बिना पेनिट्रेशन के केवल वीर्यपात होना नहीं माना जाएगा रेप, लेकिन रेप की कोशिश साबित करने के लिए है पर्याप्त

00 हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
बिलासपुर। बिना पेनिट्रेशन (प्रवेश) के केवल इजैक्युलेशन (वीर्यपात) होना रेप नहीं माना जाएगा। कानून के मुताबिक यह कृत्य रेप की कोशिश की श्रेणी में आएगा, न कि पूर्ण रेप के अपराध में। यह फैसला हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकल पीठ ने वासुदेव गोंड विरुद्ध छत्तीसगढ़ सरकार मामले में सुनाया। दोषी की ओर से अधिवक्ता राहिल अरुण कोचर और लीकेश कुमार पेश हुए, जबकि राज्य की ओर से अधिवक्ता मनीष कश्यप ने पैरवी की।
यह घटना वर्ष 2004 की है। धमतरी में ट्रायल कोर्ट ने 2005 में आरोपी को पीडि़ता की इच्छा के विरुद्ध शारीरिक संबंध बनाने का दोषी मानते हुए 7 साल की सजा सुनाई थी। लेकिन हाईकोर्ट में अपील के दौरान पीडि़ता ने जिरह में कहा कि आरोपी ने अपना निजी अंग उसकी योनि के ऊपर रखा था, परंतु अंदर प्रवेश नहीं किया था। अदालत ने अपने 16 फरवरी के फैसले में कहा कि रेप के अपराध के लिए पेनिट्रेशन आवश्यक है, इजैक्युलेशन नहीं। बिना पेनिट्रेशन के इजैक्युलेशन को रेप की कोशिश माना जाएगा, रेप नहीं। कोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत सजा के लिए हल्का पेनिट्रेशन भी पर्याप्त हो सकता है, लेकिन यह साबित करने के लिए ठोस और स्पष्ट साक्ष्य होना जरूरी है कि आरोपी के अंग का कोई हिस्सा महिला के जननांग के अंदर गया था।
मेडिकल जांच में पीडि़ता की हाइमन फटी हुई नहीं पाई गई। डॉक्टर ने कहा कि योनि में केवल उंगली का सिरा डाला जा सकता था, जिससे आंशिक पेनिट्रेशन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि मेडिकल साक्ष्य से रेप की पुष्टि नहीं होती। पीडि़ता के बयान में भी विरोधाभास था। एक चरण में उसने प्रवेश की बात कही, जबकि बाद में कहा कि आरोपी ने लगभग 10 मिनट तक निजी अंग ऊपर रखा था, पर प्रवेश नहीं किया। अदालत ने माना कि यह साक्ष्य रेप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है, लेकिन रेप की कोशिश साबित करने के लिए पर्याप्त है।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बदलते हुए आरोपी को रेप की जगह रेप की कोशिश का दोषी ठहराया। सजा घटाकर 3 साल 6 महीने कर दी गई। आरोपी को दो महीने के भीतर सरेंडर कर शेष सजा काटने का निर्देश दिया गया। अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी ट्रायल के दौरान 3 जून 2004 से 6 अप्रैल 2005 तक जेल में रहा था। बाद में 6 जुलाई 2005 को उसे जमानत मिली। उसे पहले काटी गई अवधि का लाभ दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 428 अथवा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 468 के तहत मिलेगा।

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