अफ़सर-ए-आ’ला (हर रविवार को सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(हर रविवार को सुशांत की कलम से)

कमरा नंबर 201 –
रायपुर में कमरों के किस्से कम नहीं हैं, लेकिन इस बार चर्चा दिल्ली तक पहुँच गई है। राजधानी की राजनीति की दौड़ कभी-कभी इतनी लंबी होती है कि उसकी परछाईं सीधे दिल्ली के गलियारों में दिखने लगती है। दिल्ली स्थित एक सरकारी सदन में कमरा नंबर 201 इन दिनों खूब चर्चा में है। वैसे तो ऐसे कमरे बड़े वीवीआईपी मेहमानों के लिए सुरक्षित रखे जाते हैं, लेकिन गलियारों में कहा जा रहा है कि यह कमरा लंबे समय से किसी एक खास मेहमान के लिए ही आरक्षित रहता है। बताने वाले बताते हैं कि यहाँ कोई सरकारी बैठक या नीति-योजना की चर्चा नहीं होती। उल्टा लोग मज़ाक में इसे “नशा मुक्ति केंद्र” कहने लगे हैं। फर्क बस इतना है कि जहाँ असली नशा मुक्ति केंद्र में लोग नशा छोड़ने जाते हैं, यहाँ चर्चा है कि लोग नशे के साथ वक्त बिताने आते हैं। दिलचस्प यह भी है कि ऐसे कमरों में रजिस्टर से ज्यादा पहचान चलती है। एंट्री किताबों में कम और दरवाज़ों से ज्यादा होती है। रायपुर के कई सितारा होटलों के कमरों के भी अपने-अपने राज होते हैं, मगर वहाँ कम से कम नाम दर्ज होता है। यहाँ तो बस दरवाज़ा खुलता है और कहानी अंदर ही रह जाती है। कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि उस कमरे में अक्सर एक बड़े वीवीआईपी का वारिस दिखाई देता है। सच क्या है, यह तो वही कमरा जानता है, लेकिन दिल्ली के उस सदन में कमरा नंबर 201 इन दिनों किसी बैठक कक्ष से ज्यादा फुसफुसाहटों और रहस्यों का पता बन गया है। आखिर हर कमरे की अपनी कहानी होती है… और दिल्ली के उस सदन में कमरा नंबर 201 की कहानी इन दिनों सबसे ज्यादा सुनाई दे रही है।

मंज़िलों की मेहरबानी –
राजधानी की एक इमारत इन दिनों फिर चर्चा में है। वजह कोई नई योजना नहीं, बल्कि तरक्की की एक लिफ्ट है, जो कुछ लोगों को अचानक ऊँची मंज़िल तक पहुँचा देती है।
हाल ही में दो पुराने चेहरे एक सरकारी आदेश के बाद नई पहचान के साथ सामने आए। फाइलों में सब कुछ नियम और चयन सूची के तहत बताया गया है, लेकिन सचिवालय के गलियारों में कहानी कुछ और ही सुनाई देती है।
बताया जाता है कि दोनों कभी पहली मंज़िल के बेहद करीबी रहे और लंबे समय तक वहीं के खास सहयोगी की भूमिका में दिखते रहे। दिलचस्प यह भी है कि इसी दौरान एक ‘एलाइड’ नाम की खेल संस्था में भी दोनों की सक्रियता और जिम्मेदारियाँ बढ़ती चली गईं। अब जब तरक्की का आदेश आया, तो लोग मुस्कुराकर कह रहे हैं पहली मंज़िल की मेहरबानी और पाँचवीं मंज़िल की सहमति हो, तो सीढ़ियाँ चढ़ना मुश्किल नहीं रहता। इसी बीच गलियारों में एक और फुसफुसाहट भी घूम रही है कि इस कहानी में कहीं ‘पाँच खोखे’ की चर्चा भी दबे स्वर में हो रही है। सच क्या है, यह तो फाइलें ही जानती हैं, लेकिन सवाल वही पुराना है तरक्की की असली सीढ़ी योग्यता है या मंज़िलों की सिफारिश।

मोहब्बत का संगठनात्मक विस्तार –
राजनीति के गलियारों में कहते हैं कि सत्ता कई काम करवा देती है, लेकिन मोहब्बत उससे भी बड़े-बड़े फैसले करवा देती है। और जब यह मोहब्बत संगठन की सीढ़ियों से गुजरने लगे, तो कहानी और दिलचस्प हो जाती है। कहते हैं कि एक बड़े संगठन के नेताजी का दिल एक मेडम पर आ गया। अब दिल का मामला था, इसलिए फाइलें भी उसी रफ्तार से चलने लगीं। सबसे पहले कोशिश हुई कि मेडम को राजनीति में एक मंच मिल जाए। सो पार्षद का टिकट दिला दिया गया। इस पूरे अभियान में एक और नेता जी भी खास भूमिका निभाते रहे, जो मेडम को लेकर बड़े नेताजी तक पहुँच बनाने का जिम्मा संभालते थे। मोहब्बत की राहें जब खुलती हैं तो मंज़िलें भी जल्दी मिल जाती हैं। बताते हैं कि मेडम का कोई बड़ा राजनीतिक अनुभव या संगठनात्मक योगदान नहीं था, लेकिन नेताजी की मेहरबानी से उन्हें सीधे एमआईसी की कुर्सी तक पहुँचा दिया गया। जब यह फैसला सामने आया तो शहर की राजनीति में थोड़ा शोर जरूर हुआ। कुछ लोगों ने सवाल भी उठाए कि इतनी बड़ी जिम्मेदारी आखिर किस आधार पर मिल गई। मगर सत्ता के गलियारों में ऐसे सवाल अक्सर थोड़ी देर ही गूंजते हैं, फिर धीरे-धीरे खामोशी में बदल जाते हैं।

