धान के कटोरे में अफीम के खेत , पांचवी मंजिल का छोटा अधिकारी और हाउस के ‘बगुला’ का रहस्यमयी खेल – सरकार आख़िर चला कौन रहा है ?

धान के कटोरे में अफीम के खेत , पांचवी मंजिल का छोटा अधिकारी और हाउस के ‘बगुला’ का रहस्यमयी खेल – सरकार आख़िर चला कौन रहा है ?
रायपुर : – छत्तीसगढ़ में सामने आए अवैध अफीम खेती के मामलों ने न केवल कानून व्यवस्था बल्कि प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दुर्ग जिले के समोदा गांव में अफीम की खेती पकड़े जाने के बाद अब बलरामपुर जिले से भी ऐसा ही मामला सामने आया है। दोनों घटनाओं को जोड़कर देखें तो यह केवल एक खेत या एक व्यक्ति का मामला नहीं लगता, बल्कि कई स्तरों पर प्रशासनिक और राजनीतिक सवाल खड़े करता है।
दुर्ग खेत में अफीम और अचानक सक्रिय हुआ सिस्टम –
दुर्ग जिले के समोदा गांव में जब खेत में अफीम की खेती का मामला सामने आया तो यह घटना तेजी से पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गई। खेत में बड़ी संख्या में अफीम के पौधे पाए गए और पुलिस ने बाद में कार्रवाई भी की। लेकिन पूरे घटनाक्रम की टाइमलाइन देखें तो कई सवाल सामने आते हैं। स्थानीय स्तर पर इस खेती की चर्चा पहले से थी। गांव के लोगों और स्थानीय प्रतिनिधियों को भी इसकी जानकारी होने की बात कही जा रही है। फिर भी मामला तब बड़ा बना जब राजनीतिक नेतृत्व और मीडिया मौके पर पहुंचे।
एसपी छुट्टी पर, जिले में इतनी बड़ी घटना –
इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है। मिली जानकारी के अनुसार दुर्ग जिले के पुलिस अधीक्षक विजय अग्रवाल 4 मार्च से अवकाश पर बताए जा रहे हैं और बताया जा रहा है कि वे 11 मार्च यानी आज अवकाश से लौटने वाले हैं।
अब सवाल यह उठ रहा है कि जिस जिले में इतने बड़े स्तर पर अवैध अफीम खेती का मामला सामने आया, उस दौरान जिले का पुलिस नेतृत्व अवकाश पर था। इतनी बड़ी घटना के दौरान जिले के शीर्ष पुलिस अधिकारी की अनुपस्थिति पर भी चर्चा होना स्वाभाविक है कि आखिर अचानक ही यह छुट्टी क्यो मिली।
एडिशनल एसपी सुरक्षा में लेकर खेत तक क्यों पहुंचे? –
इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी उठ रहा है कि जिस दिन पूर्व मुख्यमंत्री खेत तक पहुंचे, उस दिन जिले के ASP मनी शंकर चंद्रा ने सुरक्षा देते हुए उसी खेत तक लेकर पहुंचे जहां अफीम की खेती बताई जा रही थी। अब सवाल यह है कि क्या पुलिस प्रशासन को पहले से इस खेत की जानकारी थी? अगर जानकारी थी तो कार्रवाई पहले क्यों नहीं हुई? और अगर जानकारी नहीं थी तो अचानक उसी दिन पुलिस और सुरक्षा के साथ खेत तक पहुंचने की स्थिति कैसे बनी? यही वह बिंदु है जिसने पूरे घटनाक्रम को और रहस्यमय बना दिया है।
बलरामपुर सरपंच का दावा जनवरी में दी थी सूचना –
दुर्ग की घटना के बाद बलरामपुर जिले से भी अफीम की खेती का मामला सामने आया। यहां के सरपंच का कहना है कि उन्होंने जनवरी महीने में ही पुलिस को सूचना दे दी थी कि गांव के खेतों में अवैध रूप से अफीम की खेती हो रही है। सरपंच का कहना है कि उन्होंने प्रशासन को कई बार जानकारी दी, लेकिन उस समय कोई कार्रवाई नहीं हुई।
अब जब मामला सार्वजनिक हो गया है तो यह सवाल उठ रहा है कि आखिर सूचना मिलने के बावजूद प्रशासन ने समय रहते कदम क्यों नहीं उठाया।
गृह मंत्री की कार्रवाई, लेकिन सवाल फिर भी –
