अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी – सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(रविवार की चिट्ठी – सुशांत की कलम से)

वीआईपी रोड का मठ –
वीआईपी रोड का वह मंदिर, जहाँ भगवान से ज्यादा मठाधीश चर्चाओ में है। एक दौर था जब सुशासन की शुरुआत के साथ ही यहाँ लाल बत्तियों का मेला लगता था। अफसरों की कतारें लगती थीं और फाइलें आशीर्वाद लेकर आगे बढ़ती थीं। ट्रांसफर हो या पोस्टिंग, हर रास्ता इसी दरबार से होकर गुजरता था।लेकिन वक्त बदला, भीड़ छंटी और सन्नाटा गहराने लगा। मठाधीश को लगा कि अब पुराने तरीके काम नहीं करेंगे। तो आशीर्वाद की जगह फोन ने ले ली। जिले-जिले में कॉल जाने लगे जिसमे सप्लाई से लेकर ठेके तक के संकेत थे। कहा जाता है कि यह सब नेटवर्क भाईसाहबों के नाम लेकर चलाया जा रहा है। पर सिस्टम ने भी जल्दी ही इस नए खेल को समझ लिया। जब फोन का असर घटा, तो लहजा बदल गया। अब काम शिकायत के रास्ते से होने लगा। पहले नाम चलता था, फिर पहचान बनी, अब शिकायत का दौर है। दबाव का तरीका बदला, लेकिन मकसद वही रहा वर्चस्व बचाना। इसी बीच मठ ने हाउस में अपना सूत्र भी जमा लिया। जहाँ से रोज खबर आती है कि सत्ता के गलियारे में क्या पक रहा है। आज मंदिर वही है, पर भीड़ और तरीक़े बदल चुके हैं। पहले यहाँ श्रद्धा से रास्ते बनते थे, अब सूचना से समीकरण बनते हैं। मठाधीश अब भी सक्रिय हैं, बस भूमिका बदल गई है। दरबार आज भी है, लेकिन अब उसमें भक्ति कम, रणनीति ज्यादा है।

तालाब, तिवारी और तामझाम –
इसी मंदिर से थोड़ा आगे बढ़िए तो यहाँ एक सरकारी दर्जे की जमीन है जो कागजों में तो तालाब है। लेकिन जमीन पर तालाब की जगह एक आलीशान होटल खड़ा है। नगर निगम ने इस निर्माण को अवैध मानते हुए तोड़ने का आदेश भी दिया था। नोटिस जारी हुए, कागज चले, फाइलें भी हिलीं लेकिन बुलडोजर अब तक रास्ता नहीं ढूंढ पा रहा है। कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब एक नाम सामने आता है एक जनसंपर्क विभाग से जुड़े तिवारी जी का। जो सरकारी सिस्टम में बैठकर बाहर निजी साम्राज्य चला रहा है। आरोप है कि तालाब को पाटकर अतिरिक्त निर्माण खड़े किए गए। और उसी पर होटल चल रहा है पूरी रफ्तार से। जहाँ रातें सिर्फ ठहरती नहीं, बहती हैं शराब और शोर के साथ। कागज कहते हैं यह जमीन सार्वजनिक थी। हकीकत कहती है यह अब प्राइवेट बिजनेस है। बताया जाता है कि इस पूरे सेटअप को एक मारवाड़ी को किराए पर दे दिया गया है करीब ₹1.60 लाख महीने में। यानी तालाब सूखा और कमाई का झरना चालू। सवाल सीधा है जब नोटिस है, आदेश है, तो कार्रवाई कहाँ है? या फिर VIP रोड पर नियम भी VIP हो जाते हैं? कभी इस शहर में तालाब जीवन थे अब वही तालाब कारोबार बन चुके हैं। और सिस्टम? वह कागजों में अभी भी पानी तलाश रहा है।

