अफ़सर-ए-आ’ला (हर रविवार को सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(हर रविवार को सुशांत की कलम से)

जमानत उत्सव
जमानत मिली है, लेकिन माहौल ऐसा है जैसे चुनाव जीत लिया गया हो। सड़कें भरी हैं, झंडे लहरा रहे हैं, रील्स बता रही हैं सच जीत गया। सवाल बस इतना है, किस सच की जीत? 3200 करोड़ के शराब घोटाले का आरोप अब भी फाइलों में ज़िंदा है, लेकिन जश्न में वह काग़ज़ दब गया है। कल तक परिवारवाद पर भाषण था, आज परिवार के नाम पर तालियाँ बज रही हैं। युवा आज भी रोज़गार की लाइन में खड़ा है, और साहेब का फंड ज़मीनों में “बिट्ठल” हो चुका है। कल आर्थिक नाकेबंदी थी, आज जमानत का जुलूस है मुद्दा वही, भाषा बदल गई। ईडी-आईटी पर आरोप आसान हैं, लेकिन एक सवाल अब भी खड़ा है अगर सब गलत है, तो इतना बड़ा उत्सव किस खुशी में?

डीजीपी की टेबल पर सवाल
इस जमानत प्रकरण में कहानी सिर्फ़ आरोपी तक सीमित नहीं रही। हाईकोर्ट ने राहत देते हुए जांच की प्रक्रिया पर सीधा सवाल खड़ा किया। कोर्ट ने पूछा जब एक वांछित आरोपी का बयान लिया गया, तो उसे उसी वक्त गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया? यहीं से मामला अदालत से निकलकर सिस्टम की ओर मुड़ गया। हाईकोर्ट ने इसे साधारण चूक नहीं, बल्कि गंभीर प्रक्रियागत उल्लंघन माना। इसीलिए पूरे प्रकरण की समीक्षा डीजीपी स्तर पर कराने को कहा गया। डीजीपी ने कोई बयान नहीं दिया, लेकिन अदालत का निर्देश अपने आप में भारी था। अगर जांच वाकई निष्पक्ष थी, तो गिरफ्तारी में यह भेद क्यों? और अगर भेद था, तो ज़िम्मेदारी किसकी? शायद इसी वजह से इस केस में शोर सड़कों पर है, और असहजता फाइलों के भीतर।
क्योंकि अदालत ने किसी दल से नहीं, सीधे सिस्टम से सवाल किया है। और अब वह सवाल सीधे डीजीपी की टेबल पर रखा है।

तमनार – जब शासन ने आँखें मूँद लीं –
तमनार की घटना किसी एक घंटे की हिंसा नहीं थी। यह दो हफ्ते से चल रहे शांत, लोकतांत्रिक और संवाद की मांग वाले आंदोलन का दुखद अंत थी। चौदह ग्राम पंचायतों के ग्रामीण कोयला परियोजना के खिलाफ धरने पर बैठे थे। मांग सिर्फ़ बातचीत की थी, टकराव की नहीं। फिर अचानक हालात बिगड़ते हैं।चश्मदीद कहते हैं पहला लाठीचार्ज महिलाओं पर हुआ। वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं उन्होंने बल प्रयोग का आदेश नहीं दिया। तो सवाल उठता है अगर आदेश नहीं था, तो ज़मीन पर कमान किसके हाथ में थी? इसी अफरा-तफरी में एक महिला पुलिस आरक्षक भीड़ के बीच फँस जाती है। उसकी वर्दी फाड़ी जाती है, और वह पूरे सिस्टम की विफलता का चेहरा बन जाती है। बताया जाता है कि उसी वक्त जिले के शीर्ष प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी इलाके में मौजूद थे औद्योगिक समूह के गेस्ट हाउस में। अगर इंटेलिजेंस ने पहले ही संभावित तनाव की चेतावनी दी थी, तो उसे गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया? और अगर नहीं दी थी, तो यह कैसी खुफिया व्यवस्था है? हिंसा के बाद गिरफ्तारियाँ होती हैं, लेकिन नाम सामने नहीं आते। और सवाल आंदोलन पर नहीं, जवाबदेही पर टिक जाते हैं। तमनार अब सिर्फ़ कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि नेतृत्व, संवाद और संवेदनशील शासन के पतन की कहानी है। क्योंकि जब सत्ता सुनना छोड़ दे, तो शांति भी हिंसा में बदल जाती है। और तब सवाल भीड़ से नहीं, सिस्टम से पूछा जाता है।

तीन अक्षरों का सच
छत्तीसगढ़ का एक तीन अक्षरों वाला जिला है,
जहाँ इन दिनों विकास की दिशा पर काफी चर्चा है। कहते हैं, जनपद के एक बड़े ठेकेदार को डीएमएफ से करीब 80 लाख की सौगात मिली। काम के नाम पर, लेकिन भरोसे के साथ। और अधीनस्थों को सख़्त हिदायत है यह बात बाहर नहीं जानी चाहिए। सूत्र बताते हैं कि डीएमएफ शाखा में एक तय गणित चलता है। मेज़ पर भी, और उससे ऊपर भी। दिलचस्प यह कि अब वसूली के लिए अपने ही विभाग के अफसर लगाए गए हैं। राजस्व की भाषा भी कुछ बदली-बदली सी है। काग़ज़ पूरे हैं, लेकिन पंक्तियों के बीच काफी कुछ बह रहा है।डीएमएफ स्थानीय हित के लिए बना था,
पर सवाल यह है फायदा आखिर किसे मिल रहा है? तीन अक्षरों वाले इस जिले में विकास हो रहा है , बस दिशा को लेकर लोग अब भी असमंजस में हैं।

आनंद की कल्पना, या कल्पनाओं का आनंद?
यह कोई प्रेम कहानी नहीं है। यह एक प्रशासनिक कल्पना है, जिसमें आनंद भी है और उड़ान भी। कहानी की नायिका का नाम कल्पना है। नायक का नाम आनंद। नाम महज़ संयोग हैं, अर्थ व्यवस्था से जुड़ा है। कहानी तब शुरू होती है जब ट्रेनिंग के बाद आमतौर पर जहाँ इंतज़ार होता है, वहाँ अचानक सुविधा उतर आती है। कुछ लोग सालों तक “बॉट जोहते” रह जाते हैं, और कुछ कम समय में ऐसी उड़ान भरते हैं कि नीचे खड़े लोग हैरान रह जाते हैं। इस कहानी में भी उड़ानें बार-बार हैं। रायपुर से दिल्ली, और वापस। सवाल यात्रा पर नहीं, उसके मक़सद पर है। क्या ये उड़ानें
सरकारी थीं? अगर थीं, तो उनके आदेश कहाँ हैं? और अगर नहीं थीं, तो सरकारी संसाधन किस कल्पना में खर्च हुए? यहीं से कल्पना और आनंद एक ही फ्रेम में दिखाई देते हैं। यह कहानी अब व्यक्तिगत नहीं रहती। यह बन जाती है सिस्टम की कहानी। जहाँ पोस्टिंग असाधारण है, उड़ानें नियमित हैं, और जवाब अनुपस्थित। तो सवाल यह नहीं कि आनंद किसका था। सवाल यह है कि इस पूरी कल्पना का लाभ किसे मिला?

यक्ष प्रश्न

1 – छत्तीसग़ढ़ में जिस तरीके से अशांति का माहौल में किसकी कुर्सी जा सकती है ?

2 – सरगुजा के बाबा को दो महत्वपूर्ण राज्य के स्कैनिक कमेटी के अध्यक्ष बनने के क्या मायने है ?

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