अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी – सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(रविवार की चिट्ठी – सुशांत की कलम से)

लीला तंत्र –
परिवहन विभाग इन दिनों रवि के उजाले से कम, कृष्ण की लीलाओं से ज़्यादा चर्चाओं में है। यहाँ फाइले खुलती जरूर है लेकिन असली खेल परदे के पीछे ही हो जाता है। इस कहानी के केंद्र में हैं एक उप परिवहन आयुक्त साहेब, जिनका नाम भले न लिया जाए, पर उनकी कृष्ण-लीलाएं हर ज़ुबान पर हैं। आरटीओ के गलियारों में अब नियम नहीं, संकेत चलते हैं और हर संकेत का अर्थ होता है चढ़ावा पहुँचा क्या? कहते हैं, यह चढ़ावा यमुना की धारा की तरह बहता है नीचे से उठकर सीधे ऊपर तक, बिना किसी रेड सिग्नल के पहुँचता है और जब ऊपर से कृपा बनी रहे, तो हर लीला अपने आप ही वैध घोषित हो जाती है। चर्चा यह भी है कि एक आईएएस मंत्री जी का इस कृष्ण पर विशेष स्नेह है जो एक अदृश्य सुरक्षा कवच की तरह है। अब जब आशीर्वाद का सुदर्शन साथ हो, तो नियम-कायदों के कंस का भय किसे रहेगा? साहेब ने अपने कनिष्ठों को साफ संकेत दे दिया है हमारा प्रसाद तय है नीचे का प्रबंध आप लोग संभाल लो। बस फिर क्या था, हर टेबल अपनी-अपनी बांसुरी बजाने लगी। कहीं परमिट की धुन, कहीं फिटनेस की ताल, और हर सुर के पीछे एक ही राग व्यवस्था का। अब हालात ऐसे हैं कि विभाग कम, एक विस्तृत रासलीला का मंच ज़्यादा नजर आता है। जहाँ किरदार बदलते रहते हैं, पर कथा वही रहती है चढ़ावे की, कृपा की, और लीला की परिवहन का पहिया घूम तो रहा है, बस दिशा अब सड़कों से हटकर माखन की ओर मुड़ चुकी है।

मठ मौन –
वीआईपी रोड का वह मंदिर, जहाँ कभी राजनीति की आरती उतारी जाती थी, जहाँ हर फैसले की घंटी बजती थी आज अजीब सन्नाटे में डूबा है। कभी यही वह दरबार था जहाँ से सत्ता की दिशा तय होती थी; फाइलें नहीं, चेहरे चलते थे और संकेत ही आदेश होते थे। लेकिन वक्त ऐसा पलटा कि अब उसी जगह एक मठाधीश महाराज शिकायत पेटी लेकर बैठे हैं। वही महाराज, जो कभी फैसले सुनाते थे, आज गलियारों में घूम-घूमकर शिकायतें सुनाते नजर आते हैं। कल तक जहाँ से सिस्टम चलता था, आज वही सिस्टम के खिलाफ फुसफुसाहटों का अड्डा बन चुका है। हर मिलने वाले को एक नई कथा सुनाई जाती है किसने क्या किया, कौन भटका, कौन दोषी है। पर इसी बीच एक धीमी आवाज़ यह भी उठती है कि महाराज के अपने आँगन में भी सब कुछ उतना निर्मल नहीं। कहते हैं, घर के भीतर ही अपने लोग हाउस की कुर्सियों पर विराजमान हैं ओएसडी बनकर। न नियम, न प्रक्रिया बस कृपा का अदृश्य धागा सब कुछ जोड़े हुए है। और कहानी यहीं खत्म नहीं होती मठाधीश महाराज का साम्राज्य सीमित भी नहीं है। दूसरे राज्यों में उनके कई कॉलेज चलते हैं, जिनका संचालन एक दत्तक उत्तराधिकारी के हाथों में है। बात मंच से राष्ट्र हित की होती है,पर गलियारों में स्वहित की गूंज ज्यादा सुनाई देती है। अब अगर यह परत खुलकर सामने आ जाए, तो हल्ला तय है पर फिलहाल सब कुछ मौन की चादर में ढका हुआ है। महाराज अपनी ही धुन में हैं, शिकायतों की माला जपते हुए शायद उन्हें यह एहसास नहीं कि जो दरबार कभी न्याय का प्रतीक था, वही आज सवालों के घेरे में खड़ा है। वीआईपी रोड का वह मंदिर आज भी खड़ा है बस फर्क इतना है पहले वहाँ फैसले गूंजते थे, अब सिर्फ शिकायतें सुनाई देती हैं।

