अफ़सर-ए-आ’ला (हर रविवार को सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(हर रविवार को सुशांत की कलम से)

हाउस अरेस्ट का गणित और इंटेलिजेंस की बुद्धिमत्ता
देश के गृहमंत्री जब बस्तर की धूल फाँकते हुए सुरक्षा और व्यवस्थाओं का जायज़ा ले रहे थे, ठीक उसी वक़्त राजधानी रायपुर में एक और व्यवस्था चुपचाप गढ़ी जा रही थी। मामला किसी मामूली कार्यकर्ता का नहीं, बल्कि पार्टी के वरिष्ठ आदिवासी चेहरे और पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर का था जिन्हें अचानक घर में नज़रबंद कर दिया गया। अब सवाल यह है कि आख़िर इस इंटेलिजेंट आइडिया का सूत्रधार कौन था? प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि यह पूरा ऑपरेशन इंटेलिजेंस के इशारे पर हुआ। लेकिन हकीकत में यह इशारा इंटेलिजेंस से ज़्यादा इम्मेच्योरिटी की तरफ इशारा करता है। नतीजा वही हुआ, जिसका अंदेशा था सरकार की छवि धुली नहीं, उल्टा और मैली हो गई। हाउस अरेस्ट से किसका क्या बिगड़ता? ननकीराम सड़कों पर निकलते, तो आवाज़ उनकी होती लेकिन उन्हें रोककर सरकार ने विपक्ष को मुफ़्त का मुद्दा थमा दिया। मीडिया, सोशल मीडिया और चौराहे हर जगह चर्चा गृहमंत्री के दौरे की कम और ननकीराम के हाउस अरेस्ट की ज़्यादा रही। इसे कहें तो इंटेलिजेंस की मिसफ़ायर या सिस्टम की दलाली के खिलाफ आवाज़ दबाने का अधूरा प्रयास। जिस फैसले से आवाज़ थामनी थी उसी से सवालों की गूंज अब तेज़ हो गई।

भारसाधक सचिवों को संदेश
ननकीराम कंवर जी का किस्सा तो आज का है मगर इसके पीछे लिखी जा रही स्क्रिप्ट पर फिल्मांकन काफी पहले से जारी है। कुछ दरबारी प्रशासकीय प्रमुखों ने पर्दे के पीछे से ब्यूरोक्रेसी को ये संदेश आज से काफी पहले दे दिया था कि किसी भी राजनीति की चिंता नहीं करना है। विभाग हो, जिला हो मालिक आप ही हो, न कि मंत्री या जिले के कद्दावर नेता। विभाग और जिला आप संभालो और हाउस हम देख लेंगे। इसी सिलसिले में कोरबा कलेक्टर को हटाने का मामला भी शामिल है। इसी में मंत्रियों के यहाँ से सचिवों को भेजी जाने वाली नोटशीट्स भी जिन्हें या तो सचिव दराज में रख लेते हैं या फिर अवर सचिव को यह कहकर पकड़ा देते हैं कि जब तक मैं न बोलूँ, बढ़ाना मत। कुल मिलाकर हासिल यह है कि चाहे ई-ऑफिस ले लो या दबाव डलवा लो होगा वही, जो अफ़सर चाहेंगे। जाहिर है कि अगर कोरबा कलेक्टर हट गए तो भी यह संदेश जाएगा, और अगर नहीं हटे तो भी।
कुछ बुझे…

नक्सल डंडा भी, गाजर भी –
छत्तीसगढ़ की राजनीति और प्रशासन इस हफ़्ते एक नए खेल का गवाह बना। खेल का नाम डंडा भी, गाजर भी। एक तरफ़ NIA ने चार आरोपियों पर चार्जशीट ठोक दी। आरोप? माओवादी नेटवर्क की जेब भरने का। संदेश साफ़ था कानून का डंडा चलेगा, छूट नहीं। लेकिन तभी मंच पर गृहमंत्री आए और गर्व से बोले हमारी नीति देखिए, 500 नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं। तालियाँ भी बजीं, कैमरे भी चमके। अब जनता सोच में पड़ गई भाई, यह सरकार किस मोड पर है? क्या यह वही सरकार है जो कह रही है हम सख़्ती करेंगे? या फिर वही सरकार जो मुस्कुराकर बोल रही है हम गले लगाएंगे? ब्यूरोक्रेसी भी उलझन में है। फाइल लिखनी है कड़ा कदम या मुलायम नीति? ऑपरेशन का आदेश देना है या स्वागत समारोह की तैयारी करनी है? विपक्ष ने तो मौका हाथों-हाथ ले लिया। तंज़ कसा ये सरकार है या राशन की दुकान? यहाँ डंडा भी मिलता है, और गाजर भी। असल सवाल यह है कि क्या यह रणनीति है या सिर्फ़ राजनीति?
क्या सरकार सच में नक्सल समस्या का हल निकाल रही है, या फिर बस आँकड़ों का गुलदस्ता सजाकर जनता को दिखा रही है?

