अफ़सर-ए-आ’ला (हर रविवार को सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(हर रविवार को सुशांत की कलम से)
अखिल भारतीय सेवा की गिरती साख –
कभी IAS का नाम सुनते ही लोगों को गर्व होता था। कहा जाता था यह एक अफसर ही पूरे जिले की तस्वीर बदल सकता है। मगर आज हालात बदल गए हैं। 32 जिलों में आधे कलेक्टरों का नाम तक याद नहीं आता, लेकिन घोटालों की लिस्ट तुरंत जुबान पर चढ़ जाती है। यह इमेज अचानक नहीं बनी है, बल्कि अफसरों की काम करने की आदतें और रवैया ही जनता को यह कहने पर मजबूर कर रहे हैं। चूंकि किस्से मशहूर हैं एक अधिकारी जिनके पास शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी है, उनकी फाइल तभी आगे बढ़ती है जब मातहत दस बार दौड़-धूप कर ले। बीच में अगर मीडिया या मंत्री स्तर पर मामला न उछले तो महीनों वही फाइल धूल खाती रहती है। एक महिला आईएएस की शैली इतनी मूड पर टिकी है कि उनका दिन अच्छा है तो विभाग खुश, वरना पूरा सिस्टम ठप। कुछ अधिकारी तो खुलेआम समय बिताओ समिति चला रहे हैं। वे ऑफिस आते हैं, कुर्सी पर बैठते हैं, फाइल देखते हैं और शाम तक इंतज़ार करते हैं काम से ज़्यादा वक्त काटने पर जोर। इधर जनता तो फाइलों में अपना भविष्य देख रही है। मगर जब अधिकारी ही मूड और समय के हिसाब से चलें, तो उस भविष्य का क्या होगा?
पुलिस की पोस्टिंग राजनीति और जनता की सुरक्षा –
अब जरा पुलिस महकमे की ओर देखें। IPS की पहचान कभी सख़्त, फाइटर और ईमानदार छवि से होती थी। अपराधी उनका नाम सुनकर डरते थे। मगर आज तस्वीर कुछ और है एक अफसर के निजी प्रसंगों की चर्चाए इतनी हुई कि उन्हें सर्वोच्च स्तर का पदक दे दिया गया।
यह पद इनाम था या जुगाड़ यह तो नही पता
मगर पुलिस मुख्यालय में महीनों से काम का बंटवारा तय नहीं हो रहा। फाइलें रुकी हैं, फैसले अधर में हैं, मगर कुर्सियों का बंटवारा सुचारू रूप से चल रहा है। अपराध और कानून-व्यवस्था से जूझते जिले अक्सर बिना पर्याप्त ध्यान के रह जाते हैं, क्योंकि अधिकारियों का फोकस कौन कहाँ बैठेगा पर ज्यादा है। देखिए साहब जनता को न तो अफसर की चमकदार यूनिफॉर्म चाहिए, न मेडल की फोटो। उसे चाहिए सड़क पर सुरक्षा और अपराध पर लगाम। अगर पुलिस विभाग यही भूल जाए, तो डरना लाजमी है क्योंकि फिर कानून व्यवस्था किसके भरोसे बचेगी?
जनता के मुद्दे या अफसरों की कुर्सियाँ?
अब आते हैं सबसे बड़े दफ्तर हाउस पर। जहाँ से तो पूरे प्रदेश की नीतियाँ और दिशा तय होती है। जनता उम्मीद करती है कि यह जगह शिक्षा, रोज़गार, उद्योग और पारदर्शिता की नीतियों पर फोकस करेगी। लेकिन हकीकत? यहाँ के अफसर आपस में उलझे हैं कि मुख्य सचिव कौन बनेगा, DGP किसे बनाना है। जनता बेरोज़गारी से त्रस्त है, उद्योग ठहरे हैं, शिक्षा पिछड़ रही है, मगर हाउस में सबसे बड़ी चर्चा होती है कुर्सी का गणित। मानो अफसर जनता से कह रहे हों पहले हमें अपनी पसंद का सीएस-डीजीपी चुनने दीजिए, फिर आपके मुद्दों पर लौटेंगे। चिंतन का विषय है कि जब सत्ता का सबसे अहम केंद्र भी जनता की समस्याओं की जगह पोस्टिंग में व्यस्त हो जाए, तो प्रदेश की बुनियादी दिक्कतें कौन सुलझाएगा?
घर से पैसा लगाओ, मंत्री जी!-
छत्तीसगढ़ की नई मंत्रिपरिषद में दो चेहरे ऐसे हैं। जो कभी कांग्रेस की बेंच पर बैठे थे और अब सत्ता की नई चौकी पर विराजमान हैं। एक को पर्यटन संस्कृति और धार्मिक न्यास का थैला मिला है। तो दूसरे को कौशल विकास और रोज़गार का झोला। दोनों विभाग सुनने में बड़े चमकदार लेकिन असलियत में ताली जनता बजाएगी, खर्चा मंत्री को करना पड़ेगा।पर्यटन संस्कृति वाले मंत्री जी को झरनों पर रोशनी, मंदिरों में आयोजन और मेलों की सजावट करनी है। लेकिन फाइलों के बजट से ज़्यादा जेब का बजट खपना तय है। लगता है कि मंत्री जी का बंगला ही टूरिस्ट स्पॉट बन जाएगा। दूसरी तरफ कौशल विकास वाले मंत्री जी हैं। जिनके पास बेरोज़गारों को उम्मीद बाँटने का लाइसेंस है। हर हफ़्ते नया पोस्टर, नई ट्रेनिंग, नया वादा पर लाइन वही लंबी। अब चाय–समोसा और मंच का खर्चा तो घर से ही उठाना पड़ेगा। दोनों का साझा हाल यही है एक को मंदिर-मेला पालना है, दूसरे को बेरोज़गारों की रेलगाड़ी। सरकारी खजाना मुस्कुराएगा, लेकिन मंत्री जी की जेब ज़रूर रोएगी। सत्ता का सुख मिल गया है, पर अब असली इम्तिहान शुरू हुआ है – घर से पैसा लगाओ, मंत्री जी!