स्वर्ण नीति –
आओ आपको मिलाते हैं एक ऐसी ईमानदार आईएएस से, जिनकी ईमानदारी की मिसाल खुद उनके विभाग में दी जाती है। कहते हैं, ये न कैश लेती हैं, न ऑनलाइन ट्रांजेक्शन का झंझट रखती हैं, इनका लेनदेन थोड़ा अलग है और थोड़ा कीमती भी, आखिर हो भी क्यों न मेडम जिस परिवेश से वे आती हैं, वहाँ सोना सिर्फ आभूषण नहीं, एक परंपरा है एक व्यवस्था है। बताया जाता है कि मैडम की ईमानदारी तब तक अटूट रहती है, जब तक चर्चा गोल्ड से दूर रहती है। जैसे ही तराजू में ग्राम जुड़ने लगते हैं, वैसे ही फाइलों की गति भी चमत्कारिक हो जाती है। हिंदी भले थोड़ी कम समझ में आए,लेकिन हिसाब-किताब का गणित एकदम सटीक है कितना ग्राम, कहाँ से, किसके लिए सब कुछ क्लियर आबकारी विभाग की जिम्मेदारी संभालते हुए मैडम ने अपनी अलग ही नीति विकसित कर ली है। जहाँ नियम किताबों में चलते हैं, और असली प्रक्रिया तराजू पर तौली जाती है। चर्चा तो यह भी है कि मैडम एक खास बैच से आती हैं,जहाँ सिस्टम को समझना नहीं, साधना सिखाया जाता है। अब जब नीति में स्वर्ण स्पर्श जुड़ जाए, तो विभाग का हर निर्णय चमकने लगता है। यहाँ ईमानदारी का पैमाना थोड़ा अलग है नोटों से नहीं, धातु से मापा जाता है। और शायद यही वजह है कि इस स्वर्ण नीति के आगे बाकी सब नीतियाँ फीकी पड़ जाती हैं।

कुलपति कनेक्शन –
छत्तीसगढ़ में विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ी है, पर एक चीज़ और तेज़ी से बढ़ी है कनेक्शन की ताकत कहने को तो यह ज्ञान का मंदिर है, पर भीतर नियुक्ति का गणित कुछ और ही कहता है। महाविद्यालयो में नौकरी के लिए पसीना बहाओ, परीक्षा दो, मेरिट बनाओ लेकिन विश्वविद्यालय की कुर्सी? वहाँ रास्ता थोड़ा सीधा हो जाता है। सुना है इस बार तो कमाल ही हो गया एक संगठन के भाई साहब सीधे जोगिंदर नगर से चांसलर स्तर का दिमाग उठा लाए। अब यह चयन था या सेटिंग, यह सवाल गलियारों में गूंज रहा है। योग्यता की फाइल कितनी थी, यह कोई नहीं पूछ रहा, पर करीबी कितनी थी यह सब जानते हैं। विश्वविद्यालय ऑटोनॉमस जरूर हैं, पर निर्णय की डोर कहीं और बंधी दिखती है। अब हालात ऐसे हैं कि किताबों में ज्ञान खोजने वाले छात्र और गलियारों में जुड़ाव खोजने वाले लोग दो अलग दुनिया में जी रहे हैं। सवाल वही है जब हर नौकरी के लिए परीक्षा जरूरी है, तो कुलपति बनने के लिए PSC जैसा इम्तिहान क्यों नहीं? या फिर मान लिया जाए यहाँ डिग्री नहीं, डायरेक्ट कनेक्शन ही सबसे बड़ा सर्टिफिकेट है।