कथावाचक और चुटिया-धारी बनिया
कहानी यहीं नहीं रुकती। इसी वीआईपी रोड पर, मंदिर के ठीक सामने एक चमकता हुआ होटल खड़ा है। जिसकी अपनी ही कथा है। बताया जाता है कि इसे एक कथावाचक शास्त्री जी ने करीब 52 करोड़ में खरीदा है। सोच भी सीधी है जब महीने में दो-तीन बार कथा होनी ही है, तो मंच भी अपना, माइक भी अपना और ठिकाना भी अपना क्यों न हो! एक समय था जब कथा के साथ किताबें मुफ्त मिलती थीं और भाव सच्चे होते थे। अब कथा पैकेज में आती है। हॉल, लाइट, साउंड और स्पॉन्सरशिप के साथ। भक्ति अब आयोजन बन चुकी है, और आयोजन सीधा कारोबार। इसी कथा के साए में एक चुटिया-धारी बनिया भी उभर आया है। जमीन के खेल से निकला, खुद को युवा आइडल बताने वाला। पूरा आयोजन, पूरा प्रबंधन, उसी के हाथ में बताया जाता है। कभी कथावाचक को सरकारी विमान से बुलाने की चर्चा होती है, तो कभी आयोजक को दर्जा दिलाने की फुसफुसाहट। पालकी बदली है, लेकिन कंधे वही हैं। बस अब वजन आस्था का नहीं, नोटों का है। मंच पर श्लोक चलते हैं, पीछे सौदे तय होते हैं। आज कथा, सिर्फ कथा नहीं रही यह एक पूरा इकोनॉमिक मॉडल बन चुकी है। जहाँ पहले श्रद्धा चढ़ती थी… अब निवेश चढ़ता है, और रिटर्न भी आता है।

मंत्री जी की मजबूरी, सेकेटरी का साम्राज्य –
प्रदेश की राजनीति में एक ऐसी मंत्री जी हैं, जिनकी छवि आज भी साफ-सुथरी और सहज मानी जाती है। पहली बार सत्ता में आईं, जिम्मेदारी बड़ी मिली लेकिन असली नियंत्रण कहीं और खिसकता दिख रहा है। फर्क बस इतना है कि यहां मंत्री कुर्सी पर हैं, और सिस्टम किसी और की उंगलियों पर चलता नजर आता है। चूंकि विभाग की सेकेटरी मेडम ने ऐसा जाल बुन रखा है कि मंत्री जी की इच्छा और फैसले अक्सर फाइलों में ही अटक जाते हैं। अंदरखाने यह भी चर्चा है कि मंत्री जी खुद इस व्यवस्था से संतुष्ट नहीं हैं, लेकिन हाउस में बैठे कुछ मजबूत चेहरों के कारण चाहकर भी कोई बड़ा कदम नहीं उठा पा रहीं है। पहले एक नियम-कायदे से चलने वाले संचालक ने जब सिस्टम को किताब के हिसाब से चलाने की कोशिश की, तो उन्हें पहले डांट मिली और फिर रास्ते से हटा दिया गया। अब जो नया चेहरा बैठा है, वह मंत्री नहीं, सीधे सेकेटरी की ओर देखता है हर आदेश, हर अनुमति वहीं से तय होती है। कहते हैं, इस पूरे खेल के पीछे राखी वाला रिश्ता तो है ही साथ ही एक पुराना रिश्ता भी सक्रिय है घर के भीतर का असर और बाहर के एक बगुला चाल वाले अधिकारी का गठजोड़। वही अधिकारी, जो बैच की पुरानी दोस्ती और नेटवर्क के सहारे सिस्टम को अपने हिसाब से मोड़ने में माहिर माना जाता है। दिलचस्प यह भी है कि नए मुख्य सचिव के आने के बाद शुरुआत में थोड़ी हलचल दिखी, लेकिन अब सब कुछ फिर शांत है। ईमानदारी अपनी जगह है, लेकिन सिस्टम की बिसात पर चाल कोई और चल रहा है। अब सवाल यह नहीं कि मंत्री जी क्या चाहती हैं। सवाल यह है कि उन्हें चाहने दिया भी जा रहा है या नहीं। अगर यही हाल रहा, तो जिम्मेदारी मंत्री की नहीं, उस अदृश्य तंत्र की होगी जो पर्दे के पीछे से पूरा खेल चला रहा है।

