अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी – सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(रविवार की चिट्ठी – सुशांत की कलम से)

घर का रास्ता –
खेलो इंडिया के बहाने राजधानी में सियासत भी खेली गई। एक केंद्रीय मंत्री जी आए, मंच सजा, नेता जुटे, स्वागत की कतारें लगीं। डिप्टी मुख्यमंत्री से लेकर बड़े-बड़े चेहरे मौजूद थे सब अपने-अपने मौके की तलाश में थे। लेकिन असली दृश्य मंच पर नहीं, मंच से बाहर सजाया गया। केंद्रीय मंत्री जी सीधे पहुँचे उस कार्यकर्ता के घर, जो कभी खाता-बही संभालता था और जिसने करीब पाँच साल पहले ही पार्टी जॉइन की थी। नेता देखते रह गए, और कार्यकर्ता के घर पर राजनीतिक संदेश लिख दिया गया। यह वही पल था, जब बड़े चेहरे इंतजार करते रहे और जमीनी कार्यकर्ता तस्वीर में आ गया। मंत्री जी वहाँ सहज थे, बाकी सब असहज नजर आए। सवाल सिर्फ एक मुलाकात का नहीं है,सवाल यह है कि पार्टी के भीतर असली महत्व किसका है पुराने कार्यकर्ता का या नए समीकरणों का? क्योंकि हकीकत यह है कि आज सत्ता के कई चेहरे वे हैं, जो कभी दूसरी तरफ थे। करीब डेढ़ दर्जन विधायक और कुछ सांसद ऐसे हैं, जो दलबदल के बाद सीधे सत्ता के केंद्र में पहुँच गए। अब देखना यह है कि जिनके कंधों पर पार्टी खड़ी हुई, वे किनारे खड़े रहेंगे या फिर सियासत का रास्ता फिर से बदल जाएगा। क्योंकि चुनाव सिर्फ चेहरे नहीं, भरोसे से जीते जाते हैं। और भरोसा… अक्सर मंच पर नहीं, घर के दरवाजे पर दिखता है।

फाइलों से दिल तक का सफर –
एक बड़े जिले के कलेक्टर साहेब है। जिला बड़ा है और साहेब कद में छोटे, लेकिन चर्चाओं में उतने ही बड़े दिखलाई पड़ते हैं। इन दिनों प्रशासनिक गलियारों में काम से ज्यादा किस्से चल रहे हैं, और इन किस्सों की खुशबू दूर तक जा रही है। कहते हैं इश्क़ और खुशबू छुपाए नहीं छुपते। शुरुआत एक विकासखंड की कनिष्ठ अधिकारी से हुई। रात के सन्नाटे में हेलमेट लगाकर स्कूटी से निरीक्षण होते थे पहचान भी सुरक्षित, और कहानी भी। लेकिन कहानी तब बदली, जब हार, तोहफे और लेनदेन की बातें बाहर आईं। मामला इतना बढ़ा कि उस अधिकारी के खिलाफ एफआईआर तक दर्ज हो गई। और यहीं से कहानी में एक नया मोड़ आया गलियारों में यह भी चर्चा रही कि उसी “मेडम” ने ट्रांसफर-पोस्टिंग के नाम पर करीब 65 लाख रुपए ले लिए थे। अब जब मामला खुला, तो पैसे की वापसी का सवाल खड़ा हुआ। कहते हैं कलेक्टर साहेब ने जिम्मेदारी नीचे सरका दी एसडीएम और तहसीलदार तक बात पहुँची। और फिर फाइलों के बाहर, सिस्टम के अंदर “सेटलमेंट” की एक और कहानी लिखी गई। बताया जाता है कि आखिरकार वही पैसे “पटाए” गए कैसे, किसके जरिए यह भी अब किस्सों का हिस्सा है। इसके बाद साहेब का दिल नए पते पर शिफ्ट हो गया राजधानी के सेड़ीखेड़ी की एक जनप्रतिनिधि के आसपास। अब स्कूटी की जगह निजी वाहन है, और मुलाकातों का स्तर भी अपग्रेड हो चुका है। जिले में अब कहावत चल पड़ी है “यहाँ फाइलें कम, फीलिंग्स ज्यादा चलती हैं।” कभी सवाल उठे थे लेकिन जवाबों ने नहीं, हालात ने सबको खामोश कर दिया। अब ट्रांसफर, पोस्टिंग और नजदीकियां सब एक ही कहानी के किरदार लगते हैं। बीच में यह चर्चा भी उड़ी कि साहेब की अगली मंज़िल सीपीआर हो सकती है, लेकिन यही किस्से उस कुर्सी तक पहुँचने से पहले ही रास्ता रोक गए। पिछले दो साल से जिले की कमान संभाले ये साहेब अब काम से ज्यादा कहानी में हैं। अंत में बस इतना कुर्सी और दिल दोनों संभालना आसान नहीं एक फिसला तो खबर, दोनों फिसले तो किस्सा बन जाता है।

