अफ़सर-ए-आ’ला (हर रविवार को सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(हर रविवार को सुशांत की कलम से)

गोवा मॉडल –
छत्तीसगढ़ में विकास के कई मॉडल गिनाए जाते हैं दिल्ली मॉडल, गुजरात मॉडल, छत्तीसगढ़ मॉडल और अब मंत्रालय की चाय में एक नया शब्द तैर रहा है गोवा मॉडल। इस मॉडल में योजना राजधानी में बनती है, फाइल मंत्रालय में चलती है, और चर्चा गोवा तक पहुँच जाती है। कहानी 2005 के उस विशेष बैच से शुरू होती है, जो सरकार बदलने पर भी अपनी सेटिंग नहीं बदलता। मंत्री बदलते हैं, पर कुछ चेहरे हर सत्ता में स्थायी रहते हैं। एक साहब हैं जिनकी कार्यशैली में रजत-सी चमक बताई जाती है। वित्तीय फाइलें जिनके पास रुक जाएँ, तो मामला तकनीकी नहीं, रणनीतिक हो जाता है। अब तो मंत्रालय में मज़ाक चलता है घोषणा मंच से होती है, दिशा कमरे से तय
होती है। राज्य का खजाना कागज़ पर जनता का है, पर उसकी यात्रा समझने के लिए भाषण नहीं, नेटवर्क समझना पड़ता है। चर्चा यह भी है कि साहेब की पत्नी आईआरएस हैं और इनकम टैक्स कमिश्नर भी मतलब घर में ही कर-व्यवस्था की गहरी समझ मौजूद है। जब आयकर की भाषा और राज्य वित्त की फाइल एक ही टेबल पर मिलें, तो खर्च का गणित हमेशा नियमों में फिट दिखता है। पहले भी अमन-चमन अंतरराष्ट्रीय उड़ान भरते थे, अब दौर बदला है उड़ानें छोटी हैं, पर चर्चा लंबी। सब कुछ नियम में है, सब कुछ वैध है। पर सवाल बस इतना है कि निर्णय मंत्री लेते हैं या भरोसेमंद बैच? सत्ता पाँच साल की होती है, बैच तीस साल का और असली ताकत वही होती है जो चुनाव नहीं लड़ती, पर हर सरकार में जीत जाती है। गोवा की लहरें लौट आती हैं, पर राजधानी से समुद्र तक जाने वाली हवा
आख़िर चलती कहाँ से है यह सवाल अब भी बाकी है।

आदेश और आफ्टर पार्टी –
राजधानी में आदेश दो तरह के होते हैं एक जो फाइल पर लिखे जाते हैं और दूसरे जो फोन पर दिए जाते हैं। वीआईपी रोड का एक चर्चित क्लब इन दिनों संगीत से ज्यादा अपने प्रशासनिक इतिहास के कारण चर्चा में है।कहते हैं एक रात यहाँ माहौल अचानक बदला और बाउंसर पुलिस गाड़ियों में बैठाकर ले जाए गए। कार्रवाई इतनी तेज थी कि लगा कोई बड़ा अपराध पकड़ा गया है। लेकिन सुबह होते-होते कहानी बदल गई। पुलिस लाइन से मुख्यालय तक फोन घूमे और राजधानी ने वही पुराना दृश्य देखा आदेश नरम पड़ गया। वरिष्ठ स्तर पर बातचीत हुई, आईजी को एसपी से संवाद करना पड़ा और संदेश गया ऐसा आदेश आगे नहीं होगा। तब समझ आया कि मामला कानून से ज्यादा लोकेशन का था। क्योंकि यह कोई साधारण जगह नहीं थी। यह वही क्लब है जिसे अब एक जांच अधिकारी की छाया वाला ठिकाना माना जाता है दिन में जांच, रात में जमावड़ा , राजधानी के नए संतुलन का मॉडल। चर्चा यह भी है कि संचालन का गणित बड़ा व्यवस्थित है करीब 80 प्रतिशत समझदारी और बाकी 20 प्रतिशत खर्च, मेंटेनेंस और औपचारिकता। सब कुछ नियम में, सब कुछ वैध, सब कुछ शांत। बस सवाल हवा में रहता है जब जांच करने वाला ही नेटवर्क का केंद्र बन जाए, तो जांच किसकी होती है? राजधानी में कुछ क्लब मनोरंजन नहीं करते, आदेश बदलवा देते हैं। और उस रात के बाद पुलिस महकमे ने भी सीख लिया वीआईपी रोड पर कार्रवाई से पहले लोकेशन देखना जरूरी है।

पाँचवीं मंज़िल का दरबार –
राजधानी में लोकतंत्र कई जगह चलता है सदन में, सचिवालय में और एक जगह पाँचवीं मंज़िल पर भी। आगे सुनिए, साहेब हैं हाँ वही… कद भले लंबा न हो, पर असर ऐसा कि हाउस का एक पत्ता भी इनके इशारे के नही डोलता। कहते हैं उन्हें किसी पुराने अमन का ऐसा वरदहस्त मिला है कि फोन पर ही लाइन क्लियर कर देते हैं। संगठन, व्यवस्था, अनुशासन सब अपनी जगह, पर राजधानी की चर्चा है कि साहेब का सिद्धांत सीधा है जो मैं कहूँ… वही अंतिम ड्राफ्ट है। और फोन पर कहते है कि संघ संघठन इज माई फुट। मंत्रालय में मज़ाक चलता है फाइलें ऊपर मंजूरी के लिए जाती हैं, और फैसले पहले ही नीचे पहुँच जाते हैं। इनसे मुलाक़ात आसान नहीं है राजधानी के गलियारों में तो यह तक कहा जाता है कि यहाँ काम हो या न हो मुलाक़ात ही उपलब्धि मानी जाती है। कुछ लोग इसे राजधानी का नया एंट्री पास सिस्टम कहते हैं। दिल्ली स्टाइल अब प्रदेशों में भी लोकप्रिय हो रहा है। चर्चा तो यहाँ तक पहुँच गई है कि दरबार में पहुँचने की कीमत भी तय है करीब पचास लाख की प्रतिष्ठा फीस काम बाद की बात है, और यह रकम उत्तरप्रदेश के लखनऊ में ली जाती है सब कुछ अनौपचारिक सब कुछ ऑफ द रिकॉर्ड सब कुछ व्यवस्था के भीतर राजधानी जानती है सत्ता सिर्फ चुनाव से नहीं चलती, कुछ दरबार स्थायी होते हैं। सदन पाँच साल का होता है, पर पाँचवीं मंज़िल का असर लंबा चलता है और सवाल अब भी वही है राज्य संविधान से चलता है या इशारों से?

पाँचवीं मंज़िल का प्रोटोकॉल –
राजधानी की कहानियाँ कभी खत्म नहीं होतीं। आगे सुनिए यही पाँचवीं मंज़िल वाले साहब इन दिनों एक नई चर्चा के केंद्र में हैं। वजह बना है हाल ही में हुआ देश के सर्वोच्च न्यायिक पदाधिकारी का आगमन। कार्यक्रम औपचारिक था, प्रोटोकॉल सख्त था, मंच तय था। लेकिन तस्वीरों में एक चेहरा बार-बार दिखा छोटे कद-काठी वाले वही साहब, हाथ बाँधे, आगे-पीछे मौजूद नजर आए। राजधानी के गलियारों में सवाल उठा कि यह सिर्फ प्रशासनिक उपस्थिति थी या कुछ ज्यादा? चर्चा इसलिए भी गहरी हो गई क्योंकि बताया जाता है कि साहब का नाम उस परीक्षा विवाद से भी जुड़ा रहा है जिसकी जांच अभी केंद्रीय एजेंसियों के स्तर पर चल रही है। मामला पूरी तरह ठंडा भी नहीं हुआ, फाइलें अभी बंद नहीं हुईं, और इसी बीच सर्वोच्च स्तर के कार्यक्रम में इतनी नज़दीकी मौजूदगी ने फुसफुसाहट बढ़ा दी। क्या शीर्ष अतिथि को बैकग्राउंड की पूरी जानकारी थी? या फिर प्रोटोकॉल की भीड़ में सूचना कहीं धीमी पड़ गई? राजधानी में तस्वीरें सिर्फ याद के लिए नहीं होतीं वे संदेश भी देती हैं। और जब जांच से जुड़ा नाम किसी संवैधानिक गरिमा वाली तस्वीर में दिखाई दे, तो सवाल स्वाभाविक हो जाते हैं। सवाल बहुत हैं, पर जवाब अब भी सरकारी फाइलों की तरह शांत पड़े हैं। क्योंकि यहाँ अक्सर सच बयान से नहीं चुप्पी से पढ़ा जाता है।

खाली कुर्सी का वजन –
राज्य का बजट सत्र चल रहा था। बजट प्रशासनिक था संख्याएँ संतुलित, शब्द संयमित, और तालियाँ नियोजित। लेकिन इस बार चर्चा अंकों से ज्यादा एक तस्वीर ने बटोरी।
तस्वी में एक ओर वित्त मंत्री, दूसरी ओर प्रदेश के मुखिया मौजूद और किनारे पर वही छोटे कद-काठी वाले साहब, शांत, स्थिर, लगभग निर्विकार। उनके बगल की एक कुर्सी खाली थी। राजधानी ने बजट भाषण से ज्यादा उस खाली कुर्सी को पढ़ा। क्योंकि सदन में मौजूद होना और केंद्र में होना दो अलग बातें हैं। पत्रकार वार्ता में प्रशासन के मुखिया नज़र नहीं आए न किसी औपचारिक बयान में, न मंच की साझा तस्वीरों में उपस्थिति दर्ज थी, पर प्रभाव अनुपस्थित वहीं छोटे कद वाले साहब की मौजूदगी स्थिर थी जैसे दिशा वहीं से तय हो रही हो। राजधानी के गलियारों में फुसफुसाहट चली ओहदा बड़ा हो सकता है, पर ओरा किसका है? कुर्सी कभी-कभी लकड़ी की नहीं होती, नेटवर्क की होती है। और नेटवर्क का वजन पद से नहीं, पहुँच से मापा जाता है। उस दिन तस्वीर ने एक सूक्ष्म संकेत दे दिया सत्ता सिर्फ बोलने वालों के पास नहीं होती,
कभी-कभी वह उनके पास होती है जो चुप रहकर भी फ्रेम के केंद्र में होते हैं। और वह खाली कुर्सी वह शायद किसी व्यक्ति की अनुपस्थिति नहीं, एक शक्ति-संतुलन की कहानी कह रही थी।

यक्ष प्रश्न –

1 – ऐसे कौन से भरसाधन मंत्री है जिनका पैसा इन दिनों गोआ की चमक बढ़ा रहा है ? 

2 – किस विभाग के उस अधिकारी ने, निर्धारित योग्यता पूरी किए बिना ही गैर-राज्य प्रशासनिक सेवा से अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा में अपना नाम भिजवाने में सफलता पा ली? संयोग देखिए, पूरे राज्य की स्थापना व्यवस्था का भार भी आजकल उन्हीं के कंधों पर है।

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