अफ़सर-ए-आ’ला (हर रविवार को सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(हर रविवार को सुशांत की कलम से)
कमिश्नर राज और पुरानी छाया –
राजधानी में कमिश्नर प्रणाली लागू हुई तो लगा कि प्रशासन का नया अध्याय शुरू हो रहा है। नई व्यवस्था, नई पोस्टिंग और नए चेहरे सब कुछ बदलता हुआ दिखाई दिया। लेकिन नौकरशाही की किताब इतनी जल्दी नया संस्करण नहीं छापती। नई पोस्टिंग सूची में एक नाम ऐसा आया जिसने गलियारों की चाय अचानक गर्म कर दी ग्रामीण एसपी की एंट्री। लोग हैरान थे कि शहर की नई व्यवस्था में गाँव की याद अचानक कैसे आ गई। फिर फुसफुसाहट शुरू हुई। कहा गया, यह पोस्टिंग सिर्फ आदेश नहीं संकेत है। संकेत उस दौर का, जिसे कई लोग “मोगेंबो युग” कहकर याद करते हैं। वह समय जब राजधानी में अमन-शांति इतनी व्यवस्थित थी कि फैसले बोलते कम और समझे ज्यादा जाते थे। समय बदला , सरकार बदली , चेहरे बदले और कुछ लोग कॉरपोरेट की शांति में चले गए, और कुछ सम्मानजनक सेवानिवृत्ति हो लिए। लेकिन सत्ता की असली खूबी यही है वह पद से जाती है, प्रभाव से नहीं। आज फिर वही पुरानी जुगलबंदी चर्चा में है। गलियारों में दावा करने वाले भी मिल जाते हैं यह पोस्टिंग किसके कहने पर हुई, सब जानते हैं। लोकतंत्र में आदेश फाइल से निकलते हैं, पर असर अक्सर रिश्तों से तय होता है। राजधानी अब कमिश्नर राज में है, लेकिन नौकरशाही का अपना गणराज्य हमेशा कायम रहता है। क्योंकि सरकारें बदलती रहती हैं और व्यवस्था अपने रास्ते खुद बना लेती है।
मंत्रालय की शाम और छोटे कद की बड़ी परछाइयाँ –
मंत्रालय में इन दिनों बड़ा अजीब सा माहौल है दिन में फाइलें चलती हैं, शाम होते ही फुसफुसाहटें बढ़ जाती है। अभी एक व्यापारी/आईपीएस नितिन थापर की वीआईपी एंट्री का मामला ठंडा भी नहीं पड़ा था कि गलियारों ने नई कहानी पकड़ ली है। कहा जा रहा है कि घड़ी जैसे ही छह बजाती है, मंत्रालय अचानक जाग उठता है। दिनभर पहचान पत्र दिखाने वाले दरवाज़े, शाम को पहचान भूल जाते हैं। कुछ गाड़ियाँ ऐसे प्रवेश करती हैं जैसे लोकतंत्र नहीं, निजी दरबार चल रहा हो। लिफ्ट सीधे पाँचवीं मंज़िल पर रुकती है। वहीं, जहाँ एक साहेब विराजते हैं जो कद से छोटे है , पर पद से विशाल है। साहेब शायद ऊँचाई से दुनिया देखते हैं, इसलिए नीचे खड़े सवाल दिखाई नहीं देते। या फिर दिखाई देते हैं पर देखना जरूरी नहीं समझा जाता है। मुलाकातें आधिकारिक नहीं होतीं, पर गंभीर बहुत होती हैं। जहाँ फाइलें कम, फुसफुसाहटें ज्यादा चलती हैं। मंत्रालय की दीवारें ऊँची जरूर हैं, मगर