अफ़सर-ए-आ’ला (हर रविवार को सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(हर रविवार को सुशांत की कलम से)
सूखा नशा –
दुर्ग जिले के ग्राम समोदा में पकड़ी गई अफ़ीम की खेती ने प्रदेश की राजनीति में बड़ा तूफान खड़ा कर दिया है। आरोप है कि यह खेत भाजपा से जुड़े किसान नेता विनायक ताम्रकार का है। तस्वीरें सामने आते ही पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सीधे मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और गृहमंत्री विजय शर्मा से जवाब मांगा है। सवाल यह उठाया जा रहा है कि अगर प्रदेश में “सूखे नशे” के खिलाफ सख्ती का दावा है, तो इतनी बड़ी अफ़ीम की खेती महीनों तक चलती कैसे रही। मामला यहीं नहीं रुकता विपक्ष ने नव्या मलिक का नाम भी उठाया है, जिसका जिक्र पहले कथित तौर पर सरकारी सूची में बताया गया, लेकिन बाद में वह नाम गायब हो गया। अब पूछा जा रहा है कि आखिर यह नाम सूची से बाहर कैसे हुआ और किसके निर्देश पर हटाया गया। विपक्ष यह भी सवाल कर रहा है कि विनायक ताम्रकार का मुख्यमंत्री निवास में आना-जाना कब-कब रहा और उनके किन-किन नेताओं व अधिकारियों से संबंध हैं। अब प्रदेश की राजनीति में असली सवाल यही है क्या यह मामला सिर्फ एक खेत तक सीमित रहेगा या फिर उस पूरे नेटवर्क तक पहुँचेगा जहाँ से सूखे नशे की कहानी शुरू होती है। क्योंकि जनता अब जवाब चाहती है, बयान नहीं।
संपत्ति दोगुनी और अपराध चौगुने
प्रदेश की खबरों को एक साथ रखकर देखिए तो तस्वीर कुछ अलग ही बनती है। कहीं खेतों में अफ़ीम की खेती पकड़ी जा रही है, कहीं नकाबपोश घरों में घुसकर हमला कर रहे हैं, तो कहीं पूरे गांव में घरों को आग के हवाले कर दिया जा रहा है। राजधानी भी अब इन खबरों से दूर नहीं रही। त्योहार के रंगों के बीच खून की सुर्खियाँ आ रही हैं और लोग पूछ रहे हैं कि आखिर यह प्रदेश किस दिशा में जा रहा है। इसी बीच एक और दिलचस्प खबर फाइलों से निकलकर सामने आई पुलिस के मुखिया की घोषित संपत्ति एक साल में लगभग दोगुनी हो गई। कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी जिन कंधों पर है, उनकी संपत्ति के आंकड़े भी लोगों की जिज्ञासा का विषय बन गए हैं। आम आदमी यह गणित समझने की कोशिश कर रहा है कि उसकी कमाई वहीं खड़ी रहती है, लेकिन कुछ आंकड़े हर साल तेज़ी से आगे कैसे बढ़ जाते हैं। उधर जमीन पर अपराध की खबरें बढ़ रही हैं और इधर फाइलों में वही पुरानी पंक्ति लिखी जा रही है जांच जारी है।
बगुला बैठा दरबार में, शहर पूछे कानून कहाँ?
