अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी – सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(रविवार की चिट्ठी – सुशांत की कलम से)
अरुणोदय की आस और अंत में अस्त –
वो अरुण थे जो प्रदेश में अरुणोदय करने आए थे। लेकिन कहानी कुछ और ही लिखी गई। पिछले साल दो नाम आए एक अरुण, दूसरा हिमांशु। नियम साफ था एक नाम चुनो, कुर्सी भरो। लेकिन यहाँ फाइलों ने अपना रास्ता खुद बना लिया। जिस नाम पर सवाल थे, उसे पहले “योग्य” बनाया गया फिर पद रचा गया और बैकडेट में नियमों से जूझते हुए रास्ता साफ किया गया। किताब कुछ और कहती रही, फाइल कुछ और लिखती रही। उधर अरुणोदय का इंतज़ार चलता रहा। रेगुलर होने की आस में अरुणोदय धीरे-धीरे अस्त होता गया। एक साल तक कुर्सी “प्रभारी” रही, और वही प्रभारी प्रशासन बन गया। कहते है फाइल अब “हाउस” में है, बस एक दस्तखत बाकी है।लेकिन यही एक दस्तखत पूरे प्रदेश पर भारी पड़ गया। इस एक साल में कानून व्यवस्था का जो हाल हुआ वो आंकड़ों में नहीं, ज़मीन पर दिख रहा है। और अब सुगबुगाहट है अरुणोदय अस्त होने वाला है और एक नया देव उदय के लिए तैयार है। तो सवाल वही जिसने एक साल इंतज़ार में गुज़ार दिया, वो अस्त क्यों हुआ?और जो नियमों से जूझकर, बैकडेट से निकला, वो उदय कैसे हुआ? ये खेल कुर्सी का है या नियमों का? या फिर नियम सिर्फ किताब में हैं, और सत्ता फाइल में लिखी जाती है? बाकी…
क्रोनोलॉजी आप खुद समझदार हैं।
नारकोटिक्स संभाला और अफीम लहलहा गई –
प्रदेश में इस मौसम कुछ अलग ही फसल लहलहा रही है। कहीं खेत में नहीं, बल्कि सिस्टम में। इसकी शुरुआत दुर्ग से हुई, फिर बलरामपुर ने इशारा किया और अब रायगढ़ तक खुशबू पहुँच गई है। कहने वाले कह रहे हैं “ये खेती नहीं, सेटिंग है।” अब कहानी में एक किरदार और जोड़ लीजिए एक साहब है वर्दी वाले रैंक ऐसा कि नीचे वाले सलाम करें और ऊपर वाले नाम से पहचानें। कमिश्नर प्रणाली की दौड़ में ये साहब सबसे आगे थे। बताया जाता है कि “मेहनत” भी खूब की गई और मेहनत का मापदंड यहाँ किलो या लीटर में नहीं, खोखे में हुआ। तीन खोखे का प्रसाद चढ़ा मगर किस्मत को शायद ये सौदा मंजूर नहीं था। इसी बीच एक आवाज़ उठी। एक महिला सामने आई और आरोप ऐसे कि फाइल नहीं, हवा तक भारी हो गई। अब मामला संवेदनशील था, तो सिस्टम ने अपनी पुरानी आदत निभाई “दिखाओ कि कार्रवाई हो रही है।” साहब को अकादमी से उठाकर PHQ भेज दिया गया पुलिसिया भाषा में इसे लाइन अटैच कहते है। बाहर से लगा “वाह! सुशासन है, सिस्टम जाग रहा है।”लेकिन जो बगुले की चोंच में चला जाए, वो मछली वापस कब आई है? तीन खोखे का हिसाब कोई फाइल में नहीं मिलता उसका हिसाब पोस्टिंग में एडजस्ट होता है। तो पर्दे के पीछे एक और फाइल खुली और साहब से कहा गया, फिलहाल आप नारकोटिक्स देख लीजिए बस फिर क्या था जिस प्रदेश में अफीम की खबरें इक्का-दुक्का आती थीं, वहीं अब चारों ओर “हरी प्रगति” दिखाई देने लगी। दुर्ग , बलरामपुर , रायगढ़ , मानो नक्शे पर किसी ने पिन लगाकर कहा हो “यहाँ-यहाँ ध्यान देना है या शायद नहीं देना है।”अब आप इसे संयोग मान लीजिए, या सिस्टम की सटीक टाइमिंग लेकिन कहानी इतनी सी है जहाँ जिम्मेदारी दी जाती है, वहीं से अक्सर रास्ते भी निकलते हैं। और अंत में प्रदेश की जनता बस इतना समझ ले यह खेती खेतों में नहीं हो रही, यह फैसलों में उग रही है। बाकी…आप खुद क्रोनोलॉजी समझते हैं।
