शराब का खेल एक कारोबारी, पांचवीं मंज़िल और छोटे कदकाठी वाले प्रभावशाली अधिकारी की भूमिका पर गहराते सवाल –

शराब का खेल एक कारोबारी, पांचवीं मंज़िल और छोटे कदकाठी वाले प्रभावशाली अधिकारी की भूमिका पर गहराते सवाल –
रायपुर : – छत्तीसगढ़ में शराब कारोबार को लेकर सियासी सरगर्मी एक बार फिर तेज हो गई है। पूर्व गृह मंत्री एवं वरिष्ठ भाजपा नेता द्वारा प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर गंभीर आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई गई है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह मामला सिर्फ पूर्व सरकार के दौर तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्तमान प्रशासनिक ढांचे के भीतर भी खींचतान का विषय बना हुआ है।
भाजपा नेता ने अपने पत्र में 2018–2023 के दौरान कथित शराब कारोबार, ऑनलाइन बिक्री और करोड़ों रुपये के लेन-देन की बात कही है। पत्र में केंद्रीय एजेंसी से जांच की मांग भी की गई है। आरोपों की आधिकारिक पुष्टि भले न हुई हो, लेकिन पत्र सार्वजनिक होने के बाद से सत्ता और प्रशासन दोनों हलकों में हलचल तेज है।
राजनांदगांव कनेक्शन कारोबारी प्रभाव और नंबर दो का नाम चर्चा में –
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि राजनांदगांव का एक बड़ा शराब कारोबारी, जिसका नाम कथित तौर पर क्रिकेट जगत से जुड़े नेटवर्क में भी लिया जाता है, इस पूरे तंत्र में प्रभावशाली भूमिका निभा रहा है। सूत्रों का दावा है कि नीति निर्धारण और आपूर्ति व्यवस्था में उसकी अप्रत्यक्ष सक्रियता रही है।
बताया जाता है कि शराब कारोबारी के बेटे का संबंध “नंबर दो” से बेहद अच्छा संबद्ध माना जाता है। चर्चा यह भी है कि इसी निकटता का हवाला देकर कई स्तरों पर दबाव या प्रभाव बनाया जाता है। अब यह प्रभाव वास्तविक है या केवल डर अथवा चमक दिखाने के लिए उपयोग किया जाता है यह संबंधित लोग ही बेहतर जानते होंगे।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या “नंबर दो” को इन गतिविधियों की पूरी जानकारी है? या फिर उनका नाम केवल प्रभाव बनाने के लिए लिया जा रहा है? इस पर आधिकारिक स्थिति स्पष्ट नहीं है। राजधानी की बैठकों और गलियारों में यह विषय लगातार चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
प्लास्टिक बनाम कांच और 50 रुपये का विवाद फैसले के पीछे किसका दबाव? –
कुछ समय पहले प्लास्टिक बोतलों में शराब बिक्री और उसके पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर हमने खबर प्रकाशित की थी। उसी संदर्भ में आबकारी विभाग की ओर से प्रति बोतल 50 रुपये कम करने की योजना पर विचार हुआ।
सूत्र बताते हैं कि जब यह प्रस्ताव चर्चा में आया तो “हाउस” में पदस्थ एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस पर आपत्ति जताई। बताया जाता है कि कांच की बोतलों की वापसी के बाद भी 50 रुपये की कटौती लागू न करने को लेकर दबाव बनाया गया।
विभागीय सूत्रों के अनुसार सचिव स्तर पर इस पर सहमति नहीं बनी और मामला तनावपूर्ण स्थिति तक पहुंच गया। यहां तक चर्चा रही कि संबंधित अधिकारी को हटाए जाने तक की अटकलें चलीं। यह घटनाक्रम प्रशासनिक फैसलों पर संभावित प्रभाव और अंदरूनी मतभेदों की ओर इशारा करता है।
पांचवीं मंज़िल की मुलाकात प्रभाव, असहमति और एक ईमानदार अधिकारी की चर्चा –
राजधानी की नौकरशाही में “पांचवीं मंज़िल” अब एक प्रतीकात्मक शब्द बन चुका है। सूत्रों का दावा है कि राजनांदगांव के एक कारोबारी और उसके पुत्र की वहां मौजूद एक प्रभावशाली अधिकारी जो कद में छोटा है मगर पद में बेहद ऊंचा बताया जाता है से मुलाकात हुई।
बताया जाता है कि एक दक्षिण भारतीय महिला अधिकारी, जिन्हें विभागीय हलकों में ईमानदार और नियम-केंद्रित अधिकारी के रूप में देखा जाता है, ने कुछ प्रस्तावों को मानने से इनकार किया। इसके बाद उनके स्थानांतरण की चर्चा तेज हो गई। हालांकि प्रशासनिक आदेशों में इस संबंध में कोई स्पष्ट कारण दर्ज नहीं किया गया है।
यह घटनाक्रम नौकरशाही के भीतर चल रही संभावित खींचतान, दबाव की राजनीति और निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर उठते सवालों की ओर संकेत करता है।
सत्ता, नीति और कारोबारी प्रभाव क्या प्रशासनिक संतुलन बिगड़ रहा है? –
विश्लेषकों का मानना है कि शराब नीति केवल राजस्व का विषय नहीं होती, बल्कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता, पर्यावरणीय प्रभाव और राजनीतिक विश्वसनीयता से भी जुड़ी होती है।
यदि नीति निर्माण में कारोबारी हित हावी होने की धारणा बनती है, तो इससे सरकार की छवि प्रभावित हो सकती है। वहीं अधिकारी वर्ग के भीतर मतभेद सार्वजनिक होने लगें तो यह प्रशासनिक असंतुलन का संकेत माना जाता है।
जांच होगी या मामला फाइलों में सिमट जाएगा? –
अब सवाल यह है कि क्या इन आरोपों पर किसी स्वतंत्र जांच की घोषणा होगी? क्या प्लास्टिक बनाम कांच विवाद पर स्पष्ट नीति सामने आएगी? क्या “नंबर दो” के नाम का उपयोग प्रभाव के लिए किया जा रहा है या उन्हें पूरी जानकारी है? और क्या प्रशासनिक स्तर पर चल रही कथित खींचतान पर कोई आधिकारिक बयान आएगा?
छत्तीसगढ़ में शराब कारोबार लंबे समय से राजनीतिक बहस का केंद्र रहा है। लेकिन इस बार चर्चा सिर्फ कारोबार की नहीं, बल्कि उस अदृश्य शक्ति-संतुलन की है जहाँ नीति, प्रभाव और पद के बीच की रेखाएँ धुंधली होती दिख रही हैं और सवाल उठ रहा है खेल कौन चला रहा है, और जिम्मेदारी किसकी है?










