कही अनसुनी बातें मंत्रालय की गलियारों में गूंजता नितिन थापर

कही अनसुनी बातें
मंत्रालय की गलियारों में गूंजता नितिन थापर
मंत्रालय की लंबी-लंबी गलियों में इन दिनों एक फुसफुसाहट घूम रही है। फुसफुसाहट इतनी हल्की कि फाइलों के नीचे दब जाए और इतनी तेज़ कि स्पीकर तक सुनाई दे जाए। कहानी है एक बैच विशेष वाले साहेब की। वह साहेब ऊपर से जितने सीधे है भीतर उतने ही गहरे बताये जाते है। जिनके कमरे के बाहर कुर्सियाँ कम और इंतज़ार ज़्यादा रहता है। बताया जाता है कि झारखंड से एक व्यापारी आया। काम था बड़ा काम। लेकिन आजकल मंत्रालय में एंट्री यूँ ही नहीं मिलती। डिजिटल युग है साहब। नाम, नंबर, ओटीपी, सत्यापन, बैकग्राउंड इतनी जांच तो अब फाइल से ज्यादा आदमी की होती है। पर सिस्टम कितना भी डिजिटल हो मानव बुद्धि एनालॉग ही रहती है।
कहा जाता है कि व्यापारी और साहेब दोनों जानते थे कि व्यापारी बनकर घुसना मुश्किल है। इसके लिए बाकायदा एक योजना बनी व्यापारी नहीं अफसर बनकर कोशिश करते हैं। और कमाल होता है! एंट्री दर्ज हुई नाम नितिन थापर , पद – आईपीएस , और बैच – 2005
वाह री तकनीक! जिसे आम आदमी के लिए अभेद्य किला बताया जाता है, वह एक नए नाम की चाबी से खुल गया। फिर क्या दरबार सजा। मुलाकात हुई। बात बढ़ी। और बताते हैं बातों के बीच व्यापार भी हो गया। बताया जाता है कि व्यापार छोटा नहीं था। लेन-देन भी लेनदेन जैसा था। लेकिन सिस्टम की असली परीक्षा तब होती है जब लेन पूरा हो जाए और देन अटक जाए।
यहीं से कहानी मोड़ लेती है। अब वही कथित आईपीएस उर्फ व्यापारी मंत्रालय की सीढ़ियाँ नाप रहा है। कह रहा है मेरा पैसा दिलवा दो। पर जिनसे दिलवाना है वे इतने बड़े साहेब हैं कि उनके ऊपर सिर्फ छत है। नीचे सब खड़े हैं।
इसके बाद व्यापारी गया एक और बड़े साहेब के पास जो ऊँचाई में छोटे पर पद में ऊँचे दिखलाई पड़ते है। नाराज़गी दिखी। पर आवाज़ नहीं निकली। अब नाराज़गी किस बात की थी? कट कम मिलने की? या गलत काम उजागर होने की? यह रहस्य तो वही जाने।
जब यहाँ भी बात नहीं बनी तो फुसफुसाहट ने स्पीकर का रूप ले लिया। और जैसे ही गलियारों की बात स्पीकर तक पहुँची कुछ कान खड़े हुए। कुछ बगुले अचानक सक्रिय हो गए। जो अब तक एक पैर पर ध्यान मुद्रा में खड़े थे अब चोंच तेज़ करने लगे। मंत्रालय का तालाब हल्का-हल्का मटमैला दिखने लगा है। जो मछलियाँ कल तक सुरक्षित थीं आज सतह पर आने लगी हैं। कोई कहता है डिजिटल सिस्टम मजबूत है। कोई कहता है नाम बदलने से सिस्टम नहीं बदलता। पर असली सवाल अब भी वही है अगर एंट्री किसी और नाम से हुई तो सिस्टम सो रहा था? या जागकर भी अनदेखा कर रहा था?
अगर लेनदेन हुआ तो क्या वह फाइल में दर्ज है? या सिर्फ यादों में? मंत्रालय की दीवारें बहुत कुछ सुनती हैं। स्पीकर कम बोलता है। पर जब बोलता है तो बगुलों की नींद उड़ जाती है। यह कहानी किसी एक नाम की नहीं है। यह कहानी उस भरोसे की है जिसे डिजिटल कवच पहनाकर अभेद्य बताया गया था। जब व्यापारी आईपीएस बनकर घुसता है तो सवाल तकनीक पर नहीं, नियत पर उठता है। और अब सवाल यह नहीं कि किसने किया। सवाल यह है किसे बचाया जाएगा? और उससे भी बड़ा डिजिटल दरबार सच में जागेगा या अगली एंट्री फिर किसी नितिन थापर के नाम से होगी।