मंदिर से जिम तक –
एक वक्त था जब ट्रांसफर-पोस्टिंग की फाइलें भगवान भरोसे चलती थीं। रात के सन्नाटे में वीआईपी रोड के मंदिरों के बाहर लाल बत्तियों की कतार लगती थी मत्था टेका जाता था, प्रसाद चढ़ता था और सुबह आदेश निकल जाते थे। कहते थे भक्ति सच्ची हो तो पोस्टिंग पक्की। लेकिन समय बदला है साहब अब आस्था का एड्रेस भी बदल गया है। अब मंदिर नहीं जिम में दर्शन होते हैं। सुबह-सुबह ट्रेडमिल पर दौड़ते कदमों के साथ ट्रांसफर की फाइलें भी वॉर्मअप करती हैं। डम्बल उठते हैं और साथ में सिफारिश भी। यहाँ पसीना कम, नेटवर्क ज्यादा बहता है। कहानी यहीं दिलचस्प हो जाती है इस जिम का ट्रेनर कोई आम नहीं,
बल्कि एक महिला राज्य पुलिस सेवा अधिकारी का होम सपोर्ट सिस्टम है। अब साहब जब ट्रेनर का कनेक्शन घर से हो और जिम में ऊपर वाले घर की एंट्री भी हो, तो फिर वर्कआउट सीधे फाइल पर असर डालता है। सुना है एक मलाईदार पोस्टिंग उड़ीसा बॉर्डर के पास ऐसे ही फिट हुई, जैसे जिम में परफेक्ट सेट बैठता है। और चर्चाओं में यह भी कि एक पॉवरफुल साहेब की घर वाली उसी जिम में फिटनेस और फिटिंग दोनों सीख रही हैं। अब सिफारिश का रास्ता सीधा है ट्रेडमिल से ड्राइंग रूम और वहाँ से ट्रांसफर ऑर्डर। पहले लोग कहते थे मंदिर जाओ, काम बन जाएगा। अब नई लाइन चल रही है जिम जॉइन करो पोस्टिंग खुद दौड़कर आएगी।

टेंडर का गणित –
भिलाई से एक ऐसा मामला सामने आया है, जो सरकारी खरीद प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है। महिला बाल विकास विभाग की योजना के तहत करीब ₹16 करोड़ की खरीद को 155 हिस्सों में बांट दिया गया। मामला टीवी और आरओ खरीद से जुड़ा है, जिसे 2899 आंगनबाड़ी केंद्रों के लिए प्रस्तावित किया गया। पहली नजर में यह एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया लगती है, लेकिन जैसे ही खरीद की संरचना सामने आती है, सवाल उठने लगते हैं। नियम स्पष्ट हैं कि बड़ी राशि की खरीद के लिए केंद्रीकृत टेंडर प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। इससे पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित होती है। लेकिन इस मामले में खरीद को छोटे-छोटे हिस्सों में विभाजित कर दिया गया, जिससे टेंडर की अनिवार्यता ही समाप्त हो गई। अब प्रत्येक ब्लॉक स्तर पर खरीद की जिम्मेदारी तय कर दी गई है। यही वह बिंदु है, जहां प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं। क्या यह विभाजन प्रशासनिक सुविधा के लिए था, या प्रक्रिया से बचने के लिए? तीन दिनों के भीतर ऑर्डर, सप्लाई और भुगतान की बात भी सामने आई है, जो सामान्य सरकारी कार्यप्रणाली से अलग नजर आती है। तकनीकी मानकों को लेकर भी स्पष्टता का अभाव बताया जा रहा है। किस प्रकार के उपकरण खरीदे जाएंगे, इसकी विस्तृत शर्तें सामने नहीं हैं। यह पूरा घटनाक्रम केवल एक खरीद प्रक्रिया का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा प्रश्न है। अब देखने वाली बात यह होगी कि इस मामले की जांच होती है या यह भी अन्य फाइलों की तरह आगे बढ़कर शांत हो जाता है।

