अफ़सर-ए-आ’ला (हर रविवार को सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(हर रविवार को सुशांत की कलम से)

सत्ता बनाम संगठन –
रविवार की मेज़ पर इस बार कोई घोटाले की फाइल नहीं, एक नक्शा है ऊपर सत्ता, बगल में संगठन, और बीच में पतली-सी रेखा… जो अब मोटी होती जा रही है। खबर आई एक प्रदेश में संगठन मंत्री बदले गए। दूसरे सूबे में संगठन का चेहरा उठाकर बंगाल की कमान थमा दी गई। तब गलियारों में फुसफुसाहट उठी क्या सत्ता अब स्वसंपूर्ण हो गई है? या संगठन ने अपना अलग रास्ता चुन लिया है? कहानी सीधी नहीं, पर तर्क सरल है। सत्ता चुनाव जीतती है, संगठन जमीन जोतता है। एक रणनीति बनाता है, दूसरा कार्यकर्ता खड़ा करता है। और जब दोनों की चाल एक हो तब रथ तेज़ चलता है। लेकिन जब ताल अलग हो तो घोड़े एक-दूसरे को ही खींचते हैं। इधर विचारधारा की चौपाल पर राष्ट्र का मंत्र गूंजता है, उधर चुनावी चौसर पर जाति का गणित बिछता है। एक कहता है पहचान समग्र हो दूसरा कहता है पहचान सूक्ष्म हो दुविधा यहीं जन्म लेती है। द्वापर का प्रसंग याद आता है जब ऋषियों ने पूछा था, शक्ति कहाँ रहेगी? उत्तर मिला था संगठन मे पर संगठन तभी शक्ति है, जब वह दिशा से जुड़ा हो और सत्ता तभी स्थायी है, जब वह आधार से जुड़ी हो , अफ़सर-ए-आला नोट करता है खींचतान अगर संवाद में बदले तो सुधार है, और यदि अहंकार में बदले तो बिखराव , सत्ता बिना संगठन हवा है, संगठन बिना सत्ता छाया। दोनों साथ हों तो आकार बनता है। सोमवार को देखा जाएगा रेखा और मोटी होती है, या फिर कोई उसे मिटाकर फिर से एक वृत्त बना देता है।

एप्सटीन फाइल –
राष्ट्रीय राजधानी में फाइल खुली तो हेडलाइनें गरजीं नाम उछले, बहसें चलीं, पर इस्तीफों की स्याही सूखी रही। कभी एक पत्र, एक गलती, एक आरोप पर लोग खुद कुर्सी छोड़ देते थे लेकिन अब! जवाबदेही का वज़न तब हल्का नहीं होता था। अब सवाल पूछे जाते हैं, जवाब टाले जाते हैं, और कैमरे नई खबर खोज लेते हैं। यहाँ राजधानी में भी हंगामा है, पर यहाँ गलियारों में चालें नपी-तुली हैं। यहाँ भी अपने-अपने एप्सटीन हैं कोई सलाहकार बनकर, कोई शुभचिंतक बनकर, कोई सेतु बनकर बैठा है। तर्क सरल है सुविधा दो, निकटता पाओ , निकटता पाओ, सौदा पाओ। कोई समुद्र-किनारे सपनों का बंगला दिखाकर भविष्य लिखता है, कोई सम्मान के नाम पर उपहारों की भाषा गढ़ता है। कहानी के किरदार भी साफ़ हैं एक मंत्री, जिसकी दोस्ती रियल एस्टेट में फूलती है। एक अधिकारी, जिसकी कल्पनाएँ गोपनीय सूचनाओं में बदल जाती हैं। एक वर्दीधारी, जिसका कद ऊँचा है, पर कैमरे का कोण उससे ऊँचा। और बीच में व्हाट्सऐप जहाँ नीति इमोजी में और नीयत चैट में दर्ज होती है। तर्क यह नहीं कि आरोप सही हैं या ग़लत। तर्क यह है कि सवाल उठे तो जवाब क्यों नहीं उठते? जांच की घोषणा तेज़ क्यों है, निष्कर्ष की चाल धीमी क्यों? फाइलें चुप क्यों हैं, जब स्क्रीनशॉट बोल रहे हैं। अफ़सर-ए-आला खिड़की से बाहर देखता है। राष्ट्रीय शोर से राज्य की खामोशी तक धागा सीधा है सत्ता का समीकरण वही सुविधा बनाम सिद्धांत। डायरी की आख़िरी पंक्ति लिखी जाती है जवाबदेही विपक्ष का शब्द नहीं, शासन का संस्कार है। रविवार यहीं थमता है। सोमवार को फाइलें फिर खुलेंगी और देखा जाएगा, मुहर किस पर लगती है शोर पर , शर्म पर , या सच पर।