मामला सामने आने के बाद राज्य के गृह मंत्री विजय शर्मा ने इस विषय को लेकर तत्काल प्रेस कांफ्रेंस की और कार्रवाई की जानकारी दी। लेकिन सत्ता और प्रशासनिक गलियारों में यह भी कहा जाता है कि गृह मंत्री विजय शर्मा नाम के गृह मंत्री हैं, लेकिन उनकी सुनता कोई नहीं है।
बताया जाता है कि पूरा का पूरा गृह मंत्रालय हाउस का एक “बगुला” चलाता है। कहा जाता है कि वही नीति बनाता है, वही ट्रांसफर पोस्टिंग तय करता है और यहां तक कि यह भी तय करता है कि मुखिया क्या खाएंगे, क्या पिएंगे और किससे मिलेंगे। यानी निर्णय का केंद्र कहीं और है और जिम्मेदारी कहीं और दिखाई देती है।
सुशासन की छवि और प्रशासनिक परत –
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की छवि एक सीधे और सज्जन नेता की रही है और वे लगातार सुशासन की बात करते रहे हैं। कई लोग मानते हैं कि मुख्यमंत्री का स्वभाव सरल है, लेकिन प्रशासनिक तंत्र के भीतर बैठे कुछ लोग उन्हें पूरी स्थिति से अवगत कराते हैं या नहीं यह भी अपने आप में एक सवाल है। यहाँ भी बगुला अहम किरदार निभाता है।
यही कारण है कि कई बार यह चर्चा भी सुनाई देती है कि प्रशासनिक स्तर पर कुछ अधिकारी वास्तविक स्थिति को किस रूप में ऊपर तक पहुंचाते हैं।
पुरानी सरकार का सूचना तंत्र –
राजनीतिक हलकों में यह सवाल भी उठता है कि तत्कालीन मुखिया जो कई मामलों में अपने करीबी अधिकारियों जैसे सौम्या चौरसिया , अनिल टुटेजा और सलाहकारों पर निर्भर रहते थे। ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि प्रशासन के भीतर वह कौन अधिकारी होता है जो सत्ता के शीर्ष तक सूचनाओं की दिशा तय करता है। इतनी बारीक जानकारी और इतना सटीक वार आखिर वह कौन सा अधिकारी है जो तत्कालीन सरकार के नमक की अदायक़ी कर रहा है जो इतनी सटीक जानकारी पहुँचाता है जिसकी जानकारी खुद इंटेलीजस सरकार पुलिस को नही होती है यह भी एक खोजी विषय है।
“पांचवी मंजिल” और सत्ता के असली संचालक? –
राजधानी के सत्ता गलियारों में अक्सर यह चर्चा सुनाई देती है कि प्रदेश की कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रक्रियाएं कुछ खास दफ्तरों और कमरों से संचालित होती हैं। कहा जाता है कि एक “बगुला भगत” और एक “कम हाइट वाला अधिकारी” पांचवी मंजिल से पूरे सिस्टम को ऑपरेट करते हैं।
यह भी कहा जाता है कि यही लोग हाउस में बैठकर नीतियां तय करते हैं, तबादले तय करते हैं और कई बार ऐसी स्थितियां भी पैदा हो जाती हैं जिससे सरकार की छवि प्रभावित होती है। जो इस अफीम प्रकरण में साफ देखने को मिला।
कई सवाल अब भी बाकी –
दुर्ग और बलरामपुर की घटनाओं ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं जिनका जवाब अभी बाकी है सूचना मिलने के बाद कार्रवाई में देरी क्यों हुई? जिले के एसपी की अनुपस्थिति में निर्णय किस स्तर पर लिए गए? एडिशनल एसपी सुरक्षा के साथ खेत तक कैसे पहुंचे?
क्या प्रशासन को पहले से जानकारी थी? क्या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क है? और सबसे बड़ा सवाल प्रशासनिक तंत्र में वास्तविक निर्णय कहाँ से संचालित हो रहे हैं? इन सवालों के जवाब आने वाली जांच में ही सामने आ पाएंगे।
लेकिन इतना तय है कि धान के कटोरे कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में अफीम के खेत मिलने की घटनाओं ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया है।