राजधानी में कमिश्नर सिस्टम लागू हुआ तो कहा गया था कि अब कानून व्यवस्था की तस्वीर बदलेगी। लेकिन शहर की गलियों में आज भी वही सवाल घूम रहा है क्या सचमुच कुछ बदला है? कमिश्नर की नियुक्ति को लेकर उस वक्त कहा गया कि यह “हाउस की पसंद” है, मगर गलियारों में फुसफुसाहट कुछ और ही कहानी सुनाती रही। असली पसंद उस बगुले की बताई गई जो भगत बनकर ऊपर बैठा रहता है और हर चाल पर नजर गड़ाए रहता है। उधर शहर का हाल देखिए। राजधानी के बीचों-बीच ऐसे इलाके हैं जहाँ खुलेआम नशे के कारोबार की शिकायतें आम हैं। रात ढलते ही क्लब और अय्याशी के अड्डों की चर्चा शुरू हो जाती है और हालात का अंदाज़ा इसी से लगाइए कि होली के दिन महज पाँच घंटे में तीन हत्याएँ हो गईं। त्योहार के रंग के बीच खून की खबरें शहर की असल तस्वीर दिखा गईं।
लेकिन कार्रवाई कहाँ दिखती है? तस्वीरें बस सड़क किनारे जेब चेकिंग की वायरल होती हैं। बड़े मामलों में जांच की घोषणा होती है, फिर माफीनामा आता है और फाइल ठंडी पड़ जाती है। इसलिए शहर अब एक ही सवाल पूछ रहा है कमिश्नर सिस्टम व्यवस्था बदलने आया था या सिर्फ कुर्सी बदलने?
रेत, रुतबा और उड़ता हुआ विमान –
राजधानी से लगे एक इलाके में इन दिनों रेत का कारोबार इस तरह फल-फूल रहा है कि नदी से ज्यादा ट्रकों की आवाज सुनाई देती है। दिन हो या रात, मशीनें और हाइवा बिना थके काम कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि जिस इलाके में यह सब हो रहा है, वहीं से एक ऐसे जनप्रतिनिधि आते हैं जो पहली बार सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़कर सीधे मंत्री की कुर्सी तक पहुँचे। उनकी सक्रियता भी कम रोचक नहीं है। कभी किसी बाबा को लेने सरकारी विमान उड़ जाता है, तो कभी वही विमान लंबी यात्राओं पर निकल पड़ता है। उधर नदी किनारे रेत की परतें गायब हो रही हैं और इधर सत्ता की चमक और बढ़ती जा रही है। लोग पूछ रहे हैं अगर सबको पता है कि रेत कहाँ से निकल रही है, तो कार्रवाई क्यों नहीं होती? क्योंकि कानून की किताब में अवैध खनन अपराध है, लेकिन जमीन पर कई बार यह कारोबार व्यवस्था से भी तेज़ दौड़ता नजर आता है।
बोतल, पांचवीं मंज़िल और क्रिकेट बोर्ड का कनेक्शन –
राजधानी में इन दिनों शराब की बोतलों से ज्यादा चर्चा उनके पीछे चल रहे खेल की हो रही है। ऊपर से सब कुछ नियमों और नीतियों के मुताबिक दिखाई देता है, लेकिन गलियारों में अलग ही कहानी घूम रही है। कहा जाता है कि असली खेल दुकानों में नहीं, बल्कि वहाँ शुरू होता है जहाँ फैसले लिखे जाते हैं। राजधानी की नौकरशाही में “पांचवीं मंज़िल” अब एक जगह नहीं, बल्कि एक संकेत बन चुकी है उस जगह का जहाँ कई फैसलों की दिशा तय होती है। फुसफुसाहट में एक और दिलचस्प किरदार आता है राजनांदगांव का एक बड़ा कारोबारी और उसका बेटा, जिसका नाम क्रिकेट बोर्ड की बैठकों में भी सुना जाता है। कहा जाता है कि इसी नेटवर्क और पहुँच का हवाला देकर कई जगहों पर प्रभाव बनाया जाता है। यहीं से गलियारों में एक और नाम धीरे-धीरे फुसफुसाहट का हिस्सा बन जाता है “नंबर दो”। अब यह नाम सच में इस कहानी से जुड़ा है या सिर्फ रुतबे की चमक दिखाने के लिए लिया जाता है, यह अभी भी एक रहस्य ही बना हुआ है। लेकिन राजधानी की हवा यही कहती है कि यहाँ खेल सिर्फ मैदान में नहीं होता, कई बार बोतलों, फाइलों और पांचवीं मंज़िल के कमरों में भी खेला जाता है।
बीज में भी खेल –
प्रदेश में इन दिनों बीज की एक कहानी सुर्खियों में है। खेत में बोने से पहले ही बीज राजनीति और व्यवस्था की जमीन पर अंकुरित हो गया। किसानों के लिए खरीदे जाने वाले बीज का सरकारी भाव कुछ और बताया गया, लेकिन खरीद की कीमत कुछ और निकली। फर्क छोटा नहीं था हर किलो में ऐसा अंतर कि पूरी योजना का हिसाब बदल जाए। जिस फर्म से बीज खरीदा गया उसके कागज भी सवालों में हैं। दस्तावेजों में जिस जगह दफ्तर बताया गया, वहां जाकर देखा तो असलियत कुछ और ही निकली और तो और, जो बीज प्रदेश की जलवायु के अनुकूल ही नहीं बताया जा रहा, वही किसानों के नाम पर सप्लाई कर दिया गया। यानी खेत में फसल क्या उगेगी यह बाद की बात है, पहले फाइलों में ही फसल लहलहाती नजर आ रही है। अब किसान पूछ रहा है अगर बीज ही ऐसा होगा जो जमीन के अनुकूल नहीं, तो फसल कैसे आएगी?
कटारे से शर्मा तक क्या सुशासन की फाइल खुलेगी?
प्रदेश की प्रशासनिक गलियों में इन दिनों दो कहानियाँ साथ-साथ चल रही हैं एक के.के. कटारे की और दूसरी हरिओम शर्मा की। दोनों अलग-अलग किरदार हैं, लेकिन सवाल लगभग एक जैसे हैं। आरक्षण पात्रता और नियुक्ति से जुड़ी फाइलें अब चर्चा के केंद्र में हैं। दस्तावेजों की पड़ताल के बाद जांच की दिशा तय होने की बात कही जा रही है। लेकिन प्रशासनिक गलियारों में असली चर्चा इस बात की है कि क्या यह मामला सिर्फ कागजी जांच तक सीमित रहेगा या वास्तव में कार्रवाई तक पहुँचेगा क्योंकि व्यवस्था की असली परीक्षा तब होती है जब नियम व्यक्ति देखकर नहीं, सिद्धांत देखकर लागू होते हैं।
रुतबा राजधानी में, पद कहीं और!
राजधानी की एक प्रतिष्ठित कॉलोनी में इन दिनों एक अजीब हलचल है। मामला कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि रुतबे की व्यवस्था का बताया जा रहा है। कहानी यह है कि एक वरिष्ठ वर्दीधारी अधिकारी की धर्मपत्नी पर कॉलोनी के सार्वजनिक गार्डन को निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल करने का आरोप लग गया है। कॉलोनीवासियों का कहना है कि सार्वजनिक पार्क में निजी ताला लगाकर उसे लगभग निजी आंगन बना दिया गया है। जब लोगों ने आपत्ति जताई तो जवाब में पद और पहचान का ऐसा हवाला दिया गया कि विवाद और गहरा गया। अब कॉलोनी के लोग साफ कह रहे हैं पार्क सरकार का है, किसी परिवार का नहीं। चाहे कोई कितना भी बड़ा अधिकारी क्यों न हो, कानून की रेखा सबके लिए एक ही होती है। क्योंकि लोकतंत्र में पद बड़ा हो सकता है, पर पार्क का ताला नियम से ही खुलता है।
यक्ष प्रश्न –
1 – भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में फर्जी SC/ST प्रमाण पत्र से नौकरी करने वालों पर कार्रवाई का वादा किया था। विष्णु सुशासन में इस वादे पर अमल कब तक होगा?
2 – क्या प्रदेश की सरकार पर शराब और क्रिकेट कारोबार से जुड़े लोगों का प्रभाव या कब्जा है?