कार्यालयीय पते की गुत्थी –
राजधानी में इन दिनों एक पता चर्चा में है। महानदी भवन जहाँ फाइलें जन्म लेती हैं और फैसले जवान होते हैं। उसी पते पर एक निजी फाउंडेशन का नाम दर्ज है। डायरेक्टरों की सूची में वह शख्स भी दिखता है, जो सरकार के सबसे ऊँचे गलियारों में बैठकर सलाह देता है। अब प्रश्न सीधा है क्या सत्ता के सबसे भरोसेमंद कान निजी काग़ज़ों में भी दर्ज हो सकते हैं? इसके बाद कहा जाएगा यह तो बस रजिस्टर्ड एड्रेस है। पर पता कभी केवल डाकिया नहीं होता, वह पहुँच का पासपोर्ट होता है। महानदी भवन कोई किराए का कमरा नहीं। यह शासन का धड़कता हुआ दिल है। यहाँ से आदेश निकलते हैं, निजी न्यास नहीं अगर सब नियमसम्मत है, तो आदेश कहाँ है? अगर अनुमति है, तो सार्वजनिक क्यों नहीं? जब शासन का सबसे करीबी पद निजी दस्तावेज़ों में दिखाई दे, तो जनता पूछती है हितों की रेखा किस रंग से खींची गई है? सुशासन का अर्थ केवल भाषण नहीं, स्पष्टीकरण भी है। भवन बिका नहीं पर नाम घूम रहा है। और प्रशासन में नाम से ज्यादा संकेत बोलते हैं अब देखना यह है यह काग़ज़ का संयोग है, या मर्यादा की परिभाषा बदल रही है।

कॉल मी सर्विसेज किसको कॉल, और क्या सेवाएं –
इस बार फाइल हल्की नहीं, लाखों की है। जनसंपर्क विभाग की कॉल मी सर्विसेज पर हर महीने उदारता की बारिश हुई कुल जोड़ करेंगे तो राशि एक करोड़ के पार है।काग़ज़ कहते हैं सेवा दी गई। पर सेवा क्या थी कॉल, कनेक्शन या केवल कृपा? यह तो ऊपर वाला जाने, नीचे वाले भुगतान जानते हैं। सूची कहती है कि रीवा, सतना, भोपाल, कोयम्बटूर, नोएडा, मुंबई, दिल्ली, बैंगलोर, जालंधर। दूसरे प्रदेशों की पत्र-पत्रिकाएँ, और यहाँ से विज्ञापन की गंगा बही लेकिन क्या कभी किसी छत्तीसगढ़ी अख़बार को बाहर के जनसंपर्क ने ऐसे नवाज़ा? उत्तर की खामोशी बहुत कुछ कहती है। कहा जाता है यह ब्रांड बिल्डिंग है। पर ब्रांड किसका, और बिल किसके नाम? राज्य की तिजोरी से बाहर की चौखट तक यह सेतु किसने बनाया? अफ़सर-ए-आला के कान में एक और फुसफुसाहट आई निर्णय लेने वाला अधिकारी अक्सर धुंध में रहता है। धुंध विचारों की है या वातावरण की, यह स्पष्ट नहीं पर नोटिंग कभी तेज़, कभी तैरती-सी लगती है। विज्ञापन नीति क्या कहती है? प्राथमिकता स्थानीय को या दूर-दराज़ को? अगर प्रचार राज्य का है, तो प्रतिफल भी राज्य को दिखना चाहिए। सेवा का अर्थ सुविधा नहीं, परिणाम होता है। अब फाइल खुलेगी कॉल की डिटेल भी आएगी, और यह भी कि ‘मी’ आखिर कौन था।