पढ़ाई अवकाश, और कसीनो का इन्वेस्टमेंट –
सिस्टम में इन दिनों एक और दिलचस्प किरदार चर्चा में है। एक शेख साहब हैं कागज़ों में “पढ़ाई-लिखाई” के लिए अवकाश पर हैं। नियमों को धता बताते हुए साहब ने पढ़ाई का रास्ता चुना जरूर है, लेकिन क्लासरूम कहाँ है और कंट्रोल रूम कहाँ ये समझना थोड़ा मुश्किल है। कहने को साहब यहीं राज्य में “अध्ययन अवकाश” पर हैं लेकिन सिस्टम की फाइलों की धड़कन अब भी इन्हीं की उंगलियों पर चलती है। क्योंकि बगुला चाहे कहीं भी खड़ा हो, चोंच वहीं मारता है जहाँ नजर होती है और साहब की नजर अब भी पूरे सिस्टम पर टिकी है। कई महीनों से साहब दिखाई नहीं दिए, तो खोज-खबर शुरू हुई। पता चला पढ़ाई कम, “सेटिंग” ज़्यादा चल रही है। कहानी काठमांडू तक जाती है। बताया जाता है कि वहाँ के कसीनो की चमक में साहब का बड़ा “इन्वेस्टमेंट” भी चमक रहा है। अब खेल छोटा तो है नहीं, तो इसे संभालने के लिए साहब ने अपने कुछ चंगू-मंगू भी पाल रखे हैं रैंक में आरक्षक, लेकिन असर में पूरे सिस्टम से ऊपर। न्याय की धानी में जब साहब थे, तभी ये “भरोसेमंद” बन गए थे। आज हालत ये है कि जिले के कप्तान भी इनसे दूरी बनाकर चलते हैं, और ये सीधे सिस्टम की नब्ज पकड़कर बैठे हैं। उधर साहब “अध्ययन अवकाश” में हैं इधर पूरा सिस्टम सेट है। अब चर्चा इसलिए तेज हुई क्योंकि खबर आई कि साहब काठमांडू में भी दिखे। कहने वाले कह रहे हैं ईद से पहले पशुपतिनाथ के दर्शन करने पहुँचे थे। बाकी कौन पढ़ाई कर रहा है, कौन निवेश संभाल रहा है, और कौन सिस्टम चला रहा है ये सब क्रोनोलॉजी है… इसी को समझना पड़ेगा।
आस्था, अनुमति और सच्चाई –
प्रदेश में धर्मांतरण पर नया कानून आ गया है जो कहता है जबरन, लालच या दबाव से धर्म बदलवाना अपराध है। कागज़ पर देखो तो बात सही भी लगती है। क्योंकि जमीनी सच्चाई ये भी है कि कुछ इलाकों में गरीबी, इलाज, पढ़ाई या शादी के नाम पर धर्म बदलने की शिकायतें रही हैं। यहाँ कानून सुरक्षा जैसा लगता है। लेकिन ग्राउंड की एक और सच्चाई भी है कई जगह लोग अपनी इच्छा से, अपनी आस्था से भी धर्म बदलते हैं। अब उन्हें पहले प्रशासन को बताना होगा इसके बाद फाइल बनेगी, जांच होगी। खेल यही शुरू होता है। क्योंकि गाँव में धर्म सिर्फ आस्था नहीं, पहचान और दबाव भी है। अगर कोई बदलना चाहे तो पहले समाज रोकेगा, फिर सिस्टम पूछेगा। सवाल सीधा है क्या ये कानून जबरन धर्मांतरण रोकेगा? यह दो धार वाली तलवार जैसा है अगर सही चला तो सुरक्षा गलत चला तो विवाद दरअसल असल फैसला कागज़ नहीं करेगा कलेक्टर की टेबल और थाने की भाषा तय करेगी। बाकी क्रोनोलॉजी आप खुद समझदार हैं।
384 फाइलें और एक अनुमति का इंतज़ार –