जेम का खेल –
हॉर्टीकल्चर विभाग इन दिनों बड़ा उपजाऊ साबित हो रहा है फसल खेत में कम, फाइलों में ज्यादा लहलहा रही है। कहते हैं Government e-Marketplace (GeM) से खरीद हो रही है। जहाँ पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा और सबसे कम दाम का वादा है। लेकिन यहाँ तो कमाल ही हो गया जहाँ चीज़ दो-चार हजार में मिलती है, वहीं फाइलों में उसकी खुशबू 16 हजार पार कर जाती है। अब ये महंगाई नहीं है साहब ये कला है। और इस कला के उस्ताद? गलियारों में चर्चा है कि एक IAS साहब ने नियमों को इतना फिट किया है कि कागज़ भी मुस्कुरा रहा है और सप्लायर भी। उधर, हर टेंडर में एक नाम फुसफुसाता है जिग्नेश पटेल का नाम भले ही अलग-अलग कंपनियों का है पर खेल एक ही स्क्रिप्ट से चलता दिखता है। सरकारें बदलीं, कुर्सियाँ बदलीं पर सप्लाई का रास्ता नहीं बदला। आखिर में बस एक ही सवाल बचता है यह खेती मिट्टी में हो रही है या सिस्टम में?

डीएमएफ का खेल –
रायपुर की चमकती सड़कों से थोड़ा हटकर देवपुरी की साई वाटिका कॉलोनी में इन दिनों एक अलग ही कहानी लिखी जा रही है। यह कहानी विकास की नहीं, बल्कि उस राशि की है, जो आदिवासी इलाकों के लिए बनी थी। डीएमएफ फंड बात सीधी है जब खदानों की धूल कहीं और उड़ती है, तो विकास का पैसा निजी कॉलोनी तक कैसे पहुँच जाता है?कॉलोनी एक निजी बसाहट और उसमें सरकारी पैसे से काम का था। फाइलें कहती हैं आवश्यकता लेकिन लोग पूछ रहे हैं यह प्राथमिकता किसकी? इस कहानी के केंद्र में एक नाम तेजी से उभर रहा है निशिकांत पांडेय का झारखंड से आया चेहरा, जिसने कम समय में सिस्टम की परतों को समझ लिया। मंत्रीजी के लेटरपैड से लेकर फाइलों तक, सिफारिशों की एक लकीर देवपुरी तक जाती दिखती है। कहा जाता है कि अब राजनीति सेवा नहीं, सिस्टम बन गई है जहाँ संपर्क ही सबसे बड़ी पात्रता है। जो इस दायरे में नहीं, वह टेक्निकल कारणों से बाहर हो जाता है। अब सवाल गहराता है क्या फंड जरूरत से नहीं, रिश्तों से तय हो रहा है? देवपुरी की यह कहानी सिर्फ एक कॉलोनी की नहीं, बल्कि उस सोच की है जहाँ सरकारी फंड अवसर बन चुका है। अब देखना है कि मामला जांच तक पहुँचता है या फाइलों में सिमट जाता है।

सीपीआर की कहानी –
सरकारों में कुछ कुर्सियाँ ऐसी होती हैं जहाँ बैठना आसान, टिकना मुश्किल और बचना तो सबसे मुश्किल काम है। जनसम्पर्क विभाग की कुर्सी भी अब कुछ ऐसी ही हो गई है मानो ICU का बेड हो जहाँ हर कुछ महीनों में सीपीआर देना पड़ रहा है। पिछली सरकार में एक वर्दी वाले साहब आए थे लंबी पारी खेले, ऐसी ब्रांडिंग की कि प्रदेश का मॉडल दिल्ली तक चर्चा में रहा। फिर सत्ता बदली तो भरोसा फिर एक वर्दी वाले साहब पर ही गया। लेकिन इस बार कहानी छोटी निकली साहब कुछ ही महीनों में हिट विकेट हो गए। इसके बाद आये एक IAS साहब उम्मीद थी कि सिस्टम संभलेगा, लेकिन यहाँ तो इमेज मैनेजमेंट ही मैनेज नहीं हो पाया। नाम नहीं लिए जाते पर चर्चाएँ खूब हैं बाहरी मीडिया, फर्जी पोर्टल और करोड़ों की इमेज बिल्डिंग। जहाँ इमेज बननी थी वहाँ सवाल बन गए। और अब ढाई साल में तीसरा चेहरा 2012 बैच के नए IAS साहब की एंट्री होती है। कुर्सी वही है लेकिन हालत कुछ ऐसी जैसे मरीज बदलता है, बीमारी नहीं। अब देखना यह है ये साहब सीपीआर देकर सिस्टम को जिंदा करते हैं या सिस्टम ही इन्हें वेंटिलेटर पर डाल देता है। फिलहाल तो सोमवार को जॉइनिंग है बाकी कहानी फाइलें लिखेंगी, और फुसफुसाहटें बताएंगी।

यक्ष प्रश्न –

1 – क्या अप्रैल मई सत्ता और शासन के लिए निर्णायक होने वाला है ?

2 – हिरण का मांस किसकी सह पर सरकारी रिसोर्ट में परसा जा रहा है ?

 

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