अयोध्या में चंदे का खेल, अब विधानसभा में चढ़ावे का खेल! हिसाब मांगा तो कर्मचारी की फाइल खुल गई –

अयोध्या में चंदे का खेल, अब विधानसभा में चढ़ावे का खेल! हिसाब मांगा तो कर्मचारी की फाइल खुल गई –

रायपुर – अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के दौरान चंदे को लेकर उठे विवादों और हेराफेरी के आरोपों की गूंज देश ने सुनी थी। अब छत्तीसगढ़ की विधानसभा से भी आस्था के पैसे को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सवालों की दिशा ही बदल दी है। यहां मामला मंदिर के चढ़ावे के हिसाब का है और चढ़ावे का हिसाब मांगने वाला खुद विधानसभा सचिवालय का एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी है। संदीप पांडे ने सवाल उठाया कि मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए पैसे का पूरा हिसाब सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता, लेकिन इसके बाद अब उन्हीं की सेवा से जुड़ी फाइल खुल गई है।

विधानसभा परिसर से जुड़े मंदिर में बनी समिति के अध्यक्ष विधानसभा सचिवालय के अंडर सेक्रेटरी सुकदेव हैं। संदीप पांडे ने मंदिर में आने वाले चढ़ावे की राशि, उसके खर्च और हिसाब-किताब में पारदर्शिता की मांग की। सवाल बेहद सामान्य था आखिर श्रद्धालुओं की आस्था से आने वाला पैसा कितना है और उसका उपयोग कहां हो रहा है?

लेकिन इस पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संबंधित मंदिर विधानसभा के शासकीय परिसर या विधानसभा सचिवालय के विधिवत प्रशासनिक ढांचे का हिस्सा नहीं है। मंदिर में बनाई गई समिति भी कोई वैधानिक शासकीय समिति नहीं है। ऐसे में मंदिर समिति और चढ़ावे के विवाद को विधानसभा सचिवालय के एक कर्मचारी की शासकीय सेवा से जोड़कर उसके खिलाफ कार्रवाई की दिशा में बढ़ना अपने आप में गंभीर सवाल खड़ा करता है।

लेकिन इसके बाद घटनाक्रम बदलता गया। पहले संदीप पांडे की बस पास सुविधा समाप्त हुई और अब उनकी उम्र और सेवा अवधि से जुड़ी वह फाइल भी खुल गई है, जिसमें 50 वर्ष की आयु अथवा 20 वर्ष की सेवा पूरी करने वाले कर्मचारियों के सेवा अभिलेखों की समीक्षा की जा रही है। शिकायतकर्ता कर्मचारी को प्रताड़ित करने की बजाय आखिर मंदिर के चढ़ावे के हिसाब की जांच क्यों नहीं हो रही, अब पूरा मामला इसी सवाल के इर्द-गिर्द खड़ा है।

विधानसभा सचिवालय के दस्तावेज बताते हैं कि 29 जुलाई 2026 को ऐसे कर्मचारियों के सेवा-अभिलेखों की समीक्षा के लिए समिति का गठन किया गया। समिति के अध्यक्ष विधानसभा सचिव दिनेश शर्मा हैं। उनके साथ उप सचिव (लेखा) आशीष शुक्ला, उप सचिव (विधान) दिनेश त्रिवेदी और उप सचिव (प्रश्न) सुधीर शर्मा सदस्य हैं।

इसके बाद 50 वर्ष की आयु अथवा 20 वर्ष की सेवा पूरी कर चुके कर्मचारियों के नाम और सेवा-अभिलेख मंगाए गए। प्रक्रिया छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1976 के Rule 42 सहित संबंधित सेवा नियमों के तहत शुरू की गई है।

लेकिन यहां सबसे अहम तथ्य यह है कि Rule 42 किसी कर्मचारी की नौकरी खत्म करने का ऑटोमेटिक बटन नहीं है। यह कर्मचारियों के संपूर्ण सेवा-अभिलेखों की समीक्षा की प्रक्रिया है। यानी दस्तावेज अभी सीधे संदीप पांडे को अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने का आदेश नहीं हैं, बल्कि उस प्रक्रिया की शुरुआत दिखाते हैं, जिसके दायरे में उनकी सेवा भी आ सकती है।
और यहीं इस पूरी कहानी की टाइमिंग सवाल खड़े करती है।

