अफ़सर-ए-आ’ला (हर रविवार को सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(हर रविवार को सुशांत की कलम से)

दरबार, दरार और दर –
छत्तीसगढ़ में सीमेंट सिर्फ मकान नहीं बनाता, मॉडल भी गढ़ता है। महीने का 10 करोड़ जैसे मौसम की भविष्यवाणी। तय, नियमित, निर्विवाद। फैक्ट्रियाँ धुआँ छोड़ती रहीं, सिस्टम संतोष छोड़ता रहा। फिर किसी दिन हिसाब की कॉपी में एक नई लाइन जुड़ गई +5 करोड़।तर्क यह कि ऊपर से आदेश है। ऊपर कितना ऊपर है, यह पूछना नीचे वालों की आदत नहीं होती। पर जब वही रकम घर की दहलीज़ लांघी, तो सवालों ने जूते उतार दिए। ये हमारा है या उनका? और जो धंधा दीवारें सीधा करता था, उसने पहली टेढ़ी रेखा घर के भीतर खींच दी। उधर मंत्रालय में डिजिटल कवच चमक रहा था। नाम, नंबर, ओटीपी इतनी चौकसी कि फाइल भी शर्मा जाए। और तभी एक दिन दरवाज़ा खुला एक ऐसा नाम, जो वर्दी की खुशबू लिए था। बैच दमदार, पद प्रभावशाली। दरबार सजा, बात चली, और कहते हैं कि बातों का वज़न भी कम नहीं था। पर असली नाटक तब शुरू हुआ जब देय अटक गया। अब वही मेहमान सीढ़ियाँ नाप रहा है और जिनकी मेज़ तक पहुँचा था, वे अब छत की ओर देख रहे हैं। गलियारों में फुसफुसाहट है कि सिस्टम सोया नहीं था, बस आँखें मूँदे था। भट्ठियों की आग और दरबार की चुप्पी दोनों बराबर तप रही हैं। निष्कर्ष सीधा है सीमेंट का काम जोड़ना है,
पर जब जोड़-घटाव भरोसे से बड़ा हो जाए, तो दरार ईट में नहीं, इरादे में पड़ती है।

41% का सपना और 0.10% की सच्चाई –
16वें वित्त आयोग की सिफारिशें लागू होने जा रही हैं। केंद्र और राज्यों के बीच टैक्स बँटवारे का नया फॉर्मूला तय हो चुका है। कुल हिस्सा 41% बरकरार है, लेकिन राज्यों के हिस्से का प्रतिशत बदला है और इसी बदलाव में छत्तीसगढ़ 3.40% से 3.30% पर आ गया है। दिल्ली की मेज पर बैठे लोग प्रतिशत में बात करते हैं। 3.40 से 3.30 बस इतना सा फर्क। पर जमीन पर यह फर्क करोड़ों में बदल जाता है। कहते हैं कुल हिस्सा तो 41% ही है। मतलब थाली वही है, बस रोटी का टुकड़ा थोड़ा पतला हो गया। अब सवाल यह नहीं कि किसने कम किया। सवाल यह है कि छत्तीसगढ़ अपने हिस्से का उपयोग कैसे करता है। जंगल है देश का फेफड़ा। खनिज है देश का खजाना।बिजली है दूसरों के शहर रोशन। फिर भी जब प्रतिशत की रेखा नीचे जाती है, तो 2047 का विकसित पोस्टर थोड़ा फीका दिखता है।अमेरिका को पीछे छोड़ने का नारा आसान है, पर 0.10% की कटौती समझना कठिन। विकास प्रतिशत से नहीं, प्राथमिकता से बनता है। अगर अपने संसाधनों का हिसाब पारदर्शी हो, तो 3.30% भी कम नहीं। पर अगर योजना पोस्टर में हो और जमीन पर न हो, तो 41% भी कम पड़ जाता है। दिल्ली ने फॉर्मूला बदला है। अब देखना यह है रायपुर अपना गणित बदलता है या नहीं।

1984 की तदर्थ… और 2011 की कट-ऑफ –
3 फरवरी 2026 को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने साफ़ कहा कट-ऑफ तारीख नियम है, सुझाव नहीं। योग्यता उसी दिन तक पूरी होनी चाहिए। यह टिप्पणी सिर्फ 2011 की भर्ती पर नहीं, पूरी प्रशासनिक व्यवस्था पर लागू होती है। अब फाइल पलटिए 1984। आरक्षित पद। तदर्थ नियुक्ति। जिसमे स्पष्ट शर्त जैसे ही संबंधित आरक्षित वर्ग का योग्य अभ्यर्थी उपलब्ध होगा, तदर्थ सेवा स्वतः समाप्त मानी जाएगी। नियम कागज़ पर बिल्कुल साफ़ थे। इसी व्यवस्था में हरिओम शर्मा की नियुक्ति हुई। अब सवाल यह है क्या 40 से अधिक वर्षों में एक भी योग्य आरक्षित उम्मीदवार उपलब्ध नहीं हुआ? या शर्त सिर्फ नियुक्ति तक सीमित थी? तदर्थ से नियमितीकरण। फिर पदोन्नति। फिर शीर्ष पदों का अतिरिक्त प्रभार। अगर 2011 में कट-ऑफ निर्णायक है, तो 1984 की शर्तें अप्रासंगिक कैसे हो गईं? अदालत ने कहा सार्वजनिक पद नियमों से भरे जाते हैं। तो क्या तदर्थ व्यवस्था स्थायी सीढ़ी बन सकती है? क्या सेवा समाप्ति की मूल शर्त कभी लागू हुई? क्या नियमितीकरण का स्पष्ट आदेश सार्वजनिक है? और जब एक अधिकारी सार्वजनिक मंचों पर स्वयं को वैचारिक रूप से एक संगठन से जुड़ा बताते हैं, तो यह निजी विचार है या प्रशासनिक शक्ति का संकेत? 2011 की भर्ती ने कट-ऑफ पर सवाल खड़े किए। 1984 की तदर्थ व्यवस्था अब वही सवाल दोहरा रही है। क्योंकि कानून की नजर में अस्थायी हमेशा अस्थायी होता है। और शर्तें समय के साथ खत्म नहीं होतीं, उनका पालन या उल्लंघन दर्ज रहता है। अब जवाब दस्तावेज़ों से आएगा। क्योंकि फाइलें पुरानी हो सकती हैं, नियम नहीं।

