अफ़सर-ए-आ’ला (हर रविवार को सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(हर रविवार को सुशांत की कलम से)
मदिरा महोत्सव –
प्रदेश में विकास अब बोतलों में भरकर बेचा जाएगा। फर्क बस इतना है पहले काँच में आता था, अब प्लास्टिक में आएगा ताकि जनता हल्की रहे और कुछ जेबें भारी। कहते हैं एक बड़े दूरदर्शी उद्योगपति हैं। उनकी दृष्टि इतनी पैनी है कि नीति बनने से पहले ही मुनाफा सूँघ लेते हैं। लोग उन्हें खेल से जुड़ा बताते हैं, पर असली खेल वे मैदान में नहीं, फाइलों के बीच खेलते हैं। मंत्रालय में भी एक विभाग है जहाँ शराब से ज्यादा नशा फैसलों का होता है। वहाँ एक माननीय ज़रूर बैठे हैं, पर कलम किसी और के हाथ में चलती है। गलियारों की हवा कहती है यहाँ फैसले स्याही से कम, संभावना से ज़्यादा लिखे जाते हैं। अचानक पर्यावरण छुट्टी पर चला गया। स्वास्थ्य ने भी छुट्टी की अर्जी लगा दी। प्लास्टिक प्रदूषण फाइल से गिरकर नीचे सरक गया। और फैसला निकला अब प्रदेश में शराब प्लास्टिक की बोतलों में बिकेगी। कारण बड़े वैज्ञानिक बताए गए काँच टूटता है। ढुलाई महँगी है। प्लास्टिक आधुनिक है। मतलब धरती बचे न बचे, बोतल सुरक्षित रहनी चाहिए। कभी यही प्रदेश प्लास्टिक कम करने की शपथ लेता था। तब नदियाँ बहस का मुद्दा थीं, जंगल चिंता का विषय थे। अब नदियाँ चुप हैं, जंगल चुप हैं क्योंकि फाइलें बोल रही हैं। एक छोटी सी दिक्कत है प्लास्टिक जमीन में जाता है तो सैकड़ों साल रहता है। फैसले कुर्सी पर आते हैं तो अक्सर पाँच साल भी नहीं टिकते। जनता सोचे आज बोतल प्लास्टिक की है, कल मिट्टी भी वैसी ही हो गई तो? खैर… प्रदेश में अब विकास ढक्कन घुमाकर खुलेगा। जाम जनता लगाएगी। मुनाफा कोई और पिएगा। और इतिहास शायद इतना ही लिखे एक दौर ऐसा भी था जब नीतियाँ काँच से नहीं, प्लास्टिक से बनी थीं।
फाइलें बोलती हैं, चेहरे चुप हैं –
प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक फाइल घूम रही है। मोटी। दस्तावेज़ों से भरी। आरोपों से लदी। पर सबसे भारी उसमें लिखी बातें नहीं उस पर पसरी चुप्पी है। इन दस्तावेज़ों में दावा किया गया है कि कुछ साल पहले लिए गए फैसलों ने शराब कारोबार की दिशा बदल दी। लाइसेंस, सप्लाई, वितरण, ठेके, नीतियाँ सब कुछ कागज़ पर वैध, पर सवाल ये कि फायदा किसे हुआ? शिकायत करने वाले कहते हैं कि यह सिर्फ व्यापार नहीं था, यह नेटवर्क था।
व्यापारियों, बिचौलियों, फाइल संभालने वालों और निर्णय लेने वालों के बीच बना एक ऐसा तंत्र, जहाँ नियम किताब में थे, पर खेल कहीं और लिखा जा रहा था। कुछ नाम आरोपों में तैर रहे हैं। कुछ पद भी। पर आधिकारिक तौर पर न पुष्टि, न खंडन। यहीं से कहानी दिलचस्प होती है। अगर आरोप बेबुनियाद हैं तो खुलकर जांच क्यों नहीं? अगर आरोपों में दम है तो कार्रवाई दिखती क्यों नहीं? जांच की मांग उठती है, फिर धीमी पड़ जाती है। फाइलें आगे बढ़ती हैं, फिर कहीं अटक जाती हैं। बयान आते हैं मामला विचाराधीन है। यह वही वाक्य है जो सच को सबसे लंबा इंतज़ार करवाता है।
राजनीति में आरोप नया नहीं। पर आरोपों पर स्थायी चुप्पी हमेशा कुछ छुपाती ज़रूर है चाहे वो सच्चाई हो, या डर, या समझौता। इस पूरे मामले में सबसे अहम किरदार जनता है जिसे न फाइल दिखती है, न जांच की दिशा। उसे बस असर दिखता है महँगी शराब, बदली नीतियाँ, और हर दौर में वही चेहरे सुरक्षित। सवाल सीधा है, पर जवाब गोल क्या सच कागज़ में है? या कागज़ ही सच को ढकने के लिए है? फाइलें बोल रही हैं। चेहरे चुप हैं। और लोकतंत्र इंतज़ार कर रहा है किसी एक आधिकारिक वाक्य का, जो धुंध साफ करे। तब तक सवाल ही सबसे बड़ा सबूत हैं।