न्याय – जीवन ही नहीं, मृत्यु भी अपनी है
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस हफ़्ते एक ऐसा फैसला सुनाया, जिसने न सिर्फ़ कानून की किताबें हिलाई , बल्कि सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों को भी आईना दिखा दिया। अदालत ने कहा सम्मानजनक मृत्यु और अंतिम संस्कार भी संवैधानिक अधिकार है। अब सोचिए, जहाँ सरकार जीते जी इंसान को हाउस अरेस्ट कर सकती है, वहाँ अदालत ने मरते वक्त भी गरिमा माँग ली। एक तरफ़ सत्ता का राग है हम तुम्हें नियंत्रित करेंगे, तुम्हारे कदम रोक देंगे।
दूसरी तरफ़ अदालत का स्वर है कम से कम मरते वक्त तो इंसान को चैन से रहने दो। जनता ने इस फैसले को सुना और हल्की मुस्कान के साथ तंज़ कसा जितना अपमान जीते जी सहना पड़ता है, उतना तो मरते वक्त भी न हो।
ब्यूरोक्रेसी के लिए यह फैसला किसी चेतावनी से कम नहीं। वो अफसर जो फाइलें दबा देते हैं, आवाज़ों को रोक देते हैं और हर आंदोलन को व्यवधान मानते हैं, उन्हें अब यह समझना होगा कि अदालत की नज़र सिर्फ़ फाइलों पर नहीं, जीवन और मृत्यु पर भी है। असल में यह फैसला सिर्फ़ कानूनी आदेश नहीं है, यह सत्ता के लिए संदेश है अगर जीवन पर तुम्हारा अधिकार जताना गैरकानूनी है, तो मृत्यु पर भी तुम्हारा नियंत्रण नहीं चलेगा। जब तक इंसान जीता है, सत्ता उसे घेरती है लेकिन मरते वक्त भी अगर गरिमा बचानी पड़े, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र केवल किताबों में रह गया है।

डैम का बहाव और अफसरों का ठाठ
इस हफ़्ते जब आसमान से पानी बरसा तो धरती भीग गई, खेत लहलहा उठे, लेकिन प्रशासन के माथे पर पसीना छलक आया। गंगरेल डैम उफनाने लगा, और आनन-फानन में 55,000 क्यूसेक पानी छोड़ा गया। आदेश आया जनता को अलर्ट करो! अलर्ट हुआ भी… लेकिन वक्त पर नहीं। पहले पानी छोड़ा गया, फिर सूचना तैरकर आई। गाँवों में लोग सोचते रह गए कि यह प्रशासन है या बाढ़ का बैंड बाजा बजाने वाली टोली? कागजों में लिखा गया हम पूरी तरह तैयार हैं। जनता ने पढ़ा और मुस्कुरा दी तैयारी में हो या फिर सिर्फ़ तैयार बयान में? असलियत यह है कि पानी का बहाव डराता नहीं, बल्कि प्रशासन की सुस्ती डराती है। नोटशीटें संभाले बैठे अफसरों को डैम के बहाव से फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि उनके दफ़्तरों की कुर्सियाँ हमेशा ऊँचाई पर रहती हैं। जिन्हें चेतावनी मिलनी चाहिए थी, वे खेत खलिहानों में थे। जिन्हें चेतावनी मिली, वे पहले से एसी कमरों में सुरक्षित थे। और यही है छत्तीसगढ़ का पानी और प्रबंधन का असली फॉर्मूला पानी बहेगा जनता की ज़मीन पर, और जवाबदेही बहेगी प्रशासन की दराज़ में।

अफ़सर-ए-आ’ला वह आईना है, जहाँ हाउस अरेस्ट से लेकर डैम के बहाव तक, सत्ता की नाकामियाँ और अफसरशाही की मनमर्ज़ियाँ एक हफ़्ते की कहानी बनकर व्यंग्य में गूंजती हैं।

यक्ष प्रश्न :-

1 किस जिले के एक कलेक्टर ने एक नौजवान महिला अफसर को हीरों का हार दिया है ?

2 क्या हालिया मुख्यसचिव मंत्रियों और सचिवों के बीच तालमेल बैठा पाएंगे ?

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