अर्धन्यायिक कुर्सी पर वर्दी , कृष्ण कुमार पटेल की नियुक्ति पर सवाल , वसूली का खेल और क्या वीआईपी रोड़ के OTR का सच

अर्धन्यायिक कुर्सी पर वर्दी , कृष्ण कुमार पटेल की नियुक्ति पर सवाल , वसूली का खेल और क्या वीआईपी रोड़ के OTR का सच
रायपुर : – इन्द्रावती भवन स्थित परिवहन विभाग में उप परिवहन आयुक्त के पद पर पदस्थ अधिकारी कृष्ण कुमार पटेल को लेकर अब प्रशासनिक और कानूनी बहस तेज हो गई है। इसकी वजह सिर्फ दफ्तर के बाहर चिपका एक अनौपचारिक नोट नहीं, बल्कि वह सरकारी आदेश है, जिसके जरिए एक पुलिस अधिकारी को इस पद पर प्रतिनियुक्त किया गया है। दस्तावेज बताते है कि छत्तीसगढ़ शासन सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) द्वारा जारी आदेश में राज्य पुलिस सेवा के अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर अन्य विभागों में पदस्थ किया गया है। इसी आदेश के तहत अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक स्तर के अधिकारी कृष्ण कुमार पटेल को उप परिवहन आयुक्त, इन्द्रावती भवन, रायपुर के पद पर पदस्थ किया गया है।
नियम और पद की प्रकृति पर सवाल –
परिवहन विभाग में उप परिवहन आयुक्त का पद केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि कई मामलों में अर्ध-न्यायिक (Quasi-Judicial) भूमिका निभाता है। इस पद पर बैठे अधिकारी परमिट विवादों की सुनवाई करते हैं तथा कर, फिटनेस और रजिस्ट्रेशन से जुड़े मामलों में निर्णय लेते हैं, साथ ही अपीलों का निपटारा भी करते हैं।
ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या पुलिस सेवा के अधिकारी को इस प्रकार की अर्ध-न्यायिक भूमिका में बैठाना नियमों की भावना के अनुरूप है?
बताते चले कि कृष्ण कुमार पटेल वर्ष 2013 बैच के अधिकारी बताए जाते हैं और अपेक्षाकृत कम सेवा अवधि में ही उप परिवहन आयुक्त जैसे महत्वपूर्ण पद पर उनकी पदस्थापना ने भी चर्चा को जन्म दिया है। विभागीय और प्रशासनिक हलकों में यह भी है कि इनके इलाके से आने वाले एक आईएएस मंत्री जी का इन्हें वरदहस्त मिला हुआ है। अब सैया भये कोतवाल तो डर काहे का। ऐसे में यह सवाल प्रासंगिक हो जाता है कि क्या इस नियुक्ति में केवल प्रशासनिक प्रक्रिया अपनाई गई है, या इसके पीछे कोई विशेष परिस्थितियां भी प्रभावी रहीं?
प्रतिनियुक्ति बनाम पात्रता –
शासन को यह अधिकार है कि वह अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर अन्य विभागों में भेज सकता है। हालांकि प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि अर्ध-न्यायिक पदों पर नियुक्ति के लिए कानूनी समझ, प्रक्रिया का अनुभव और प्रशासनिक दक्षता महत्वपूर्ण मापदंड होते हैं। ऐसे मे क्या केवल प्रतिनियुक्ति आदेश पर्याप्त है, या पद की प्रकृति के अनुसार विशेष योग्यता भी आवश्यक है?

दफ्तर के संचालन पर भी सवाल –
इसी बीच, संबंधित कार्यालय के बाहर चिपका एक नोट परमिट संबंधी कार्य हेतु शाम 04:00 बजे के उपरांत मिलें भी चर्चाओ में है। यह नोट किसी आधिकारिक आदेश के रूप में जारी नहीं है न उस पर हस्ताक्षर या विभागीय मुहर है। इससे यह सवाल और गहरा गया है कि क्या कार्यालय समय (सुबह 10 से शाम 5 बजे) में जनसुनवाई नहीं होती? क्या दूरदराज़ से आने वाले लोगों को केवल निर्धारित समय का इंतज़ार करना होगा? बस्तर, सरगुजा और अन्य अंचलों से आने वाले लोगों के लिए यह व्यवस्था असुविधाजनक मानी जा रही है। सुबह से पहुंचने वाले आवेदकों को घंटों इंतजार करना पड़ता है या काम अगले दिन के लिए टालना पड़ता है। यह स्थिति समान सेवा और सुगम प्रशासन के अधिकार पर भी सवाल खड़ा करती है।
प्रशासनिक बहस और जवाबदेही –
अब इस पूरे मामले में दो प्रमुख सवाल उभर रहे हैं क्या अर्ध-न्यायिक प्रकृति वाले पद पर पुलिस अधिकारी की नियुक्ति उचित है? क्या कार्यालय संचालन में अपनाई जा रही व्यवस्था शासन के नियमों के अनुरूप है? विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी नियुक्तियों में स्पष्ट दिशानिर्देश और पात्रता मानक सार्वजनिक होने चाहिए साथ ही, कार्यालयों में पारदर्शी और समान समय-प्रबंधन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
सरकारी आदेश ने नियुक्ति को वैधता जरूर दी है, लेकिन पद की प्रकृति और कार्यप्रणाली को लेकर उठे सवाल अब भी बाकी हैं। अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या शासन इन सवालों पर स्पष्टता देगा, या यह मामला सिर्फ प्रशासनिक बहस बनकर रह जाएगा।
(Coming Next)
अगली सीरीज़ में पढ़िए वीआईपी रोड स्थित OTS का पूरा किस्सा आखिर असली कहानी क्या है? कौन हैं इसके असली संचालक और कैसे चलता है अंदर का सिस्टम?