सूखा नशा
प्रदेश में इन दिनों एक अजीब तरह का नशा चल रहा है। बोतल वाला नहीं सूखा वाला। फर्क बस इतना है जनता गिलास से पीती है, सत्ता कश लगाती है। इस सूखे नशे की खासियत है आदमी को लगता है सब ठीक है। भले कुछ भी ठीक न हो। फाइलें टेबल पर पड़ी रहती हैं, पर निर्णय हवा में उड़ते हैं। जैसे धुएँ के छल्ले दिखते हैं, पकड़े नहीं जाते। मीटिंग होती है, नोट्स बनते हैं, पर ज़मीन पर कुछ नहीं उगता। सूखे नशे में खेत नहीं दिखते, सिर्फ कल्पनाएँ दिखती हैं। जनता राशन, सड़क, पानी, दाम की बात करती है। सत्ता माहौल, विज़न, नैरेटिव की। क्योंकि सूखे नशे में असली आवाज़ दूर से आती है जैसे किसी और दुनिया की हो। कहा जाता है राजधानी के कुछ कमरों में शाम ढलते ही विचार-विमर्श शुरू होता है। वहाँ एजेंडा कम, एहसास ज़्यादा होता है। फैसले कागज़ पर नहीं, माहौल में लिखे जाते हैं। सूखा नशा यही करता है जिम्मेदारी हल्की लगने लगती है, और आत्मविश्वास भारी। आदमी को लगता है वह बहुत ऊँचा सोच रहा है, जबकि नीचे की जमीन ही गायब हो चुकी होती है। जनता अगर नशे में मिले तो चालान कटता है। सत्ता अगर नशे में हो तो उसे रणनीति कहा जाता है। पर असर दोनों का एक जैसा है एक घर बर्बाद करता है, दूसरा भरोसा। इतिहास गवाह है धुआँ चाहे जितना भी घना हो, हवा एक दिन साफ होती ही है। सूखा नशा भी उतरता है। तब आँखें खुलती हैं। कमरे साफ दिखते हैं। फाइलें भारी लगती हैं। और वही सवाल सामने खड़े होते हैं जिन्हें कभी विपक्ष का भ्रम कहकर उड़ा दिया गया था।तब तक…
जनता कतार में रहेगी, सत्ता खुमार में। एक बोतल में डूबी, दूसरी धुएँ में। और प्रदेश पूछता रहेगा नशा किसे ज्यादा चढ़ा है?
छाया साम्राज्य –
प्रदेश में कुछ फैसले वोट से होते हैं, और कुछ चुपचाप बंद कमरों में। बाहर राजनीति दिखती है, अंदर कारोबार चलता है। कहानी एक छोटे कस्बे से शुरू होती है, जहाँ कभी छोटी दुकानें थीं और अब वैश्विक कारोबार के किस्से हैं। कल तक जिनके पास गिनने लायक नोट नहीं थे, आज उनके पास विदेशों में ज़मीन, महँगी गाड़ियाँ और डिजिटल दुनिया में चलते रहस्यमयी खेल हैं। लोग इसे किस्मत कहते हैं, समझदार लोग नेटवर्क। इस पूरे खेल का एक अनदेखा ढाँचा है ऊपर उद्योग की बड़ी छाया, नीचे सट्टा, हवाला, नकली खातों और घूमते पैसों की परतें। धर्म भी साझेदार है एक कथा-वाचक है जिसकी कथा से ज़्यादा चर्चा चढ़ावे की दिशा पर होती है। समुद्र किनारे चमकती रोशनी वाले शहरों में पैसा रंग बदलता है। जंगल के रास्तों से ट्रक गुजरते हैं कागज़ पर कुछ और, असल में कुछ और। कागज़ी कंपनियाँ, असली धंधे। इन सबसे ताकतवर चीज़ क्या है? चुप्पी। ना सवाल, ना सफाई। ना आरोप साबित, ना अफवाह खत्म। चेहरे बदलते हैं, संपत्तियाँ बढ़ती हैं, और प्यादे ही पकड़े जाते हैं। जनता समझती है राजनीति चल रही है। असल में, हिसाब-किताब कहीं और लिखा जा रहा होता है। और इतिहास शायद यही लिखेगा सत्ता मंच पर थी, असली खेल पर्दे के पीछे।
वर्दी और दो तराज़ू
कभी वर्दी भरोसे की पहचान थी। अब खबरें देखिए तो लगता है वर्दी एक संस्था कम, विवादों का स्थायी पता ज़्यादा बनती जा रही है। पुलिस महकमे में अजीब गणित चलता है। एक मामला आता है तुरंत जांच, बयान, निलंबन। दूसरा आता है फाइल घूमती रहती है, धूल जमा होती है, और अंत में मामला विचाराधीन रह जाता है। जनता कहती है कानून सबके लिए बराबर है। सिस्टम धीरे से जोड़ता है सिद्धांत में। कई मामलों में गंभीर आरोपों के बाद भी कार्रवाई का इंतज़ार लंबा हो जाता है। कहीं जांच एजेंसियों की मोटी-मोटी रिपोर्टें सार्वजनिक हो जाती हैं, पर नतीजा अब भी रास्ते में होता है। और कभी मामूली चीज़ पर पूरा तंत्र अचानक चौकन्ना हो जाता है। समस्या आरोपों से कम, चयनात्मक सक्रियता से ज़्यादा दिखती है। अंदर की दुनिया का एक अनकहा नियम भी बताया जाता है सिस्टम अपने लोगों को पहचानता है। कोई बैच का, कोई भरोसे का, कोई किसी पुराने दौर की पहचान। नतीजा? जवाबदेही कागज़ पर रहती है, संरक्षण व्यवहार में। सबसे बड़ा नुकसान उन ईमानदार अफसरों का होता है जो सच में काम कर रहे हैं। क्योंकि जनता जब सवाल उठाती है तो दाग अलग-अलग नहीं देखती वर्दी ही देखती है। सरकार की दुविधा भी साफ है कार्रवाई करो तो मानो समस्या है। ना करो तो लगे संरक्षण है। सच यही है पुलिस की साख गोलियों से कम, चुप्पियों से ज़्यादा घायल होती है। जनता बस इतना चाहती है नाम बड़ा हो या छोटा, कुर्सी ऊँची हो या नीची, तराज़ू एक ही हो। वरना वर्दी चमकती रहेगी, और भरोसा फीका पड़ता रहेगा।
धान का रहस्यलोक –
राज्य में इस समय धान नहीं, कहानी उग रही है। मंच पर घोषणा रिकॉर्ड खरीदी! रिकॉर्ड भुगतान! रिकॉर्ड व्यवस्था! मगर ज़मीन पर दृश्य रिकॉर्ड लाइन , रिकॉर्ड इंतज़ार , रिकॉर्ड कन्फ्यूजन सरकारी कागज़ कहता है धान का पहाड़ खड़ा है , गोदाम भरे हैं , सिस्टम चुस्त है गोदाम की दीवार कहती है भाई, गूंज तो सुन लो… अंदर कुछ है क्या? कहीं गोदाम खाली दिखे तो जवाब आता है स्टॉक दूसरे गोदाम में है दूसरे गोदाम जाओ तो उठाव नहीं हुआ। उठाव कहाँ है? रास्ते में। कब से? हमेशा से। अब रास्ते में धान का स्थायी पता बन चुका है। फिर खबर आती है कहीं बोरी कम , कहीं हिसाब गड़बड़ , कहीं मिल सील , कहीं बाबू निलंबित और जब हिसाब बिल्कुल नहीं मिलता तुरंत प्रकृति को जिम्मेदारी मिलती है। चूहों ने खा लिया चूहा बिरादरी स्तब्ध है। इतना धान खा लेते तो अब तक उनका खुद का राशन कार्ड बन जाता। किसान सोच रहा है धान मैंने उगाया , सरकार ने खरीदा , गोदाम ने रखा नहीं चूहा खा गया तो मेरे खेत से निकला अनाज आखिर गया किस लोक में? जनता पूछती है राशन में चावल कम क्यों? जवाब आता है व्यवस्था दुरुस्त की जा रही है यानी धान मौजूद है। बस मिल नहीं रहा जैसे सरकारी दफ्तर में फाइल मिलती है होती पूरी है, दिखती कभी नहीं। अंत में सच्चाई यह है धान आंकड़ों में सुरक्षित है , भाषणों में समृद्ध है , फाइलों में व्यवस्थित है। बस थाली तक आने के रास्ते में कहीं उठाव देवता, कहीं गोदाम दर्शन , और कहीं चूहा विभाग बैठा है। और जनता अब भी वही पूछ रही है धान सबका है पर चावल आखिर मिलेगा कब?”
यक्ष प्रश्न –
1 – कल्पना में कितना यात्रार्थ और दीपक में कितनी ज्योति है ?
2 – प्रशासन में ऐसा क्या जादू चला कि आईपीएस पद्दोनती आदेश जारी करना पड़ा जबकिं तीन बैठके बेनतीजा थी ?
3 – बिलासपुर संभाग के जीपीएम जिले के बिगड़ती कानून व्यवस्था पर राम के गोपाल जी का क्या रुख रहेगा ?










