रेट का राज और “बगुला भगत” का दरबार –

रेट का राज और “बगुला भगत” का दरबार –
सिस्टम की गलियों में इन दिनों फिर वही पुरानी फुसफुसाहट लौट आई है बस किरदार बदले हैं, तरीका वही पुराना है । कहते हैं पहले भी कुर्सियाँ “योग्यता” से कम और “योगदान” से ज़्यादा तय होती थीं। अब चर्चा है कि नई सरकार में भी वही पुराना गणित फिर से जाग गया है।
कहानी में इस बार एक नया किरदार है लोग प्यार से उसे “बगुला भगत” कह रहे हैं। जगह सचिवालय, अंदाज़ शांत, लेकिन नजर पूरी व्यवस्था पर। बगुला खड़ा भले एक टांग पर रहता हो, पर चोंच वहीं मारता है जहाँ मछली मोटी हो और यहाँ मछलियाँ “जिले” हैं।
सूत्रों की मानें तो इन दिनों कप्तानों की कुर्सी सिर्फ प्रशासनिक निर्णय नहीं रही, बल्कि एक “रेट कार्ड” के साथ चल रही है। कौन किस जिले जाएगा, किसे कहाँ बिठाया जाएगा ये फाइल से कम, फुसफुसाहट से ज़्यादा तय हो रहा है।
कहते हैं हाल ही में शक्ति और कोंडागांव जैसे जिलों की कुर्सियाँ भी चर्चा में रहीं नाम बदले, पोस्टिंग हुई, और साथ में “रेट” की भी बात बाजार में घूमती रही। कौन पहुँचा, कैसे पहुँचा इसकी कहानी कागज़ पर कम, गलियारों में ज़्यादा लिखी जा रही है।
पुराने लोग याद दिलाते हैं एक दौर ऐसा भी था जब सचिवालय की कुर्सी पर बैठकर “सेटिंग” का पूरा तंत्र चलता था। उस समय भी एक महिला किरदार और एक वर्दीधारी चेहरा चर्चा में थे। नतीजा क्या हुआ सरकार की छवि पर दाग, और सिस्टम की साख पर सवाल।
अब वही कहानी फिर से रिपीट होने की आशंका जताई जा रही है। फर्क बस इतना है कि इस बार किरदार बदल गया है, लेकिन पटकथा वही लग रही है। बताने वाले तो यहाँ तक कह रहे हैं कि “बगुला भगत” के इशारे के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। कौन कप्तान बनेगा, कौन किनारे बैठेगा सबकी डोर एक ही हाथ में है।
सवाल सीधा है क्या वर्दी अब भी सेवा का प्रतीक है, या फिर सौदे का हिस्सा बनती जा रही है? और अगर “रेट” ही तय करेगा कि कानून कहाँ खड़ा होगा, तो फिर न्याय किसके साथ बैठेगा?
सनद रहे – जब कुर्सियाँ बोली लगाकर तय होने लगें, तो कानून खड़ा नहीं रहता वो भी खरीदार ढूंढने लगता है।