कान उनसे भी ऊँचे होते हैं। हाउस के बगुले तालाब के किनारे खड़े सब देख रहे हैं। चुप्पी इतनी अनुशासित है कि लगता है जैसे मौन भी सरकारी आदेश से लागू हुआ हो। सब जानते हैं, पर कोई जानने की पुष्टि नहीं करता। लोकतंत्र में दरवाज़े जनता के लिए खुलते हैं, पर यहाँ शाम ढलते ही दरवाज़े चुनिंदा चेहरों को पहचानने लगते हैं। सवाल यह नहीं कि कौन आया सवाल यह है कि आने की जरूरत क्यों पड़ी? मंत्रालय अगर शाम को गुलज़ार होने लगे, तो समझ लीजिए शासन दिन में नहीं, परछाइयों में चल रहा है। और सबसे बड़ा भ्रम यही है कि खबर बाहर नहीं जाएगी। मंत्रालय की हवा कह रही है, दीवारें चुप हैं… लेकिन इतिहास सब कुछ नोट कर रहा है।
स्वास्थ्य व्यवस्था आईसीयू में –
राज्य में नए स्वास्थ्य मंत्री बने तो लगा था कि अस्पतालों की साँसें कुछ लंबी होंगी। सोचा गया था कि अब इलाज पर ध्यान होगा, मरीज पर ध्यान होगा, और स्वास्थ्य व्यवस्था को ऑक्सीजन मिलेगी। लेकिन लगता है मंत्री जी ने बीमारी की पहचान कुछ अलग ही कर ली है। कहा जा रहा है कि आयुष्मान भारत योजना के तहत अस्पतालों को मिलने वाली राशि अब इलाज से कम और इलाज कराने से ज्यादा जुड़ गई है। फुसफुसाहट है कि भुगतान की फाइलें तब ही चलती हैं जब 20 प्रतिशत का इंजेक्शन पहले लग जाए। अब अस्पताल वाले दुविधा में हैं मरीज बचाएँ या भुगतान बचाएँ। जो अस्पताल कमीशन नहीं दे रहे, उनकी फाइलें लंबी बीमारी से ग्रस्त बताई जा रही हैं। और जो दे रहे हैं, उनका क्लेम स्वस्थ होकर तुरंत बाहर आ जाता है। इधर सरकारी अस्पताल खुद वेंटिलेटर पर पड़े दिखाई देते हैं।
कहीं डॉक्टर नहीं, कहीं दवाइयाँ एक्सपायर, कहीं फंगस लगी सप्लाई की चर्चा है। 9 एम दवाई योजना से लेकर मेडिकल सप्लाई तक सवाल ही सवाल हैं। दवा मरीज तक पहुँचने से पहले ही सिस्टम में बीमार हो जाती है। उधर निजी अस्पतालों ने इलाज को पैकेज बना दिया है जितनी बीमारी, उससे ज्यादा बिल। और जब मंत्री जी से पूछा जाए तो जवाब आता है सब नियंत्रण में है, सुशासन चल रहा है। शायद सुशासन की परिभाषा बदल गई है। अब मरीज लाइन में खड़ा रहता है और व्यवस्था कैश काउंटर पर। गलियारों में एक और चर्चा है कि राजनीति का भविष्य अनिश्चित हो तो वर्तमान की कमाई निश्चित कर लेनी चाहिए। लेकिन जनता जानती है स्वास्थ्य विभाग सिर्फ मंत्रालय नहीं होता, यह लोगों की आखिरी उम्मीद होता है। और जब उम्मीद ही बीमार हो जाए, तो इलाज किससे माँगा जाए? राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था आज पूछ रही है डॉक्टर कौन है और मरीज आखिर कौन?