एक तरफ मंदिर के चढ़ावे का हिसाब मांगने वाला कर्मचारी और दूसरी तरफ उसके खिलाफ पहले सुविधाओं पर असर, फिर सेवा-अभिलेखों की समीक्षा। क्या दोनों घटनाएं एक-दूसरे से अलग हैं या चढ़ावे का हिसाब मांगने के बाद एक छोटे कर्मचारी के सामने प्रशासनिक ताकत खड़ी हो गई?

यह सवाल इसलिए और बड़ा है, क्योंकि विधानसभा वह संस्था है जहां हर दिन हिसाब मांगा जाता है। विधायक सरकार से पूछते हैं—कितना पैसा आया, कहां खर्च हुआ, किस योजना में कितना गया? उसी व्यवस्था से जुड़े मंदिर में यदि एक कर्मचारी श्रद्धालुओं के चढ़ावे का हिसाब मांगता है, तो उसके जवाब में चढ़ावे का रजिस्टर सामने आने के बजाय उसकी अपनी सेवा की फाइल समीक्षा के लिए चली जाती है।

मामले में अब मंदिर समिति को भी जवाब देना चाहिए कि कितना चढ़ावा आया, किसके पास जमा हुआ, कहां खर्च किया गया, क्या उसका नियमित आय-व्यय रजिस्टर है और क्या कभी स्वतंत्र ऑडिट कराया गया? क्योंकि चढ़ावा किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होता। वह श्रद्धालुओं की आस्था का धन है। यदि चढ़ावे के हिसाब को लेकर संदीप पांडे की शिकायत गलत है तो निष्पक्ष जांच में वह साफ हो जाएगी, लेकिन शिकायतकर्ता कर्मचारी को प्रताड़ित करना और मूल शिकायत की जांच को दरकिनार कर देना किसी समाधान का रास्ता नहीं हो सकता।

यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व वाली सरकार सुशासन, धर्म और सनातन आस्था के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को लगातार प्रमुखता से सामने रखती रही है। सरकार धार्मिक आयोजनों, आस्था के केंद्रों और सनातन परंपराओं के संरक्षण को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जताती रही है।

ऐसे में सवाल केवल मंदिर समिति या विधानसभा सचिवालय के कर्मचारी तक सीमित नहीं रह जाता। यदि उसी विधानसभा से जुड़े मंदिर में श्रद्धालुओं के चढ़ावे के हिसाब पर सवाल उठाने वाले शिकायतकर्ता कर्मचारी को प्रताड़ित करने की नौबत आ रही है और मूल शिकायत की पारदर्शी जांच नहीं हो रही, तो फिर सवाल सुशासन की उस कसौटी से भी है, जिस पर सरकार खुद को खरा साबित करने का दावा करती है।

सुशासन का अर्थ केवल सड़क, बिजली, पानी और योजनाएं नहीं होता। सुशासन का असली मतलब जवाबदेही भी होता है। और जब मामला जनता की धार्मिक आस्था से जुड़े पैसे का हो, तब जवाबदेही और भी ज्यादा जरूरी हो जाती है।

अयोध्या में चंदे के खेल को लेकर सवाल उठे थे। अब विधानसभा से जुड़े मंदिर में चढ़ावे का हिसाब सामने आने से पहले सवाल उठाने वाले कर्मचारी की फाइल खुलना अपने आप में इस पूरी कहानी को गंभीर बना देता है। संदीप पांडे ने मंदिर का हिसाब मांगा था। अब मामला यहां पहुंच गया है कि मंदिर के चढ़ावे का हिसाब कब खुलेगा और उससे पहले सवाल पूछने वाले कर्मचारी की फाइल में क्या फैसला होगा?

विधानसभा की इस सीरीज में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है चढ़ावा कितना आया, इसका जवाब बाद में मिलेगा या पहले हिसाब मांगने वाले कर्मचारी का ही हिसाब कर दिया जाएगा?

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