पहले कहा था एक जून को झोला उठाएगा और हैदराबाद जाएगा, अब कह रहा है दफ्तर-दफ्तर घूमेगा, हैदराबाद नहीं जाएगा पहले नई कुर्सी ढूंढेगा!

पहले कहा था एक जून को झोला उठाएगा और हैदराबाद जाएगा, अब कह रहा है दफ्तर-दफ्तर घूमेगा, हैदराबाद नहीं जाएगा पहले नई कुर्सी ढूंढेगा!
रायपुर – वन विभाग के गलियारों में इन दिनों एक पुराना वाक्य फिर चर्चा में है। बताया जाता है कि एक साहब रिटायरमेंट से पहले बड़े आत्मविश्वास से कहा करते थे कि एक जून को “हम झोला उठाएगा और सीधे हैदराबाद निकल जाएगा”। लेकिन राजनीति और नौकरशाही की दुनिया में कैलेंडर की तारीखें बदलते ही इरादे भी बदल जाते हैं। अब कह रहे कि हम कही नही जाएगा दफ्तर दफ्तर घूमेगा और नई कुर्सी तलाशेगा।
इधर एक जून गुजर गई दो जून भी गुजर गई। हैदराबाद की फ्लाइट भी छूट गई या फिर टिकट ही कैंसिल हो गई। क्योंकि साहब अब भी रायपुर के सत्ता गलियारों में सक्रिय बताए जा रहे हैं।
एक दफ्तर से भगाए गए, दूसरे दफ्तर से निकाले गए, किसी ने फोन नही उठाया तो कोई मिलना भी मुनासिफ नही समझा।
अब फर्क बस इतना है कि पहले यह साहब आरोपो की फाइलों के बीच दिखाई देते थे, अब मुलाकातों के बीच दिखाई दे रहे हैं। और तभी सामने आती है एक तस्वीर। तस्वीर किसी समर्थक ने नहीं डाली। किसी मित्र ने नहीं डाली। किसी फैन क्लब ने नहीं डाली। बल्कि तस्वीर सीधे एक मंत्री के आधिकारिक फेसबुक अकाउंट से साझा होती है। जिसमे कैप्शन छोटा है, लेकिन चर्चा लंबी हो गई है। बताया जाता है कि यह सौजन्य भेंट है लेकिन अचानक यह भेंट मुलाकात की जरूरत आखिर क्यों पड़ी।
आजकल राजनीति में लोग तस्वीर नहीं देखते, तस्वीर के पीछे का संदेश देखते हैं। सवाल यह नहीं कि गुलदस्ता किसने दिया। सवाल यह है कि गुलदस्ता क्या कह रहा है? क्या यह सिर्फ शिष्टाचार भेंट है? क्या यह सम्मान है? या फिर यह उस वर्ग के लिए संकेत है जो पिछले कुछ दिनों से मान बैठा था कि साहब की राजनीतिक यात्रा समाप्त हो चुकी है?
वन विभाग के गलियारों में तो अब मजाक भी चल पड़ा है कि हैदराबाद जाने वाला झोला अभी भी पैक है, लेकिन साहब ने उसे अलमारी में रख दिया है। पहले आयोग, फिर मंडल, फिर परिषद… कहीं न कहीं तो नई कुर्सी मिलेगी। तस्वीर में दिख रहा गुलदस्ता अब विभागीय चर्चाओं में फूल कम और संकेत ज्यादा बन गया है। कुछ लोग इसे सम्मान का प्रतीक बता रहे हैं, तो कुछ इसे संभावनाओं का। कुछ इसे शिष्टाचार कह रहे हैं, तो कुछ इसे भविष्य की भूमिका का ट्रेलर। सत्ता के गलियारों में एक पुरानी कहावत है जब कोई तस्वीर खुद चलकर जनता के सामने आती है, तो उसका मकसद सिर्फ फोटो एलबम भरना नहीं होता।
अब यह गुलदस्ता सिर्फ गुलदस्ता है या किसी संभावित अभयदान, स्वीकार्यता या नई भूमिका का प्रतीक इसका जवाब आने वाला समय देगा। फिलहाल इतना तय है कि हैदराबाद अभी दूर है, और रायपुर के दफ्तरों का चक्कर जारी है।