वीआईपी रोड की वो जमीन –
राजधानी की सबसे चमकदार सड़क और सबसे अंधेरी कहानी। वीआईपी रोड की रोशनी में एक ज़मीन चुपचाप सरक गई काग़ज़ों पर। कहानी यूँ कही जा रही है कि सरकारी खसरा अचानक निजी हो गया, रेखा वही रही, मालिक बदल गया। कीमत बताई जाती है पच्चीस करोड़ के आसपास, पर सौदा हुआ जैसे खेत की मेड़ हो। किरदार भी कम दिलचस्प नहीं एक कुर्सी पर बैठा कलमधारी, एक पुराना राजनीतिक चेहरा, और बीच में दलाली की महीन डोर। फाइल कहती है संशोधन , नक्शा कहता है समायोजन, पर सवाल यह है कि यह परिवर्तन था या परिवर्तन का खेल? सरकारी ज़मीन का रास्ता इतना आसान कब से हो गया? क्या रजिस्ट्री की स्याही में इतनी ताकत है कि वह जनता की मिल्कियत को निजी आंगन बना दे? गलियारों में चर्चा है, पर नोटिंग में खामोशी। जांच की आहट है, पर निष्कर्ष की चाल धीमी। अफ़सर-ए-आला डायरी में लिखता है ज़मीन सिर्फ़ मिट्टी नहीं होती, भरोसा भी होती है। वीआईपी रोड पर गाड़ियाँ आज भी रफ्तार से दौड़ रही हैं, पर असली सवाल वही है यह ज़मीन किसकी थी, और अब किसकी है? सोमवार को शायद फाइल खुले।
या फिर यह कहानी भी रोशनी में रहकर अंधेरे में दर्ज हो जाए।

रेरा पर सवाल, –
देश की सर्वोच्च अदालत ने रियल एस्टेट नियामक पर तीखे सवाल खड़े किए कहा, यदि नियामक पीड़ितों की ढाल नहीं बन पा रहा, तो उसके औचित्य पर पुनर्विचार होना चाहिए।
आरोप यह भी कि जहाँ खरीदार को राहत मिलनी थी, वहीं डिफॉल्टरों को सांस मिल रही है। आदेश हैं, पर अमल की राह धुंधली है अधिकार हैं, पर उपयोग ढीला है। छत्तीसगढ़ का हाल इससे अलग नहीं दिखता शिकायतें दर्ज होती हैं, सुनवाई की तारीखें बढ़ती हैं, और फ्लैट खरीदार ईएमआई और किराया साथ-साथ भरते हैं। कहा जाता है रेरा के पास वसूली की शक्ति है, पर ज़मीन पर रिकवरी की रफ्तार सुस्त है कई मामलों में आदेश के बाद भी अनुपालन लंबित, और दंड की धार कुंद दिखलाई पड़ती है , बिल्डरों की लॉबी मज़बूत बताई जाती है, नियमों की व्याख्या लचीली।
राज्यों में नियम अलग-अलग है नियमन की एकरूपता गायब है। सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ़ है नियामक अगर नियमन न कर सके, तो वह नाम मात्र का प्राधिकरण रह जाता है। छत्तीसगढ़ में भी सवाल यही है क्या प्राधिकरण पीड़ित खरीदार के साथ खड़ा है? या प्रक्रिया के पीछे छुपा हुआ है? घर केवल संपत्ति नहीं, मध्यवर्ग की पूरी पूंजी है जब न्याय विलंबित होता है, तो भरोसा सबसे पहले गिरवी पड़ता है। नियामक की कुर्सी सम्मान नहीं, जिम्मेदारी है। अगर पारदर्शिता और तामील साथ न चलें, तो अदालत की टिप्पणी केवल दिल्ली की खबर नहीं रहती वह हर राज्य का आईना बन जाती है।

यक्ष प्रश्न – 

1 – क्या छत्तीसगढ़ की धरती पर संगठन गढ़ने वाले शिल्पी अब पवन के वेग से पश्चिम बंगाल की राजनीति को साध पाएँगे? या यह दायित्व अवसर है या किसी शतरंज की बिसात पर सधा हुआ चाल?

2 – क्या नीट का जादुगर यहाँ भी परदे गिराने में सफल हो गया? या फिर लुका-छुपी की यह बाज़ी केवल समय खरीदने की तरकीब है? सवाल यह नहीं कि कौन दिख रहा है सवाल यह है कि कौन दिखकर भी नहीं दिख रहा।

 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *