अफ़सर-ए-आ’ला (हर रविवार को सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(हर रविवार को सुशांत की कलम से)

पत्रकार पर हमला : – माफियाराज
परसों, 8 जनवरी 2026 की शाम जो हुआ, वो कोई सामान्य विवाद नहीं था यह रिपोर्टिंग रोकने की कोशिश थी। मैं ग्राउंड रिपोर्टिंग करके लौट रहा था, तभी जीपीएम जिले के धनौली गांव के पास अचानक मेरी गाड़ी को घेर लिया गया। आगे कार, साइड में हाइवा, पीछे से फोरव्हीलर जैसे किसी ने सड़क नहीं, कानून बंद कर दिया हो। फिर धमकी, गाली-गलौज और दबाव “दरवाज़ा खोल, उतर बाहर!” हम गाड़ी के अंदर थे, कैमरा ऑन था, और हम लगातार बोल रहे थे “ऐसा मत करो…” इसी दौरान लोहे की रॉड/डंडे से ड्राइवर साइड के काँच पर जोरदार वार किया गया और काँच टूट गया। काँच के टुकड़े चेहरे तक आए, लेकिन दिमाग ने काम किया उकसावे में उतरना नहीं था। यह हमला व्यक्ति पर नहीं था, यह हमला खबर पर था। क्योंकि पहाड़-जंगल के भीतर जो सच छुपा है, उसे उजागर करना कुछ लोगों को मंजूर नहीं। इस पूरे प्रकरण में एक बात महत्वपूर्ण रही गौरेला पुलिस की त्वरित कार्रवाई। शिकायत मिलते ही FIR दर्ज हुई, मेडिकल परीक्षण, पंचनामा, स्पॉट निरीक्षण और सबूत जप्ती जैसी कार्रवाई तेजी से की गई। संदेश साफ गया कि माफियाओं के हौसले अब सिस्टम के सामने नहीं चलेंगे, इसलिए जो लोग सड़क पर कानून बंद करने उतरे थे, वे अब बैकफुट पर हैं। लेकिन माफियाराज यूँ ही हार मानने वाला नहीं होता। अब समझौते का दबाव, धमकियाँ और यह संकेत भी मिल रहे हैं कि दबाव बनाने के लिए अन्य क्षेत्र/थानों में झूठी शिकायतें कराई जा सकती हैं, ताकि सच बोलने वाला डरकर पीछे हट जाए। मुकेश चंद्राकर की घटना ने देश को दिखा दिया था कि सच बोलने वालों के साथ क्या हो सकता है इसलिए यह मामला हल्के में नहीं लिया जा सकता। अगर माफियाराज बच गया, तो कल किसी और रिपोर्टर की गाड़ी नहीं जिंदगी तोड़ी जाएगी। पूरी स्टोरी, वीडियो सबूत और दस्तावेज़ों के साथ जल्द सामने रखी जाएगी।

तीन ASP देहात –
पुलिस महकमे की तबादला सूची ने फिर हलचल मचा दी, मगर सबसे दिलचस्प मामला बिलासपुर का निकला। यहां ग्रामीण एएसपी की पोस्टिंग ऐसी उलझी कि अब एक ही पद पर तीन अफसर खड़े दिख रहे हैं। सूची में मधुलिका सिंह को ग्रामीण एएसपी बना दिया गया है, लेकिन उसी पद पर पहले से अर्चना झा पदस्थ हैं और उनका तबादला आदेश कहीं दिखता नहीं। ऊपर से अनुज कुमार भी जिले में मौजूद हैं, जिनका “मूल पद” रिकॉर्ड में ग्रामीण एएसपी ही दर्ज है। मतलब देहात अब अपराध से नहीं, एएसपी की भीड़ से चर्चित हो गया है। यह पहली बार नहीं है। पहले भी अर्चना झा को ग्रामीण एएसपी से हटाकर अनुज कुमार को लाया गया था, मगर बाद में आदेश रुक गया और कुर्सी वहीं टिक गई। अनुज कुमार को समायोजित करके एसीसीयू नोडल और कुछ थानों का सुपरविजन दे दिया गया यानी पद नहीं मिला, काम बांटकर शांति करा दी गई। अर्चना झा पिछले दो साल से बिलासपुर में एडिशनल एसपी रह चुकी हैं। इससे पहले उनका तबादला जगदलपुर हुआ था, मगर आदेश जगदलपुर पहुंचने से पहले ही रुक गया। हालात यह है कि सुदूर इलाकों में पुलिस की कमी है, लेकिन शहरी जिले छोड़ने की इच्छा किसी की नही क्योंकि शहर की पोस्टिंग में ड्यूटी के साथ कम्फर्ट और कनेक्शन भी आते हैं। SSP साहब कह रहे हैं, “देहात बड़ा है, सुपरविजन बांट देंगे।” बात ठीक है, पर जनता पूछ रही है कि देहात बड़ा है… या कुर्सी की मोहब्बत?

परिवर्तन की सुगबुगाहट –
खरमास का मौसम है… और खरमास में बड़े फैसले भले न हों, पर फाइलों के भीतर सबसे बड़ी हलचल यही होती है। संकेत हैं खरमास खत्म होते-होते सचिवालय से लेकर जिले तक बड़ा फेरबदल तय है। जो सचिव/सेक्रेटरी दो-दो साल से एक ही कुर्सी पर टिके हैं, उनकी कुर्सी अब “स्थायी” नहीं रहेगी। पुलिस में भी सूची वेटिंग में है खरमास के बाद कप्तानों की कुर्सी भी सरक सकती है। लेकिन असली बेचैनी कलेक्टरों को लेकर है। कई जिले ऐसे हैं जहां प्रशासन “काम” कम, “वाहवाही” ज्यादा कर रहा है और इसी वजह से सरकार की छवि को नुकसान हो रहा है। खास चर्चा उन अफसरों की है जो 2003 पीएससी बैच के हैं, जिन्हें पहली बार जिला मिला। उम्मीद थी कि सिस्टम की रीढ़ बनेंगे, पर कई जगह वे इवेंट मैनेजमेंट और “फर्जी उपलब्धि” की चमक में उलझ गए। जनता की जमीन पर दिक्कतें जस की तस, और ऊपर से चमचमाते प्रेस नोट यही तो वह मॉडल है जो सरकार को बदनाम करता है। और इस बैच की कहानी तो और भी “दिलचस्प” है। CGPSC 2003 को लेकर वर्षों से अदालतों में विवाद/याचिकाएं चलीं, चयन प्रक्रिया में अनियमितताओं के आरोप लगे, और यह मामला लंबे समय तक न्यायिक बहस का विषय रहा। पर सिस्टम का कमाल देखिए विवाद चल रहा था, फाइलें चल रही थीं… और इधर कुछ चेहरे प्रमोट होकर IAS (2016 प्रमोशन बैच) तक पहुंच गए, कलेक्टर भी बन गए! अब सरकार के पास एक ही रास्ता बचता है परफॉर्मेंस के आधार पर छंटनी। खबर है कि अगली सूची में यही 2003 बैच के कई अफसरों को दोबारा जिला मिलना मुश्किल है। मतलब साफ है पहली बार जिला मिला था, अब अगर “जिला चलाने” की बजाय “वाहवाही चलाते” रहे, तो अगला जिला सपना ही रहेगा। खरमास के बाद जो सूची आएगी, वह सामान्य तबादला नहीं होगी वह कई कुर्सियों के लिए रीसेट बटन होगी। क्योंकि अब जनता को पोस्टर नहीं चाहिए… परिणाम चाहिए।

मशीन खराब, कुपोषण चालू –
कागजों में पोषण योजना दौड़ रही है, लेकिन जमीन पर उसका वजन ही नहीं तौला जा रहा। वजह आंगनबाड़ी केंद्रों में वजन मापने वाली मशीनें खराब पड़ी हैं। अब सवाल यह नहीं कि मशीनें कब सुधरेंगी, सवाल यह है कि जब माप ही नहीं होगा तो कुपोषण की पहचान कैसे होगी? कुपोषण कोई नारा नहीं, एक आँकड़ा हैऔर आँकड़ा बिना वजन के नहीं बनता। जिन केंद्रों में गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं और बच्चों को पोषण की निगरानी में रहना चाहिए, वहीं “रिकॉर्ड” चल रहा है, “रूटीन” चल रहा है, लेकिन मशीन नहीं चल रही। यह समस्या केवल मशीन की नहीं यह पूरे सिस्टम की मानसिकता की है। क्योंकि अगर मशीनें महीनों से खराब हैं, तो इसका मतलब यह है कि न निगरानी है, न जवाबदेही। और यही सबसे खतरनाक है जब स्वास्थ्य योजनाएँ “रजिस्टर में जिंदा” और “जमीनी स्तर पर बीमार” हो जाएँ। सरकार कुपोषण मुक्त छत्तीसगढ़ के पोस्टर लगवा रही है, लेकिन केंद्रों में वजन तौलना ही संभव नहीं। ऐसे में सवाल उठता है कुपोषण घट रहा है या सिर्फ “डेटा” बढ़ाया जा रहा है? यह लापरवाही नहीं, बच्चों के भविष्य के साथ सीधा खिलवाड़ है। क्योंकि कुपोषण की लड़ाई का पहला हथियार ही वजन है और वही हथियार सिस्टम ने तोड़कर रख दिया है। जांच होना चाहिए मशीनें कब से खराब हैं, किसने रिपोर्ट नहीं किया, किसने सुधरवाया नहीं, और कितने बच्चों/महिलाओं का ट्रैकिंग डेटा फर्जी तरीके से भरा गया।।क्योंकि जब मशीन नहीं, तब “मॉनिटरिंग” नहीं और जब मॉनिटरिंग नहीं, तब कुपोषण की सच्चाई भी नहीं।

टेंडर जम्बूरी
राजिम कुंभ तो 1 फरवरी से है, लेकिन “कुंभ स्नान” टेंडर का जनवरी में ही करा दिया गया। 05 जनवरी को टेंडर छपा, 08 को प्री-बिड, 09 को जमा, और 10 को PPT भी,फिजिकल भी, और शाम 5:10 बजे खोलकर परिणाम की तैयारी भी! यानी कुंभ में श्रद्धालु बाद में आएंगे, ठेका पहले उतर जाएगा। करीब 6 करोड़ के काम को ऐसे दौड़ाया जा रहा है जैसे कोई आपदा आ गई हो या जैसे “शुभ मुहूर्त” निकल रहा हो। इतने शॉर्ट नोटिस में सामान्य ठेकेदार तो फाइल ही नहीं बना पाएगा, लेकिन “खास लोगों” के लिए यह नोटिस नहीं, न्योता होता है आ जाइए, सब तैयार है! सवाल यह नहीं कि कुंभ जरूरी है या नहीं, सवाल यह है कि टेंडरिंग में इतनी आपातकालीन गति क्यों? क्या राजिम कुंभ का अप्रूवल दिल्ली से लटक गया था? या फैसला पहले ही हो चुका है और अब बस कागज़ दौड़ रहे हैं? क्योंकि जहाँ पारदर्शिता होती है वहाँ समय दिया जाता है, और जहाँ “सेटिंग” होती है वहाँ स्पीड दिखाई जाती है।

फर्नीचर का पैड –
छत्तीसगढ़ में इन दिनों “सुचिता योजना” चर्चा में है। योजना अच्छी है छात्राओं को सैनेटरी पैड मिले, स्वास्थ्य-सफाई का ध्यान रहे… सरकार का इरादा सही है। लेकिन दिक्कत इरादे में नहीं… दिक्कत जुगाड़ में है। कहानी सीधी है सरकार को 35 लाख सैनेटरी पैड सप्लाई कराने थे। दर तय हुई ₹3.25 प्रति पैड। खर्च बैठा करीब ₹1.13 करोड़। इतनी बड़ी खरीदी… और वो भी लड़कियों के स्वास्थ्य से जुड़ी… मतलब नाजुक मामला। लेकिन खरीदी किससे हुई? किसी मेडिकल सप्लायर से? किसी सैनेटरी पैड निर्माता से? किसी फार्मा/हाइजीन कंपनी से? नहीं साहब। यह काम दे दिया गया… फर्नीचर बनाने वाली फर्म को। अब अफसरशाही का गणित समझिए अगर कुर्सी मजबूत हो तो पैड भी बना लेगी। और अगर फाइल मजबूत हो तो नियम भी मुड़ जाएंगे। हैरानी की बात ये नहीं कि फर्नीचर वालों को पैड का काम मिला, हैरानी की बात ये है कि इस काम में GeM पोर्टल का “धर्म” निभाने के बजाय ऑफलाइन आदेश की “आरती” उतारी गई। जब नियम कहते हैं GeM से खरीदो… तो खरीदो। लेकिन हमारे यहां “नियम” नहीं चलते साहब…यहां व्यवस्था चलती है और व्यवस्था में कोई भी “सप्लायर” बन सकता है। विभाग कहता है पहले टेंडर हुआ था, एल-1 कंपनी ने काम नहीं किया। ठीक है। लेकिन फिर सवाल उठता है तो नया टेंडर क्यों नहीं निकला? और अगर ऑफलाइन ही करना था तो वित्तीय मंजूरी और प्रक्रिया की पूरी पारदर्शिता कहाँ है? कुल मिलाकर, योजना “सुचिता” है लेकिन प्रक्रिया में “पवित्रता” कम है। और सच तो यह है कि अगर सरकारी विभागों से संबंध बढ़िया हों, तो आप टेबल-कुर्सी भी बनाइए… और कल सैनेटरी पैड भी सप्लाई कर दीजिए। बस फाइल पर मुहर लगनी चाहिए बाकी पैड में विंग्स हों या नियमों को विंग्स लग जाएँ… फर्क किसे पड़ता है?

15 सौ करोड़ का सच –
कहानी 2018 से शुरू होती है जब लंबे शासन की थकान और इंकम्बेंसी साफ दिख रही थी। बदलाव आया, नई सरकार बनी और विपक्ष भीतर से खुद को समेटने में लगा रहा। 2021 के आसपास मंचों पर भाषण कम थे, लेकिन संगठन के भीतर एक अलग ही काम चल रहा था बूथ, मंडल, जिला… चुपचाप सर्जरी। इसी दौर में एक नाम बैठकों में उदाहरण बनकर उभरा समीर साय। चेहरा कम दिखा, मगर संगठन की नसों में उसकी शैली महसूस होने लगी। फिर 2023 आया 54 सीटें। और संगठन के भीतर यह बात लगभग तय हो गई कि यह जीत सरकार की नहीं, संगठन की जीत है। यहीं से सत्ता और संगठन के बीच लय टूटने लगी एक तरफ अनुशासन, दूसरी तरफ सत्ता-सुविधा। इसी बीच दिल्ली से आए कुछ अफसर सत्ता के केंद्र में स्थिर हो गए फाइलों से फैसले, नेटवर्क से नियंत्रण। साथ ही सत्ता के भीतर “स्लीपर सेल” जैसी जमात भी सक्रिय दिखने लगी न संगठन की देन, न जनता का श्रम, बस मलाई की रणनीति। जब संगठन का अनुशासन सत्ता के आराम में बाधा बनने लगा, तो टकराव सीधे नहीं हुआ नैरेटिव के जरिए हुआ। पहले फुसफुसाहटें, फिर जीवनशैली पर तीर। और अचानक एक वीडियो सामने आता है और आरोप उसी पर टिकाया जाता है, जिसका नाम संगठन में मिसाल बन चुका था। संयोग ये कि ऐसी क्लिपें देश के दूसरे हिस्सों में अलग संदर्भों में पहले भी आ चुकी हैं तरीका नया नहीं, बस संदर्भ बदला गया। सवाल अब “किसने किया” का नहीं, “क्यों हुआ” का है। क्योंकि जब सीधी लड़ाई मुश्किल हो, तब छवि पर हमला होता है। और शायद इसी वजह से यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई जारी है।

यक्ष प्रश्न 
1 . क्या जंगल का राजा अब कुर्सी छोड़ने वाला है? या फिर जंगल की फाइलें उसे छोड़ने पर मजबूर कर देंगी?

2 . छत्तीसगढ़ में ऐसा क्या हो गया कि मंत्रियों के निजी स्टाफ की कुर्सियां रोज़ सरक रही हैं?
किसी “सुधार” का संकेत है…
या किसी “तूफान” की तैयारी?

 

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