वर्दी के अंदर ‘सिस्टम’! व्हाट्सएप चैट में खुला सत्ता का असली खेल?

वर्दी के अंदर ‘सिस्टम’! व्हाट्सएप चैट में खुला सत्ता का असली खेल?
रायपुर : – राजधानी के गलियारों में इन दिनों एक खामोश हलचल है… फाइलें वही हैं, कुर्सियाँ वही हैं, लेकिन फैसलों की दिशा कहीं और से तय हो रही है। छत्तीसगढ़ की नौकरशाही और कानून व्यवस्था को लेकर सामने आया एक वायरल व्हाट्सएप चैट अब सिर्फ चर्चा नहीं, बल्कि सत्ता के अंदर चल रहे “अदृश्य नियंत्रण” की कहानी बन चुका है।

एक चैट… और खुलता पूरा सिस्टम –
इस वायरल चैट में एक सीनियर आईपीएस रतन लाल डाँगी सीधे-सीधे यह दावा करते दिखाई देते हैं कि प्रदेश की कानून व्यवस्था की असल कमान 2005 बैच के आईपीएस राहुल भगत के हाथों में है। ट्रांसफर हो… पोस्टिंग हो… या कोई भी बड़ा फैसला हर फाइल पहले एक ही दरवाजे से गुजरती है…और वही दरवाजा है “भगत साहेब का दफ्तर” है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि फाइलें “ऊपर” जाने से पहले ही इसी दफ्तर से अप्रूव हो जाती हैं, और ऊपर बैठे लोग महज हामी भरने तक सीमित रह जाते हैं।
इसी चैट का सबसे तीखा वाक्य है
“सीएम नहीं… राहुल भगत ही सब कर रहे हैं… और सीएम का नाम लेकर चुपचाप अपना काम निकाल रहे हैं।
यह लाइन सिर्फ एक आरोप नहीं… बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल है।
डीजीपी प्रभारी… पर असली कंट्रोल कहीं और? –
पिछले एक साल से प्रदेश में डीजीपी ‘प्रभारी’ व्यवस्था में हैं लेकिन सूत्रों की मानें तो तस्वीर कुछ और है। कहा जा रहा है कि जो काम तत्कालीन सरकार में एक एडिशनल एसपी करता था, वही अब एक वरिष्ठ आईपीएस के इर्द-गिर्द सिमट गया है। यहां तक कि चर्चाएं यह भी है कि डीजीपी साहेब को भी अगर कोई फैसला करवाना हो, तो उन्हें भी उसी दरवाजे, भगत साहेब के दफ्तर पर दस्तक देनी पड़ती है। पीएचक्यू में बिना “संकेत” के एक पत्ता तक नहीं हिलता। ऐसे में सवाल उठता है क्या डीजीपी सिर्फ चेहरा हैं और डोर कहीं और से हिल रही है?
“इंटेलिजेंस” की कुर्सी और अंदर की चाल –
सूत्र बताते हैं कि इन दिनों एक डीजी रैंक के अधिकारी को इंटेलिजेंस की कुर्सी दिलाने की कवायद भी भगत दफ्तर नेटवर्क के जरिए चल रही है। यानी खेल सिर्फ ट्रांसफर तक सीमित नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की रीढ़ तक पहुँच चुका है। इसी खेल में एक “शेख साहब” भी है जो दिखते नहीं लेकिन चलते हैं। चैट और चर्चाओं के मुताबिक राहुल भगत के ऊपर भी एक “सलाहकार शक्ति” मौजूद है, और बड़े फैसलों में उनकी भूमिका अहम बताई जा रही है।
दिलचस्प यह कि कहा जा रहा है कि वो छुट्टी पर “पढ़ाई” कर रहे हैं, लेकिन सिस्टम की नब्ज वहीं से चल रही है। यानी सरकार बदली, चेहरे बदले पर तंत्र वही पुराना ही चल रहा है।
अमित शाह का नाम और सवालों का नया मोड़ –
इस पूरे मामले में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है व्हाट्सएप चैट में अमित शाह का नाम भी घसीटा जा रहा है। कहा जा रहा है कि अगर कोई काम करना होता है तो सीधे कर लिया जाता है और अगर नहीं करना हो… तो कहा जाता है कि “अमित शाह से अप्रूवल लेना पड़ेगा” यानी एक तरह से बड़े नाम का इस्तेमाल फैसलों को रोकने या टालने के औजार के रूप में किया जा रहा है। सबसे बड़ा सवाल यही है। आखिर प्रदेश के कितने लोग सीधे अमित शाह तक पहुंच रखते हैं? या फिर क्या यह सिर्फ एक “नाम का इस्तेमाल” है, जबकि पूरी कहानी और फैसले अंदरखाने किसी और के द्वारा लिखे जा रहे हैं?
गृह मंत्री बनाम अंदर का नेटवर्क?
एक तरफ गृह मंत्री विजय शर्मा नक्सल मोर्चे पर लगातार सक्रिय हैं आत्मसमर्पण, ऑपरेशन और तय डेडलाइन पर काम लगे है लेकिन दूसरी तरफ विभाग के अंदर से ही उन्हें कमजोर दिखाने की कोशिश की जा रही है ट्रांसफर-पोस्टिंग का ठीकरा उनके सिर पर फोड़ा जा रहा है यानी मैदान में एक लड़ाई और फाइलों में दूसरी चल रही है।
पुराने एहसान… नई वफादारी?
सूत्र यह भी दावा करते हैं कि राहुल भगत को पिछली सरकार में विशेष पद सृजित कर IG बनाया गया था और उस फैसले के पीछे भी इसी “ऊपर के प्रभाव” शेख साहेब की चर्चा रही है। अब सवाल उठता है क्या वही पुराने समीकरण आज भी सिस्टम चला रहे हैं?
अब पूरा मामला एक ही बिंदु पर आकर टिकता है क्या प्रदेश में समानांतर सत्ता चल रही है? क्या फाइलों से ज्यादा ताकत फोन कॉल और नाम में है? क्या सरकार का चेहरा कोई और है और फैसले लेने वाला कोई और? यह वायरल चैट कई गंभीर सवाल उठाती है, लेकिन इसकी स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।
फिर भी अगर इन दावों में जरा भी सच्चाई है, तो यह सिर्फ एक अफसर की कहानी नहीं बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे की पारदर्शिता और नियंत्रण पर बड़ा सवाल है।
हमारे पास ऐसे कई और चैट हैं जिनकी परत-दर-परत खुलासा अगली कड़ी में किया जाएगा और बताया जाएगा कि कैसे एक “शेख साहब” पर्दे के पीछे से पूरा खेल चला रहे हैं।
(Disclaimer): यह रिपोर्ट वायरल चैट और सूत्रों पर आधारित है। आधिकारिक पुष्टि या खंडन का इंतजार है।










