खबर प्लांट से लेकर तीन नामों के पैनल तक एक पद में सिमटती ताकत और डीजीपी नियुक्ति का पूरा खेल – छत्तीसगढ़ पुलिस नेतृत्व नियुक्ति, वरिष्ठता और केंद्रीकरण पर उठते सवाल

खबर प्लांट से लेकर तीन नामों के पैनल तक एक पद में सिमटती ताकत और डीजीपी नियुक्ति का पूरा खेल – छत्तीसगढ़ पुलिस नेतृत्व नियुक्ति, वरिष्ठता और केंद्रीकरण पर उठते सवाल
राजधानी : – छत्तीसगढ़ में पुलिस नेतृत्व को लेकर इन दिनों प्रशासनिक स्तर पर कई महत्वपूर्ण प्रश्न उभर रहे हैं। मामला अब सिर्फ एक नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि संरचना, वरिष्ठता, प्रक्रिया और शक्ति-संतुलन के व्यापक दायरे में फैल चुका है। वर्तमान में डीजीपी अरुण देव गौतम राज्य में पुलिस की कमान प्रभारी के रूप में संभाल रहे हैं। इसके साथ ही उनके पास होम गार्ड एवं अभियोजन (Prosecution) जैसे अतिरिक्त प्रभार भी हैं।
एक ही अधिकारी के पास इन महत्वपूर्ण इकाइयों का केंद्रीकरण स्वाभाविक रूप से प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। आखिरकार, जब कई दरवाज़ों की चाबी एक ही जेब में हो, तो बाकी चाबियों का इस्तेमाल कितना रह जाता है यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है।
डीजी स्तर की संरचना –
सामान्यतः राज्य में डीजी स्तर के चार पद माने जाते हैं, जो अलग-अलग कार्यक्षेत्रों के लिए निर्धारित होते हैं। हालांकि, वर्तमान परिदृश्य में यह चर्चा सामने आ रही है कि कुछ डीजी स्तर के अधिकारी लंबे समय से स्पष्ट कार्य-आवंटन के बिना हैं। जबकि निर्णय लेने की प्रक्रिया सीमित दायरे में सिमटती दिखाई देती है। यह स्थिति एक बड़े प्रशासनिक प्रश्न की ओर इशारा करती है क्या पद और अधिकार के बीच संतुलन बना हुआ है, या धीरे-धीरे केंद्रित हो रहा है?
तीन नामों का पैनल –
सूत्रों के अनुसार, डीजी स्तर की नियुक्ति के लिए तीन नामों का पैनल प्रस्तावित किया गया है जिसमे शिवराम प्रसाद कल्लूरी , प्रदीप गुप्ता , विवेकानंद सिन्हा का नाम शामिल है। यह प्रस्ताव वर्तमान में गृह विभाग के समक्ष विचाराधीन बताया जाता है। लेकिन इसी बिंदु पर एक मूल प्रश्न खड़ा होता है जब पहले से डीजी रैंक के अधिकारी उपलब्ध हैं, तो उन्हें दायित्व क्यों नहीं दिया गया? और समानांतर रूप से नया पैनल तैयार करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? प्रशासनिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि इस पूरी प्रक्रिया के पीछे पांचवी मंजिल वाले छोटे अधिकारी का पूरा मैनेजमेंट है।
कैडर ट्रांसफर वरिष्ठता का गणित –
इस संदर्भ में जेल डीजी हिमांशु गुप्ता का मामला भी महत्वपूर्ण हो जाता है। वे मूलतः त्रिपुरा कैडर के आईपीएस अधिकारी रहे हैं। जो कैडर ट्रांसफर के तहत मध्यप्रदेश में आए राज्य पुनर्गठन (2000) के बाद छत्तीसगढ़ कैडर में शामिल हुए। डीओपीटी के नियमों के अनुसार, कैडर ट्रांसफर के पश्चात अधिकारी को संबंधित राज्य की वरिष्ठता सूची में अपने बैच में अंतिम स्थान दिया जाता है। इस आधार पर यह तर्क उभरता है कि वरिष्ठता क्रम के अनुसार शिवराम प्रसाद कल्लूरी का नाम प्राथमिकता में होना चाहिए था। यदि यह व्याख्या सही है, तो पैनल की संरचना और क्रम को लेकर प्रशासनिक पारदर्शिता की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है।
मीडिया नैरेटिव या दबाव की रणनीति?
इसी बीच कुछ वेब पोर्टलों पर यह खबरें भी सामने आई हैं कि यदि शीघ्र पूर्णकालिक डीजीपी की नियुक्ति नहीं की गई, तो अवमानना (Contempt) की स्थिति बन सकती है। हालांकि, राज्य शासन के पास अपनी विधिक सलाहकार प्रणाली होती है, जो ऐसे मामलों में स्पष्ट मार्गदर्शन प्रदान करती है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है क्या ये खबरें आधिकारिक स्थिति को दर्शाती हैं? या यह केवल एक संभावित कानूनी व्याख्या का चयनित पक्ष है? क्योंकि अगर फैसले अब खबर के दबाव में तेज होने लगें, तो फाइलों की गति और सुर्खियों की दिशा में फर्क करना मुश्किल हो जाता है।
निर्णय प्रक्रिया और संस्थागत संतुलन –
सूत्रों के अनुसार, शीर्ष स्तर पर अभी इस विषय में अंतिम सहमति नहीं बनी है। ऐसी स्थिति में त्वरित निर्णय का माहौल बनना क्या यह प्रशासनिक आवश्यकता है? या परिस्थितिजन्य दबाव? यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योकि संस्थागत निर्णय प्रक्रिया का आधार संतुलन और विधिक स्पष्टता होता है, न कि तात्कालिकता।
इसी के साथ सवाल उठता है कि वर्तमान स्थिति में कुछ मूलभूत प्रश्न सामने आते हैं क्या डीजीपी नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी तरह नियम-आधारित और पारदर्शी है? क्या वरिष्ठता क्रम और डीओपीटी के दिशा-निर्देशों का समुचित पालन हो रहा है? क्या डीजी स्तर के पदों का संतुलित उपयोग किया जा रहा है? या फिर निर्णय प्रक्रिया किसी विशेष नैरेटिव या दबाव से प्रभावित हो रही है?
कुलमिला कर छत्तीसगढ़ में पुलिस नेतृत्व को लेकर चल रही यह पूरी प्रक्रिया अब केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं रह गई है। यह एक ऐसा परिदृश्य बन चुका है, जहाँ संरचना, नियम, पारदर्शिता और शक्ति-संतुलन चारों की एक साथ परीक्षा हो रही है। अंततः यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि निर्णय नियमों के आधार पर लिया जाता है, या माहौल के प्रभाव में फैसला आता है। क्योंकि जब नियुक्ति की फाइल और खबर की हेडलाइन एक ही दिशा में चलने लगें तो सवाल उठना ही सबसे स्वाभाविक प्रक्रिया बन जाता है।









