रौनक गोयल के कार्यकाल का मरवाही कैंपा फर्जीवाड़ा 14 लाख का खेल या ऊपर तक फैला सिस्टम? CCF बोले 14 लाख छोटी रकम, 4 साल बाद सिर्फ एक कर्मचारी सस्पेंड

रौनक गोयल के कार्यकाल का मरवाही कैंपा फर्जीवाड़ा 14 लाख का खेल या ऊपर तक फैला सिस्टम? CCF बोले 14 लाख छोटी रकम, 4 साल बाद सिर्फ एक कर्मचारी सस्पेंड

मरवाही : छत्तीसगढ़ के मरवाही वन मंडल में कैंपा मद से जुड़ी वित्तीय अनियमितता अब सिर्फ एक विभागीय कार्रवाई का मामला नहीं रह गई है। चार साल पुराने इस प्रकरण में आखिरकार सहायक ग्रेड-2 और कैंपा शाखा प्रभारी भूपेंद्र कुमार साहू को निलंबित कर दिया गया है, लेकिन पूरे मामले ने अब वन विभाग की supervisory व्यवस्था, वित्तीय अनुमोदन प्रक्रिया और तत्कालीन अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

विधानसभा तक गूंजा था मामला –
यह मामला कोई अचानक सामने आया खुलासा नहीं है। गोबर खाद खरीदी और कथित फर्जी प्रमाणकों का मुद्दा विधानसभा तक गूंज चुका है। विपक्ष के विधायक दलेश्वर साहू ने सदन में सवाल उठाते हुए आरोप लगाया था कि विभागीय अफसरों ने मंत्री को गलत जानकारी दी और सदन को गुमराह करने का प्रयास हुआ। विधानसभा में यह मामला इतना गरमाया था कि विधायक ने जांच रिपोर्ट सदन के पटल पर रखने की बात तक कह दी थी। उनका आरोप था कि बड़े अधिकारियों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि वन मंत्री केदार कश्यप बार-बार यही कहते रहे कि जांच प्रक्रिया अधीन है और दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी।

वन मंत्री ने सदन में स्पष्ट कहा था जो भी दोषी होगा, उसे बख्शा नहीं जाएगा। मामले में तीन सदस्यीय जांच टीम गठित की गई है। मामले की जांच के लिए बिलासपुर वृत्त के CCF द्वारा तीन सदस्यीय जांच टीम गठित की गई थी। इसमें वनमंडलाधिकारी कटघोरा कुमार निशांत (IFS), उपवनमंडलाधिकारी पाली , एवं हितेश ठाकुर, सहित अन्य अधिकारियों को शामिल किया गया था। जांच के बाद जो तथ्य सामने आए, उन्होंने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया।

आखिर खेल क्या था?
विभागीय दस्तावेजों के मुताबिक वर्ष 2022 में मरवाही वनमंडल में गोबर खाद खरीदी के नाम पर फर्जी प्रमाणक तैयार किए गए। आरोप है कि तत्कालीन SDO रविंद्र निराला के नाम से फर्जी हस्ताक्षर किए गए, फर्जी डिस्पैच नंबर डालकर प्रपत्र-3 तैयार किया गया और उसी आधार पर राशि आहरण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।

मामले में यह भी आरोप है कि तत्कालीन DFO रौनक गोयल के कार्यकाल में नियमों के विपरीत वन प्रबंधन समितियों के खातों से राशि आहरित कराई गई। और विभाग के कुछ चहेते कर्मचारियों जिनमें समिति सचिव और वन चौकीदार स्तर के नाम भी चर्चा में हैं को वित्तीय अधिकार देकर राशि निकलवाई गई।

क्या एक ग्रेड-2 कर्मचारी अकेले यह सब कर सकता है?

यही वह सवाल है जो अब पूरे वन विभाग में चर्चा का विषय बना हुआ है। जबकिं विभागीय आदेश में लिखा गया है कि वनमंडलाधिकारी (DFO) को अंधकार में रखकर एलओसी तैयार कराई गई। लेकिन क्या 2020 बैच का एक IFS अधिकारी, जो उस समय DFO पद पर पदस्थ था, उसे एक सहायक ग्रेड-2 कर्मचारी अकेले अंधकार में रख सकता है?

क्योंकि एलओसी, प्रमाणन, वित्तीय स्वीकृति,
समिति खाते से आहरण, और भुगतान प्रक्रिया
एक बहुस्तरीय प्रशासनिक तंत्र से गुजरती है। ऐसे में supervisory accountability पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

नियम क्या कहते हैं?
नियमतः गोबर खरीदी जैसी प्रक्रिया टेंडर के माध्यम से होनी चाहिए थी। लेकिन यहां वन प्रबंधन समितियों के माध्यम से सप्लाई दिखाई गई। जबकि वन प्रबंधन समितियों का मूल उद्देश्य सुरक्षा और संरक्षण गतिविधियां हैं, न कि व्यावसायिक खरीदी प्रक्रिया। यानी अब सवाल सिर्फ फर्जी हस्ताक्षरों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी procurement process पर उठ रहे हैं।

14 लाख छोटी रकम है बयान से बढ़ी चर्चा –
जब इस मामले में CCF से पूछा गया कि क्या SDO और DFO स्तर की जवाबदेही भी तय होगी, तो उन्होंने प्रारंभिक बातचीत में कहा कि 14 लाख बहुत बड़ी रकम नहीं है, यह छोटी राशि है। लेकिन प्रशासनिक हलकों में अब चर्चा यही है कि रकम छोटी हो सकती है, लेकिन अगर फर्जी प्रमाणक, कूटरचना, फर्जी डिस्पैच नंबर और नियम विरुद्ध आहरण हुआ, तो जिम्मेदारी सिर्फ एक कर्मचारी पर कैसे तय हो सकती है? क्या बड़े अधिकारियों को बचाया गया? अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है। क्योंकि मामला विधानसभा तक पहुंचा, तीन सदस्यीय जांच टीम बनी, जांच में फर्जी दस्तावेज और नियम विरुद्ध भुगतान की बात सामने आई, और फिर चार साल बाद कार्रवाई सिर्फ एक सहायक ग्रेड-2 कर्मचारी तक सीमित रह गई।

ऐसे में वन विभाग और प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज है कि क्या बड़े अधिकारियों को बचाने का प्रयास हुआ? फिलहाल भूपेंद्र साहू निलंबित हैं। लेकिन सवाल अब भी वहीं खड़ा है कि क्या जांच approval chain तक जाएगी? क्या तत्कालीन supervisory अधिकारियों की भूमिका तय होगी? या फिर पूरा मामला एक निलंबन के साथ फाइलों में शांत कर दिया जाएगा? मरवाही से निकला यह मामला अब सिर्फ 14.77 लाख रुपये का नहीं रह गया है। यह उस सिस्टम की परीक्षा बन गया है जहाँ फाइलों में दर्ज अंधकार अब कई स्तरों की जवाबदेही पर रोशनी डाल रहा है।

गौरतलब है कि तत्कालीन DFO रौनक गोयल वर्तमान में कांकेर में पदस्थ हैं और वे 2020 बैच के IFS अधिकारी बताए जाते हैं। 

इसकी अगली कड़ी जल्दी लाएंगे। 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *