अफ़सर-ए-आ’ला (हर रविवार को सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(हर रविवार को सुशांत की कलम से)

कांफ्रेंस में देश, और घर में प्रभारी!
देश के सभी राज्यों के DGP-IGP इस समय रायपुर में जुटे हैं। जहाँ आतंकवाद, नक्सलवाद और आंतरिक सुरक्षा पर गंभीर विमर्श चल रहा है। लेकिन असली प्रश्न यह है जो राज्य कॉन्फ्रेंस की मेजबानी कर रहा है, वही फरवरी से स्थाई DGP के बिना क्यों है? नक्सल फ्रंट पर लगातार ऑपरेशन, शहरों में कानून व्यवस्था की चुनौती, और प्रशासनिक समन्वय , इन सबके लिए शीर्ष पद का स्थाई नेतृत्व अत्यंत आवश्यक होता है। प्रभारी व्यवस्था आमतौर पर संक्रमणकाल के लिए होती है, न कि नौ महीनों तक पूरे राज्य को चलाने के लिए। स्थाई DGP की अनुपस्थिति कई संकेत देती है क्या निर्णय प्रक्रिया अटकी है? क्या प्रशासनिक खींचतान है? या यह मामला प्राथमिकता में ही नहीं है? कांफ्रेंस में देश की सुरक्षा रणनीति पर चिंतन चल रहा है, पर छत्तीसगढ़ की अपनी रणनीति का शीर्ष नेतृत्व ही अस्थाई है। यही विरोधाभास इस मुद्दे को महत्वपूर्ण बनाता है। छत्तीसगढ़ में सुरक्षा चुनौतियाँ स्थाई हैं लेकिन नेतृत्व अस्थाई। और यहीं से कॉलम की सार्थकता शुरू होती है।

लाल क्षेत्र, सफ़ेद सवाल
2026 में नक्सल-मुक्त छत्तीसगढ़ की तस्वीर अब सिर्फ़ नारा नहीं, वास्तविकता बनती दिख रही है। लगातार समर्पण, जंगलों में बढ़त, और हिड़मा , बसवराजु जैसे कुख्यातों का अंत यह किसी चमत्कार का नहीं, एक आक्रामक और स्पष्ट राष्ट्रीय रणनीति का परिणाम है। और इस रणनीति की धुरी, नॉर्थ ब्लॉक का वह कक्ष है जहाँ से गृहमंत्री अमित शाह ने न सिर्फ़ डेडलाइन दी, बल्कि उस डेडलाइन पर काम भी कराया। दिल्ली ने दिशा भी दी, दबाव भी बनाया और इच्छाशक्ति भी दिखाई इसमें दो राय नहीं। लेकिन यह कहानी जितनी साफ़ दिल्ली में है, उतनी साफ़ रायपुर में नहीं दिखती। यहीं से सवाल उठता है क्या राज्य का गृह नेतृत्व भी उतना ही दृढ़, स्पष्ट और मिशन मोड में है? फील्ड के अधिकारियों की बातें हों या दफ्तरों का माहौल अक्सर यही सुनाई देता है ऊपर से गति तेज है, पर नीचे तालमेल आधा-अधूरा है। राष्ट्रीय स्तर पर अभियान स्पीड में है, पर राज्य स्तर पर कहीं न कहीं ब्रेक दबा हुआ-सा लगता है।डेडलाइन दिल्ली की है, पर क्या रोडमैप रायपुर का भी उतना ही मजबूत है? नक्सलवाद निर्णायक मोड़ पर है केंद्र अपनी भूमिका निभा चुका है। अब नज़रें राज्य पर हैं। डेडलाइन पूरी होती दिख रही है, पर सवाल वही क्या राज्य भी उसी तीव्रता से मैदान में खड़ा है?

13 का अध्याय
डीजीपी आईजीपी कॉन्फ्रेंस शुरू होने से ठीक एक दिन पहले 13 आईएएस अधिकारियों का अचानक तबादला।कागज़ पर यह एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है, लेकिन वक़्त ऐसा चुना गया कि सवाल अपनी जगह खुद खड़े हो गए। ध्यान देने की बात यह है कि राज्य की आधी मशीनरी इस समय सुरक्षा, नक्सलवाद और आंतरिक व्यवस्था पर राष्ट्रीय चिंतन में व्यस्त है और उसी समय फील्ड में तैनात अफसरों की कुर्सियाँ हिलनी शुरू होना यह संयोग से ज़्यादा, व्यवस्था की बेचैनी जैसा लगता है। सूत्र तो कई कहानियाँ बताते हैं। कोई कहता है कुछ अधिकारी मंत्रियों की नहीं सुन रहे थे। कोई कहता है कुछ ने सीनियर अफसरों की बात टाल दी। कुछ पर पुराने आरोपों के बाद भी संवेदनशील विभाग थे, और ठीक धान खरीदी के समय बदलाव चौंकाने वाला है। लेकिन असली वजह क्या है इसका जवाब फाइलों के नोटिंग में भी शायद न मिले। दिलचस्प सवाल यह है कि जब राज्य को स्थिर प्रशासन चाहिए तब इतनी अस्थिरता क्यों? अगर कारण दक्षता है तो फिर यह समीक्षा अचानक क्यों?अगर कारण अनुशासन है तो उसे सालभर भूलकर कॉन्फ्रेंस के एक दिन पहले क्यों? और अगर कारण कुछ और है तो वही अनकहा इस सूची का सबसे बड़ा संकेत है। तबादले होते रहते हैं, पर उनका वक़्त बहुत कुछ कहता है। इस बार भी सूची में नाम नहीं, टाइमिंग बोल रही है और ज़ोर से बोल रही है।

फर्जी वर्दी गिरोह
धमतरी की ताज़ा घटना कोई साधारण ठगी नहीं है यह उस सिस्टम का आईना है, जिसकी नकल एक ठग सड़क पर खड़ा होकर कर लेता है और लोग मान भी लेते हैं। कहानी शुरू होती है एक शख्स से, जिसने खुद को Anti Corruption Bureau का अधिकारी बताया। बैज, गाड़ी, रौब सब पैकेज डील। और बस, कुछ ही मिनटों में आम लोग ही नहीं, असली सिस्टम भी एक पल को भ्रमित हो जाता है। अब सवाल यह नहीं कि ठग ने ऐसा कैसे किया सवाल यह है कि असली और नकली के बीच इतना पतला फर्क कैसे रह गया? धमतरी की यह घटना बताती है कि जनता और प्रशासन दोनों उस माहौल में जी रहे हैं जहाँ ACB आया है सुनते ही आधा शहर डर जाता है, और बाकी आधा मान लेता है कुछ न कुछ गड़बड़ हुई ही होगी।पर इस केस में गड़बड़ उलटी थी असली सिस्टम कहीं और बैठा था, और नकली सिस्टम मौके पर काम पर। यह कहानी इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि यह किसी एक ठग की चतुराई नहीं, बल्कि सिस्टम की संरचना की कमजोरी का खुला एक्सपोज़ है। जब एक आदमी बिना पहचान, बिना अधिकार, सिर्फ़ कुछ डायलॉग बोलकर सिस्टम बन जाए तो असली सिस्टम से भरोसा टूटने में देर कितनी? आज ACB का फर्जी अधिकारी पकड़ा गया, कल किसी और विभाग का नकली साहब खड़ा मिलेगा। क्योंकि जहाँ डर ज्यादा और विश्वास कम हो, वहाँ धोखा सबसे आसान पेशा बन जाता है। दरअसल यह कहानी ठग की नहीं, सिस्टम की है। ठग तो सिर्फ़ उसकी कॉपी-पेस्ट है।

खनिज 2.0 बनाम अफसरशाही 5.0 –
सरकार बाहर से निवेश बुला रही है CM साहब कंपनियाँ खींच रहे हैं, पर अंदर CHiPS ने घर की कंपनियों को ऐसे चिपकाया है जैसे टेंडर नहीं परिवार रजिस्ट्री बाँटी जा रही हो। 103 करोड़ की खनिज ऑनलाइन 2.0 योजना पाँच साल में सॉफ्टवेयर तक तैयार नहीं कर पाई है। पर CHiPS के आशीर्वाद से कंसल्टेंटों की तनख्वाह 30 हजार से उड़कर सीधी 3 लाख पर लैंड कर गई। IAS से डबल, और योग्यता आधी मगर पहुंच पूरी। सिस्टम न बनने से हर मिनट करोड़ों की क्षति हो रही,पर जिम्मेदारी कहीं धूल में दबी हुई है। CHiPS कहता है काम जारी है,और विभाग कहता है नुकसान हमारी किस्मत में है। कागज़ में 200 पत्र, जमीन पर 0 प्रगति। कंपनियाँ ब्लैकलिस्ट के लायक, पर CHiPS की नजर में फिर से मौका मिलने लायक। प्रदेश हित में एक काम बेहद जरूरी है इन आउटसोर्स्ड रिश्तों का Performance Audit। क्योंकि सवाल अब सिर्फ इतना है कि जब सॉफ्टवेयर ही नहीं बना तो यह साम्राज्य किसका बन गया? जब नाकामी लाभ बन जाए,तो समझिए सॉफ्टवेयर नहीं, कहीं और डेटा ट्रांसफर हो रहा है।

क्यूआर कांड
दंतेवाड़ा की शराब दुकान में QR कोड बदलकर 14 दिन में 1 करोड़ उड़ाए गए। यह कोई अकेला कारनामा नहीं, पूरे आबकारी मॉडल का एक्स रे है। सवाल सिर्फ़ यह नहीं कि एक सेल्समैन ने कोड बदला, असली सवाल यह है कि सिस्टम दो हफ्ते तक सोया क्यों रहा। अगर एक जगह पकड़ा गया है, तो मान लेना बाकी जगहें सिर्फ़ इंतजार कर रही हैं पकड़े जाने का नहीं, माहौल ठंडा होने का। किस्मत देखो, पिछली सरकार में आबकारी विभाग पर कार्रवाई हुई थी, नई सरकार में भी वही विभाग नई कहानी लिख रहा है। मानो सिस्टम बता रहा हो सरकारें बदलिए, रास्ता वही मिलेगा। QR कोड से चलने वाला हजारों करोड़ का कारोबार जब ऐसे बदल जाए, तो समझ आ जाता है सुरक्षा नहीं थी, सुरक्षा का भ्रम था। अंदरखाने अफसर भी मान चुके हैं कि अगर जांच सच में नीचे तक गई तो ऊपर तक करंट दौड़ेगा, पर करंट वहाँ ही लगता है जहाँ लीकेज रोकने का इरादा हो। जनता अब वही सवाल पूछ रही है कार्रवाई कोड बदलने वाले पर रुकेगी या कोड बदलने देने वाले सिस्टम तक जाएगी। दंतेवाड़ा सबक यह देता है कि घोटाला नया नहीं, बस उसका सबूत ताजा पकड़ा गया है।

जहाँ देशभर के DGP रायपुर में सुरक्षा पर मंथन कर रहे हैं, वहीं छत्तीसगढ़ खुद नौ महीने से स्थाई DGP ढूँढ रहा है। उधर 13 आईएएस के अचानक तबादले से लेकर धमतरी का फर्जी ACB अफसर और दंतेवाड़ा का QR कांड सब एक ही कहानी कहते हैं सिस्टम जब सोता है, खेल जाग जाता है। घोटाले यहाँ जगहों से नहीं, आत्मविश्वास से पनपते हैं। कुल मिलाकर, इस बार का अफ़सर-ए-आ’ला बताता है कि राज्य का प्रशासन फाइलों से नहीं, सवालों से अपना हाल बयान कर रहा है।।

यक्ष प्रश्न
1 . पुलिस कमिश्नर प्रणाली कब लागू होगी?

2 . मोदी-शाह के रायपुर दौरे के बाद कोई बड़ा बदलाव तो नहीं होगा?

3 . एक पॉवरफुल मंत्री ने कभी कहा था जमीन से जुड़े पूंजीपतियों को ठीक कर दूँगा। क्या गाइडलाइन और रजिस्ट्री शुल्क की यह उछाल उसी ‘ठीक करने’ का अगला अध्याय है, या सिर्फ़ संयोग?

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