सुशासन के ढाई साल पूरे हो गए और ढाई सालों का हिसाब-किताब खोलो तो एक दिलचस्प आंकड़ा सामने आता है। 384 अफसर। जी हाँ इतने अधिकारी ऐसे हैं, जिन पर भ्रष्टाचार की शिकायत है। फाइलें बनीं शिकायतें दर्ज हुईं लेकिन कार्रवाई? वो अब भी इंतज़ार में है। और इंतज़ार किसका? अनुमति का। क्योंकि सिस्टम में एक नियम है 17 क जो कहता है कि जब तक विभाग खुद अनुमति नहीं देगा, जांच एजेंसी हाथ भी नहीं लगा सकती। अब ज़रा खेल समझिए जिस पर आरोप है, अनुमति भी उसी के विभाग से आएगी। मतलब दरवाज़ा भी वही खोलेगा, और ताला भी उसी के हाथ में है। सूची में छोटे-मोटे नाम नहीं हैं बड़े चेहरे हैं पूर्व मुख्यमंत्री से लेकर आईएएस, आईपीएस, आईएफएस तक और कई विभागों के अधिकारी भी , उधर ACB/EOW की फाइलें सजकर तैयार हैं इधर अनुमति की मुहर अटकी हुई है। तो सवाल सीधा है अगर जांच एजेंसी स्वतंत्र होकर काम ही नहीं कर सकती, तो उसका अस्तित्व किसलिए है? जांच के लिए या सिर्फ इंतज़ार के लिए? बाकी क्रोनोलॉजी आप खुद समझदार हैं।
डगमगाती कुर्सी, सपनों में मंत्री –
प्रदेश में इन दिनों मंत्रिमंडल से ज्यादा चर्चा कुर्सियों की किस्मत की हो रही है। उलटफेर की खबरें रोज उड़ती हैं लेकिन असली कुर्सी मुखिया की अब भी मंझधार में है। 2018 याद है? ढाई साल ढाई साल इधर फॉर्मूला चलता रहा, और पूरा कार्यकाल निकल गया। अब सुशासन में भी एक आदिवासी मुखिया की कुर्सी रोज डगमगाती दिखती है। मजे की बात ये है कई सीनियर चेहरे नजरें टिकाए बैठे हैं बस इशारे का इंतज़ार है। हर कोई अपने-अपने “राज्योदय” का सपना देख रहा है। एक साहब हैं जिन्हें एक मारवाड़ी ठेकेदार शुरू से ही मुंगेरी लाल के हसीन सपने दिखा रहा है। सपनों का हाल ये है कि मंत्री जी सपने देखते रहे और विभाग ठेके में बंट गया। और अब तो करोड़ों खर्च करके मंत्री जी की PR टीम भी खड़ी कर दी गई है। लेकिन जहाँ छवि बननी थी, वहाँ टिप्पणियाँ फिसल गईं। अश्लीलता, निजी वार, अभद्रता यह PR कम,परेशानी ज्यादा बन गई। उधर बीहड़ इलाके से एक और चेहरा तेजी से आगे बढ़ रहा था। लेकिन अचानक एक कहानी जुड़ गई। नाम और उसके साथ एक ड्रग क्वीन का साया। अब विपक्ष खुलकर मुस्कुरा रहा है, और तंज भी खुलकर चल रहा है। बताते हैं इसके पीछे एक पूरा सिंडिकेट लगा था, जिसका काम था नाम को लोकल से उठाकर नेशनल तक पहुंचाना। और इस खेल का संचालन एक बगुला कर रहा था। नतीजा? कांड खुल गया और अब साहब खुद को बचाते फिर रहे हैं। इधर सपनों वाले मंत्री जी हैं जो अब भी
मुंगेरी लाल की दुनिया में व्यस्त हैं और उधर संकट वाले मंत्री जी जो हकीकत से जूझ रहे हैं। तो सवाल वही कुर्सी बदलेगी? या फिर कहानी ऐसे ही चलेगी? कौन ऊपर जाएगा और किसका पत्ता कटेगा? संकेत साफ हैं एक कुर्सी डगमगा रही है और एक नाम धीरे-धीरे हटाया जा रहा है। बाकी…क्रोनोलॉजी आप खुद समझदार हैं।
यक्ष प्रश्न –
1 – जन से संपर्क रखने वाला साहब अचानक पी.एम. से संपर्क रखने में कैसे सफल हो गया?
2 – क्या मंत्रालय में होने वाले बड़े बदलाव वाकई वर्कलोड संतुलन के लिए हैं, या फिर यह डेपुटेशन, पसंद-नापसंद और अंदरखाने की सेटिंग का खेल है?