हैरत असम में, खामोशी छत्तीसगढ़ में! –
देश भर में असम हाईकोर्ट की एक सुनवाई ने तहलका मचा दिया। जब अदालत के सामने ये बात आई कि राज्य की भाजपा सरकार ने अडानी को सीमेंट फैक्ट्री के लिए 3,000 बीघा (करीब 8.1 करोड़ वर्गफुट) जमीन दे दी है, तो माननीय जज साहब खुद हैरान रह गए। अदालत में ठंडी हवा चली और सवाल उठा क्या ये मजाक है? क्या आप पूरा जिला देने पर तुले हैं? यानी अदालत भी चौंक गई कि एक कंपनी को इतनी बड़ी जमीन आखिर किस तर्क पर दे दी गई। लेकिन अब ज़रा रुख मोड़िए छत्तीसगढ़ की ओर। यहाँ पिछले कुछ सालों में जंगल के जंगल उजाड़ दिए गए, पहाड़ियां समतल कर दी गईं और हजारों हेक्टेयर जमीन खनन कंपनियों के हवाले कर दी गई। कटघरे में सवाल वही है क्या यहाँ अदालत कभी चौंकी? क्या यहाँ के लोग कभी गुस्साए? असम में 3000 बीघा पर जज साहब की भवें तन जाती हैं। पर छत्तीसगढ़ में जंगल के जंगल समर्पित कर दिए गए और यहाँ कोई चौंकने वाला भी नहीं। आदिवासी गाँव छोड़ने पर मजबूर हुए, नदियाँ गंदी हुईं, जंगली जानवर उजड़ गए। लेकिन यहाँ के नेता और अफसर इसे विकास का नाम देकर अपना पीठ थपथपाते रहे। असम में तो अदालत ने तंज कस दिया क्या आप पूरा जिला ही दे देंगे? लेकिन छत्तीसगढ़ में तो हाल ये है कि जिला नहीं, पूरा जंगल चाहिए तो ले जाओ, बस रॉयल्टी में हलवा खिलाना मत भूलना! जब 3000 बीघा असम में अदालत को झकझोर सकता है, तो छत्तीसगढ़ में लाखों बीघा जंगल देने पर चुप्पी क्यों? जब पहाड़ियां काटकर फाइलों में ग्रीन सर्टिफिकेट मिल सकता है, तो न्याय कहाँ है? और जब जनता का हक कॉर्पोरेट का हक बना दिया जाता है, तो लोकतंत्र कहाँ है? असम में जज चौंके, छत्तीसगढ़ में लोग सोए। फर्क बस इतना ही है।
संयोग नही प्रयोग का बाजार –
ऑनलाइन गेमिंग पर संसद में बिल आया, लेकिन असली खेल तो उससे पहले ही खेला जा चुका था। राकेश झुनझुनवाला की पत्नी, रेखा झुनझुनवाला ने Nazara Technologies में अपनी पूरी हिस्सेदारी बेच दी। जून 2025 से हिस्सेदारी कम करनी शुरू की और 13 जून को धुआँधार ब्लॉक डील से 334 करोड़ रुपये जेब में डाल लिए। बिल पास होते ही शेयर गिरा। अब यह महज संयोग है या प्रयोग? दरअसल भारत में ये कोई पहला मामला नहीं है मार्केट के बड़े खिलाड़ी अक्सर नियामकीय बदलाव की आहट पहले ही पकड़ लेते हैं। राकेश झुनझुनवाला खुद इनसाइड ट्रेडिंग में लिप्त पाए गए थे। SEBI ने पेनल्टी लगाई, जुर्माना भरा, और फिर मामला खत्म।
मतलब साफ है मार्केट का कानून तोड़ो, फिर फीस देकर क्लास पास करो। गेमिंग का असली खेल बड़े लोग इनसाइड जानकारी पाकर समय पर निकल जाते हैं। आम निवेशक बाद में खबर सुनकर फँस जाता है। नुकसान पब्लिक का, मुनाफा खिलाड़ियो का। फर्क सिर्फ इतना है कि गेमिंग बिल आम जनता के लिए है, लेकिन असली गेमिंग तो मार्केट के महारथियों खेल जाते है। भारत में इनसाइड ट्रेडिंग गैरकानूनी है। लेकिन हकीकत ये है कि यह बड़े ट्रेडरों की सीढ़ी रही है। कानून कागज़ पर है, और खेल पूँजी बाज़ार में। बस जनता बार-बार यही पूछती रह जाती है ये संयोग है या प्रयोग?
यक्ष प्रश्न
1 – राजनांदगांव की विधानसभा सीट पर उपचुनाव होगा या नहीं?
2 – परिवहन और आबकारी मुख्यमंत्री से अलग कारण बताइए










