फाइल चली मगर मंज़िल नहीं मिली जिस पर सवाल, अनुमति भी उसी से – नौकरशाही का खेल –

फाइल चली मगर मंज़िल नहीं मिली जिस पर सवाल, अनुमति भी उसी से – नौकरशाही का खेल –

राजधानी : – फाइल चलती जरूर है, लेकिन मंज़िल तक कब पहुंचेगी, यह कोई नहीं जानता। और कभी-कभी तो हालत यह होती है कि फाइल वहीं अटक जाती है, जहां से उसे आगे बढ़ना होता है। अब एक दिलचस्प मामला सामने आया है। आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो यानी EOW ने साल 2018 में एक एफआईआर दर्ज की थी।

मामला ग्राम अमरूआ-रिकोकला में बाढ़ राहत कार्य के दौरान हुई कथित आर्थिक गड़बड़ी से जुड़ा था। जांच में सामने आया कि जिस काम की लागत करीब 3 लाख 75 हजार रुपये होनी चाहिए थी, उसके लिए 8 लाख 28 हजार रुपये का भुगतान कर दिया गया। यानी लगभग 4 लाख 53 हजार रुपये ज्यादा। कागजों में यह एक छोटा सा आंकड़ा लग सकता है, लेकिन सरकारी व्यवस्था में यह सवाल बड़ा हो जाता है। क्या यह सिर्फ एक गलती थी… या फिर सरकारी पैसों की एक और फिसलन?

ईओडब्ल्यू ने जांच की और पाया कि उस समय के कार्यपालन अभियंता और वर्तमान प्रमुख अभियंता केके कटारे हाँ वही जिनका फर्जी जाति प्रमाण पत्र निरस्त कर दिया गया है और वर्तमान चीफ इंजीनियर हरिओम शर्मा जो तदर्थ भर्ती से आये और इस पांच विभाग के उच्च पद पर बैठे है जो खुद को संघठन का बेहद करीबी बताते है उनपर गंभीर आरोप है।

अब यहां से कहानी रोचक मोड़ लेती है। क्योंकि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ जांच आगे बढ़ाने के लिए अभियोजन स्वीकृति जरूरी होती है। ईओडब्ल्यू ने विभाग से यह अनुमति मांगी और फिर… फाइल चल पड़ी। लेकिन मंज़िल तक नहीं पहुंची।

17 महीने बीत गए फाइल अब भी अनुमति का इंतजार कर रही है। यानी जांच एजेंसी तैयार है, एफआईआर दर्ज है, आरोप दर्ज हैं लेकिन आगे बढ़ने के लिए जिस कागज की जरूरत है, वह अब भी सरकारी टेबलों के बीच घूम रहा है। यहां सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस अधिकारी के खिलाफ जांच होनी है, वह आज उसी पद पर बैठे हैं जहां से जांच की अनुमति जानी है। अब जरा सोचिए अगर किसी के खिलाफ जांच होनी हो और अनुमति देने की कुर्सी पर वही बैठा हो तो फाइल का हाल क्या होगा?

सरकारी भाषा में इसे कहते हैं “प्रक्रिया जारी है।” लेकिन जनता की भाषा में इसका मतलब अक्सर कुछ और होता है फाइल चलती रहती है समय बीतता रहता है और धीरे-धीरे मामला धुंधला हो जाता है क्योंकि सरकारी व्यवस्था में एक और अनकहा नियम है जितनी पुरानी फाइल… उतनी ठंडी जांच। अब सवाल सिर्फ चार लाख रुपये का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जहां जांच एजेंसी को भी अनुमति का इंतजार करना पड़ता है। और वह अनुमति उसी व्यवस्था से मांगनी पड़ती है, जिसकी जांच होनी है। ऐसे में जांच आगे बढ़ेगी…या फाइल आगे बढ़ेगी…यह तय करना शायद आसान नहीं है।

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