संग्रहालय चमक रहा है सवाल धूल में क्यों हैं? –
नवा रायपुर में शहीद वीर नारायण सिंह आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संग्रहालय का निरीक्षण हुआ। प्रमुख सचिव ने कहा संग्रहालय प्रदेश का मान बढ़ा रहा है, दुनिया भर से पर्यटक आ रहे हैं, और अब फेस-2 भी जल्द बनेगा। सफाई, श्रमदान, बागवानी, फाउंटेन, कैफेटेरिया, कन्वेंशन सेंटर सबकी योजनाएँ तैयार हैं। सरकारी भाषा में विकास तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। लेकिन मंत्रालय के बाहर खड़े लोग पूछ रहे हैं फेस-2 शुरू होने की इतनी जल्दी क्यों है, जबकि फेस-1 की कहानी अभी पूरी साफ नहीं हुई? यह वही परियोजना है जिसकी शुरुआत करीब 15 करोड़ से हुई थी। फिर बजट बढ़ते-बढ़ते 45 करोड़ और अब लगभग 50 करोड़ की चर्चा तक पहुँच गया। दिलचस्प यह कि बढ़ोतरी नए टेंडर से नहीं, पुराने कागज़ों की लंबी उम्र से होती बताई जा रही है। कहा जाता है कि सिविल काम करने वाले हाथों को ही मूर्तियाँ गढ़ने की जिम्मेदारी भी दे दी गई। अब इंजीनियर कला समझा रहे हैं और कलाकार भुगतान का इंतजार। डिजिटल संग्रहालय बनाने के नाम पर करोड़ों का नया काम जुड़ गया पर सवाल वही पुराना है, टेंडर कहाँ है? परियोजना की निगरानी करने वाले अधिकारी भी चर्चा में हैं। गलियारों में यह फुसफुसाहट है कि फाइलें संग्रहालय से ज्यादा तेजी से बढ़ीं। विडंबना देखिए आदिवासी वीरता की स्मृति को समर्पित भवन बन रहा है, लेकिन पारदर्शिता की मूर्ति अब तक स्थापित नहीं हो पाई। सरकार फेस-2 की नींव रखने जा रही है, जबकि जनता फेस-1 की नींव पूछ रही है। संग्रहालय इतिहास दिखाने के लिए बनते हैं, पर इतिहास यह भी याद रखता है कि उन्हें कैसे बनाया गया था। क्योंकि स्मारक सिर्फ पत्थर से नहीं बनते विश्वास से बनते हैं। और अभी सबसे बड़ा सवाल यही है संग्रहालय चमक रहा है पर क्या हिसाब भी उतना ही साफ है?
आदिवासी थाली से वाकामे तक –
छत्तीसगढ़ की राजनीति भी अजीब है। भाषणों में मिट्टी की खुशबू होती है, लेकिन जीवन में समुद्र की हवा चलने लगती है। राज्य के एक कृषि मंत्री जी लंबे समय से आदिवासी हितों और किसानों की बात करते रहे हैं। लेकिन मंत्रालय के गलियारों में चर्चा रही कि उनके विभाग की खेती किसी ऐश्वर्यप्रिय मारवाड़ी ठेकेदार के भरोसे फल-फूल रही है। कहते हैं रिश्तों की फसल इतनी लहलहाई कि समुद्र किनारे एक विला तक कहानी पहुँच गई। अब नई चर्चा राजधानी से उठी है। बताया जाता है कि मंत्री जी की बिटिया ने देश की राजधानी में एक भव्य रेस्टोरेंट खोला है नाम रखा गया “वाकामे”, जो जापान में खाए जाने वाले समुद्री शैवाल का नाम है। सवाल स्वाद का नहीं, संदेश का है। आदिवासी संस्कृति और छत्तीसगढ़ी खानपान के बड़े पैरोकार मंत्री जी ने अपनी ही बेटी को फरा, चीला या कोदो-कुटकी की थाली क्यों नहीं सुझाई? क्या छत्तीसगढ़ की पहचान राजधानी की प्लेट में जगह नहीं बना पाई या फिर इस रेस्टोरेंट के पीछे कोई और ही कहानी पक रही है? लोकतंत्र में सवाल जरूरी होते हैं। क्योंकि जनता अब सिर्फ भाषण नहीं, परोसी जा रही थाली भी देख रही है।
यक्ष प्रश्न –
1 – क्या 2026 में किसी भी समय देश में ‘संजय युग’ का शुभारंभ हो सकता है, और अगर हुआ तो गुजरात लॉबी का क्या होगा?
2 – और क्या गैर राज्य प्रशासनिक सेवा से अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयन के पीछे कोई नया ‘ओपी मॉडल’ काम कर गया?