पांडेय जी और दामाद बाबू –
राजधानी के गलियारों में इन दिनों एक पुराना सुर फिर गूंज रहा है पांडेय जी का बेटा हूँ…फर्क बस इतना है कि यहां बेटा नहीं, दामाद बाबू ही असली धुन पर हैं, और पांडेय जी ताल दे रहे हैं। कहानी नई नहीं है। सत्ता बदली, चेहरे बदले, लेकिन दामाद परंपरा हर दौर में कायम रही। हर सरकार में एक ऐसा खास किरदार जरूर रहा, जिसके इर्द-गिर्द टेंडर, सप्लाई और फाइलें खुद रास्ता बना लेती हैं। इस बार भी वही पटकथा है बस किरदार नए हैं। पांडेय जी ने रिश्तों की इस चाल को कुछ यूं साधा है कि दामाद बाबू अब सिर्फ रिश्तेदार नहीं, बल्कि पूरा सिस्टम बन गए हैं। हर सौदा, हर फाइल, मानो एक ही दरवाजे से होकर गुजरती है। जिसकी चाबी कहीं और नहीं, यहीं बताई जाती है। आकाश अब सच में ऊंची उड़ान भरता दिख रहा है। हर डील में सीधी एंट्री, हर काम में अलग ही रफ्तार। नीचे खड़े लोग बस यही सोचते रह जाते हैं ये उड़ान काबिलियत की है या कनेक्शन की? बाकी सब वही पुरानी कहानी है सवाल भी वही क्या कभी सिस्टम बदलेगा, या सिर्फ किरदार बदलते रहेंगे? फिलहाल तो मंच सजा है, और दामाद बाबू केंद्र में हैं।

लंबू साहेब का आखिरी ओवर –
राजधानी में कमिश्नर सिस्टम लागू होते ही एक लंबू साहेब की चर्चा भी तेज हो गई है। कुछ महीनों में सेवानिवृत्ति की दहलीज पर खड़े साहेब ने अपना पोस्ट-रिटायरमेंट प्लान ऐसा सेट किया है कि सुनने वाले भी दंग रह जाएं।
कहते हैं, किस्मत भी वक्त देखकर साथ देती है। आईपीएल शुरू हुआ और साहेब ने इसी में अपना रास्ता तलाश लिया। चर्चाओं में है कि शहर में चल रहा सट्टे का पूरा तंत्र एक संरक्षण छत्र के नीचे संचालित हो रहा है, और हर महीने मोटी रकम का खेल जारी है। सड़कों पर दौड़ती एक खास गाड़ी को भी इस नेटवर्क की रीढ़ बताया जा रहा है जहां से पूरा हिसाब किताब चलता है। दिलचस्प यह भी है कि इतने बड़े खेल के बावजूद राजधानी में खामोशी पसरी हुई है। न कोई खबर, न कोई हलचल जैसे सब कुछ तय स्क्रिप्ट के मुताबिक चल रहा हो। साहेब ने सिर्फ सिस्टम ही नहीं, टीम भी पहले से सजा ली है। पुराने भरोसेमंद चेहरे फिर से सक्रिय हैं, और एक पुरानी मोहब्बत भी राजधानी में दस्तक दे चुकी है, जो अब पूरे लाइजिंग का जिम्मा संभाल रही है। कहानी वही पुरानी है रिटायरमेंट से पहले आखिरी ओवर में बड़ा स्कोर बनाने की कोशिश। लेकिन सवाल वही है क्या यह जाल आखिरी सीटी तक छुपा रहेगा, या खेल खत्म होने से पहले कोई पर्दा उठेगा? फिलहाल, लंबू साहेब अपने आखिरी ओवर को जमकर खेल रहे हैं।

यक्ष प्रश्न –

1 – NRDA की 100 एकड़ में किसका खेल, कितनी कमाई और इसका हिस्सा किस मंत्री को पहुँचा ?

2 – वन के साहब के एक्सटेंशन की फाइल में कितना चढ़ावा चढ़ा, और किस दरबार में रास्ता खुला?

 

 

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