दौरे शुरू हो गए अम्बिकापुर, रायगढ़, बिलासपुर कानून व्यवस्था को लेकर अचानक सक्रियता बढ़ी। लेकिन जैसे ही फाइल रुकी दौरे भी थम गए। यह सवाल खड़ा करता है क्या प्रशासनिक सक्रियता अब खबर आधारित हो गई है?
क्या ‘तेजतर्रार डीजीपी’ से परहेज?
सूत्रों के अनुसार यह भी चर्चा है कि राजनीतिक स्तर पर यह इच्छा नहीं है कि राज्य में कोई सख्त और तेजतर्रार डीजीपी बैठे। इसका कारण भी साफ है कि कानून व्यवस्था चुनावी राजनीति का अहम मुद्दा बनती है। ऐसे में यह आशंका जताई जा रही है कि नियुक्ति प्रक्रिया को जानबूझकर लंबा खींचा जा रहा है। ताकि राज्य में तेजतर्रार डीजीपी न बैठाया जा सके और आगामी चुनाव में विपक्ष का एजेंडा मजबूत दिखलाई पड़े।
इन सबमे सवाल अब ये हैं कि क्या यूपीएससी को भेजा गया पैनल नियमों के अनुरूप था? वरिष्ठता के आधार पर चयन क्यों नहीं हुआ? क्या चयन प्रक्रिया में बाहरी हस्तक्षेप हुआ? एक डीजी बिना पद और कई पैनल क्या यह प्रशासनिक विरोधाभास नहीं? क्या राज्य में डीजी स्तर के पदों का अनियंत्रित विस्तार होने वाला है? और सबसे बड़ा क्या वाकई सुशासन लागू है या पुराना प्रभाव अब भी कायम है?
छत्तीसगढ़ में डीजीपी नियुक्ति अब केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है। यह अब एक जटिल समीकरण बन चुका है वरिष्ठता बनाम चयन, प्रक्रिया बनाम प्रभाव, संरचना बनाम सियासत जब एक तरफ अधिकारी बिना पद के हैं और दूसरी तरफ नए पैनल तैयार हो रहे हैं, तो यह साफ संकेत है कि मामला सामान्य नहीं है। अब पूरा राज्य इस इंतजार में है कि फैसला नियमों के आधार पर होगा या प्रभाव के आधार पर।