आरक्षण की रेखा और प्रभार का शिखर –
सिविल लाइन में बैठे विभाग के शीर्ष तकनीकी पद पर इस समय एक अधिकारी प्रभार में हैं के.के. कटारे। फाइलें 1994 तक ले जाती हैं। लोक सेवा आयोग, मध्यप्रदेश दिनांक 29 मार्च 1994। एक आरक्षित पद का परिणाम रोका गया। मेरिट क्रम बदल सकता है यह उल्लेख दर्ज है। 24 अगस्त 1994 की सूची में 7 नाम प्रकाशित हुए। उस सूची में के.के. कटारे का नाम नहीं था। फिर 31 दिसंबर 1994 का आदेश। नियुक्ति हो जाती है। अब प्रश्न यह है क्या संशोधित मेरिट सूची विधिवत प्रकाशित हुई? क्या रोके गए परिणाम के बाद चयन प्रक्रिया पारदर्शी रही? दूसरा दस्तावेज़ और भी गंभीर सवाल उठाता है। न्यायिक टिप्पणी स्पष्ट कहती है कि दूसरे राज्य का एसटी उम्मीदवार छत्तीसगढ़ में आरक्षण का लाभ नहीं ले सकता। यदि जन्म महाराष्ट्र के भंडारा (तुमसर) में हुआ, तो आरक्षण पात्रता की जांच कैसे हुई? क्या मूल निवास, अधिसूचना और वैधानिक स्थिति का परीक्षण हुआ? तीन दशक की सेवा। पदोन्नतियाँ। और आज विभाग का सर्वोच्च तकनीकी प्रभार। यह नियुक्ति की वैधता पर बड़ा प्रश्न चिन्ह है। जब फाइलों में संशय हो, तो प्रभार भी प्रश्नों में आता है। और जब सत्ता के गलियारों में कुछ संकेतात्मक मुस्कानें दिखाई दें, तो फाइलें और ज़्यादा बोलने लगती हैं। क्योंकि नियम का संरक्षण कानून करता है, व्यक्ति नहीं। अगर चयन वैध है रिकॉर्ड सार्वजनिक हो। अगर विसंगति है स्वतंत्र जांच हो। क्योंकि आरक्षण संवैधानिक अधिकार है, प्रशासनिक सुविधा नहीं।

महतारी वंदन, म्यूज़िक नाइट और कागज़ी हकीकत –
रायपुर में एक ग्लैमरस इवेंट की चर्चा है। पोस्टर चमक रहे हैं, टिकट बिक रहे हैं, सोशल मीडिया गरम है। कुछ संगठन विरोध में हैं, कुछ लोग उत्साह में। पर असली मज़ा तो लोग ले रहे है। कोई कह रहा कि KYC करने आ रही हैं। किसी ने कहा DBT अपडेट कराने। दरअसल महतारी वंदन योजना की लाभार्थी में एक नाम चमक रहा है Sunny Leon का।
अब यह मज़ाक है, फेक एंट्री है, या डेटा एरर यह तकनीकी जांच का विषय हो सकता है। पर सवाल तकनीक से बड़ा है। महिला एवं बाल विकास विभाग जिन योजनाओं से
माताओं और बहनों को सम्मान और आर्थिक सहारा देने की बात करता है, अगर उन्हीं सूचियों में काल्पनिक नाम घुस जाएँ, तो भरोसा कहाँ टिकेगा? रायपुर में इवेंट होना अलग बात है। मनोरंजन पर विवाद होना अलग बात है। पर योजना के पोर्टल पर अजीबोगरीब नाम दिखना? तीसरी और ज्यादा गंभीर बात है। विकास सिर्फ मंच की रोशनी से नहीं होता। वह डेटा की सच्चाई से होता है। अगर महतारी वंदन सच में धरातल पर मज़बूत है, तो उसे सोशल मीडिया के मीम से डरने की ज़रूरत नहीं। पर अगर सिस्टम इतना ढीला है कि कोई भी नाम लाभार्थी बन जाए, तो फिर सवाल उठेंगे ही। आज शहर में म्यूज़िक नाइट की तैयारी है, और गांवों में महिलाएँ अब भी भुगतान की प्रतीक्षा में हैं। ग्लैमर और ग्राउंड रियलिटी के बीच यही दूरी असली व्यंग्य है।

यक्ष प्रश्न
1- क्या सत्ता संगठन से बड़ी हो चुकी है या संगठन अब भी सत्ता की धड़कन तय करता है?

2 – जो विभाग जनसम्पर्क और जन-संपर्क दोनों संभालते हैं,
क्या वे सूचना के सेतु हैं या कभी-कभी संवेदनशील फैसलों में चुप्पी के सहभागी?

3 – जो पार्टी रीति की बात करती है, क्या उसकी नीति भी उसी कसौटी पर खड़ी है?
या सिद्धांत और सुविधा के बीच कोई अदृश्य समझौता है?

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *