कही अनकही बातें – बिहार में बहार… या छत्तीसगढ़ में ‘बिहार’ का विस्तार? अंदरखाने की कहानी, हवा के रुख और बगुले की बिसात

कही अनकही बातें –
बिहार में बहार… या छत्तीसगढ़ में ‘बिहार’ का विस्तार? अंदरखाने की कहानी, हवा के रुख और बगुले की बिसात –

रायपुर : – राजधानी की फाइलों के बीच इन दिनों एक दिलचस्प किस्सा तैर रहा है। कहानी एक कुर्सी की है, लेकिन चालें शतरंज से भी महीन हैं। ऊपर से सब शांत दिखता है, मगर भीतर कहीं एक बगुला आँख गड़ाए बैठा है और पानी में हल्की-सी हलचल होते ही चोंच मारने को तैयार है।

इस कहानी के केंद्र में हैं एक सीनियर डीजी साहब जिनकी जड़ें बिहार की मिट्टी से जुड़ी हैं और नजरें इंटेलिजेंस की कुर्सी पर टिकी बताई जा रही हैं। कहते हैं, कुछ चुनिंदा ‘अपनों’ की टोली भी चाहती है कि यह जिम्मेदारी उन्हीं के पाले में आए। लेकिन रास्ता सीधा नहीं है इसलिए बिसात बिछी है। इस बिसात का सबसे दिलचस्प किरदार है ‘बगुला’ जो ऊपर से तपस्वी, भीतर से रणनीतिकार बताया जाता है। उसके साथ एक जांच एजेंसी से जुड़े साहेब भी हैं, जो अपने-अपने मोहरे सधे अंदाज़ में चला रहे हैं।

विडंबना देखिए एक सीनियर आईपीएस, जो कभी आदेश देते थे, आजकल अपने ही कनिष्ठ की दरबारी में नजर आते हैं। सत्ता का ये ‘रिवर्स गियर’ भी कम दिलचस्प नहीं है। बीच में अचानक एक हवा उठती है “इंटेलिजेंस वाले साहेब डेपुटेशन पर जा रहे हैं…” हल्ला ऐसा कि जैसे कुर्सी खाली होने ही वाली हो। मगर अंदरखाने की खबर कुछ और कहती है बताया जाता है कि मौजूदा साहेब अपनी ईमानदारी और सख्ती के लिए जाने जाते हैं, और यही बात कई लोगों की रणनीति में ‘अड़चन’ बन गई है।

कहते हैं, इस हवा को बनाने के लिए दूर-दराज के कलमकारों तक भी ‘पाँच पेटी’ की बारिश की गई, ताकि खबर पेड़ की तरह फैल जाए। मगर कहानी यहाँ पलट गई जो खबर उड़ाई गई थी, वही सवाल बनकर लौट आई। अब आईपीएस लॉबी के भीतर खींचतान खुलकर सामने आने लगी है। एक खास बैच चाहता है कि सिस्टम उनके हिसाब से चले भले राज्य का संतुलन डगमगाए, मगर दरबार की रौनक कम नहीं होनी चाहिए।

इस पूरे खेल में ‘पवन’ नाम का एक किरदार भी है जो हर बार हवा की तरह आगे बढ़ता है, लेकिन हर बार कोई न कोई झोंका उसे थोड़ा डगमगा देता है। और यही झोंके शायद बगुले की बनाई हवा का हिस्सा हैं। दिलचस्प यह है कि ‘हाउस’ अब भी इस पूरी बिसात से अनजान है या शायद अनजान बने रहने में ही सबकी सुविधा है। और सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि इस पूरी कवायद का असली मकसद कहीं और छिपा है। खेल सिर्फ कुर्सी का नहीं, बल्कि जानकारी के रास्तों को मोड़ने का है ताकि ऊपर तक वही पहुंचे जो दिखाना है, और जो सच है, वह फाइलों में ही दबा रह जाए।

यानि पूरी कोशिश यही है कि मुखिया तक पहुँचने वाली असली तस्वीर धुंधली कर दी जाए। कहानी यहीं और गहरी हो जाती है क्योंकि जब फैसले लेने वाला ही अधूरी जानकारी पर निर्भर हो जाए, तो पूरा सिस्टम धीरे-धीरे किसी और की बिसात पर चलने लगता है। और यही इस खेल की सबसे खामोश, लेकिन सबसे खतरनाक चाल है।

तो सवाल वही बिहार में बहार है… या छत्तीसगढ़ में ‘बिहार’ का विस्तार? क्योंकि कहानी अब कुर्सी की नहीं, बल्कि सच और सूचना की जंग बन चुकी है…और बगुला अब भी पानी में खड़ा है।

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