सेटिंग तंत्र –
सत्ता बदली और साथ ही बदल गया नेताओं का टेम्परेचर जो कल तक चादर तानकर विपक्ष की नींद सो रहे थे, आज निगम-मंडल की कुर्सियों के लिए मैराथन दौड़ लगा रहे हैं।
कार्यालय के एसी कमरे से सीधे संघर्ष की कहानी लिखने वाले अब खुद को मैदान का योद्धा बता रहे हैं। और जो सच में सड़क पर थे, वे लिस्ट देखकर सन्न हैं। 6 महीने पहले निगम मंडलों की सूची ने पार्टी के भीतर का तापमान बढ़ा दिया। युवा चेहरे फट पड़े जब लड़ाई थी, तब ये कहाँ थे? जवाब किसी के पास नहीं, पर दौड़ सबके पास है। अब नया खेल शुरू हुआ है जो निगम-मंडल बच गए, जिनमें राज्य मंत्री का स्वाद मिलता है, उन पर नजरें टिकी हैं। और यहीं से एंट्री होती है चिमनी की जो कुछ महीनों पहले एक आयोग की कुर्सी पा चुका है, पर छह महीने से जॉइन नहीं किया। कारण? कुर्सी छोटी है नजर बड़ी कुर्सी पर है। कहते हैं सैलरी भी नहीं ले रहा, ताकि रिकॉर्ड साफ रहे और अगली लिस्ट में नाम चमक जाए। उधर केंद्रीय गलियारों की भी सक्रियता बढ़ गई है आवभगत, मुलाकात, मुस्कान सब फुल ऑन है। एक केंद्रीय चेहरे की खातिरदारी ऐसी हुई कि पुराने कार्यकर्ता बस देखते रह गए ये आया कब और पहुंच गया कहाँ? बताया जाता है, खेल अब सिर्फ सेटिंग का नहीं, पूरी सेटिंग करवाने का है। हर वैरायटी उपलब्ध है सिफारिश से लेकर समीकरण तक। अब देखना दिलचस्प होगा धुआँ ही धुआँ उठेगा या कहीं से सच में आग भी दिखेगी।

बोतल राज –
आबकारी के गलियारों में इन दिनों नियम नहीं, नुस्खे चलते हैं। नई शराब नीति आई जो कागज़ों में तो सख्त है लेकिन जमीन पर आते ही थोड़ी लचीली हो गई। नियम कहते है कि 120 से नीचे कुछ नहीं, नीति कहती है rPET में सप्लाई होगी, लेकिन फाइल से बाहर निकलते ही 110 में काँच की बोतल चमक उठती है। यानी नियम हार गए और बोतल जीत गई। बिलासपुर की बॉटलिंग, भोपाल की सप्लाई, और बीच में एक लीजेंड़ की कहानी जिसे पढ़ते ही समझ आता है कि यह सिर्फ व्यापार नहीं, पूरा तंत्र है। कहते हैं राजनांदगांव का एक पुराना खिलाड़ी इस खेल का असली कप्तान है। सरकार कोई भी हो, उसकी पारी हमेशा लंबी चलती है। क्रिकेट के मैदान से लेकर बोर्डरूम तक उसका सिक्का चलता है, और बेटा तो सीधे बड़े मैदानों में खेल रहा है। राज्य बनने के बाद से ही क्रिकेट की पिच हो या शराब का बाजार हर जगह वही सेटिंग का स्ट्रोक दिखता है। मगर इस बार तो पाँचवीं मंजिल भी नतमस्तक बताई जा रही है, जहाँ फाइलें नहीं, इशारे चलते हैं। नीति कहती है सब बराबर, जमीन कहती है कुछ खास अलग। उधर एक परीक्षा की जांच चल रही है साहेब आरोपी है। पहले छात्रों का भविष्य बर्बाद हुआ अब प्रदेश का बंटाधार हो रहा है। क्या यह सिर्फ एक बोतल का खेल है? या पूरी नीति ही प्रीमियम और जनरल में बंट चुकी है? जहाँ 120 का नियम फेल हो जाए, और 110 की फाइल पास हो जाए तो समझ लेना चाहिए यह गलती नहीं, पूरी व्यवस्था की सेटिंग है। राज खुलकर सामने नहीं आते, बस हल्की-सी खुशबू छोड़ जाते हैं जो बता देती है सिस्टम अब सीधा नहीं, ऑन द रॉक्स चल रहा है।

यक्ष प्रश्न – 

1 – क्या दक्षिण वाले साहब दिल्ली दरबार के सहारे एक्सटेंशन साध पाएंगे?

2 –  पुलिस मुखिया की कुर्सी अब भी उतनी ही मजबूत है जितनी दिखती है?

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