पद, पैसा और पुरानी आशिकी –
राजधानी की राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प किस्सा घूम रहा है। कहते हैं कि किस्मत जब मेहरबान हो जाए तो इंसान सीधे भीड़ से उठकर सत्ता के गलियारे में पहुँच जाता है। ऐसा ही कुछ एक साहेब के साथ हुआ। पहली बार किस्मत ने साथ दिया, टिकट मिला और देखते-देखते कुर्सी ऐसी मिली कि विभाग की जमीन मानो सोना उगलने लगी। लेकिन सत्ता की इस चमक के बीच साहेब को पुरानी आशिकी भी याद आ गई। कहते हैं, पुराने प्यार की फाइलें कभी बंद नहीं होतीं, बस मौका मिलते ही फिर खुल जाती हैं। साहेब ने अपने उस पुराने एहसास को पहले राजनीति की राह दिखाने की ठानी। पंचायत चुनाव का मैदान सजाया गया, पानी की तरह पैसा बहा, लेकिन किस्मत इस बार साथ नहीं आई। मेमसाहब चुनाव हार गईं। फिर कोशिश हुई कि किसी आयोग-मंडल की कुर्सी मिल जाए, मगर वह दरवाज़ा भी नहीं खुला। इधर मेमसाहब का जज्बा भी कम नहीं था। बताते हैं कि वे करीब सौ किलोमीटर दूर से राजधानी तक आती-जाती रहीं। यह मेहनत देखकर साहेब का दिल पिघल गया। फिर एक दिन फाइल आई, कलम चली और राजधानी की वीआईपी रोड पर मॉल के पास एक शानदार बंगले की चाबी मेमसाहब के नाम सिग्नेचर हो गई। कहते हैं कि साहेब उम्र में भले थोड़ा आगे निकल चुके हों, लेकिन मेमसाहब की मौजूदगी उन्हें फिर से जवानी के दिनों में ले जाती है। इसलिए जमीन से जुड़े इस मंत्री जी ने अपने पुराने एहसास के लिए वीआईपी रोड तक कालीन बिछा दी।

प्रभारी का राज –
बिलासपुर की सड़क पर हुई एक घटना ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है आखिर पुलिस की कमान संभाल कौन रहा है? पार्किंग विवाद में बीच सड़क पर एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के बेटे से मारपीट हो जाती है और शहर में हड़कंप मच जाता है। लोग पूछ रहे हैं, अगर यह हाल है तो आम आदमी किस भरोसे रहे? वैसे भी इन दिनों प्रदेश में कानून व्यवस्था पर सवाल कम नहीं हैं। कहीं अफीम की खेती की चर्चा है,कहीं सूखे नशे का कारोबार, तो शहरों में चाकूबाजी की खबरें आम हो गई हैं। ऊपर से कागज़ बताते हैं कि सिर्फ गाड़ियों के किराये, ईंधन और मरम्मत पर 350 करोड़ रुपये खर्च हो गए। उधर बस्तर के धुर इलाके में पत्रकारिता करने वाले एक पत्रकार को जेल भेज दिया गया और उसके परिवार तक पर एफआईआर हो गई। कई लोग कहते हैं कि यहाँ कई बार पीड़ित ही आरोपी बन जाता है। दिलचस्प यह है कि प्रदेश की पुलिस अभी प्रभारी व्यवस्था में चल रही है। साहेब अपनी ईमानदारी के किस्से जरूर सुनाते हैं, मगर जनता पूछ रही है अगर कुर्सी ही नहीं संभल रही, तो ऐसी ईमानदारी किस काम की? इसीलिए अब गलियारों में चुटकी ली जा रही है जब कुर्सी प्रभारी हो, तो कानून भी शायद प्रभारी ही रह जाता है।

सवाल विधायक पूछे, जवाब कौन लिखे?
विधानसभा लोकतंत्र का मंदिर कही जाती है। जनता अपने प्रतिनिधि चुनकर भेजती है ताकि वे सवाल पूछें और सरकार को कठघरे में खड़ा करें। लेकिन राजधानी के गलियारों में इन दिनों एक अलग ही मज़ाक चल रहा है सवाल भले विधायक पूछते हों, जवाब कहीं और तैयार होता है। सदन में जब कोई सदस्य खड़ा होकर पूछता है कि अपराध क्यों बढ़ रहा है, अफीम की खेती कैसे फैल रही है और ऐसे तमाम सवाल उठाता है, तो जनता को लगता है कि अब मंत्री जवाब देंगे। पर जानकार मुस्कुरा देते हैं। उन्हें पता है कि जवाब का मसौदा अक्सर वहाँ बनता है जहाँ जनता की नज़र नहीं जाती। कहते हैं, कई मंत्री तो सदन में वही पढ़ते हैं जो फाइल में रख दिया गया। भाषा ऐसी कि जवाब भी हो जाए और जिम्मेदारी भी न फँसे। यही वजह है कि सदन के बाहर लोग चुटकी लेते हैं विधानसभा में आवाज़ जनता की गूंजती है, लेकिन वाक्य व्यवस्था के लिखे हुए होते हैं।

फाइल दिल्ली जाए न जाए –
राजधानी में इन दिनों एक नया प्रशासनिक मुहावरा खूब चल रहा है फाइल दिल्ली जाए न जाए, कुछ खास दरवाज़ों तक जरूर जाती है। कहा जाता है कि हर बड़े फैसले का अपना तीर्थ होता है। कोई पोस्टिंग हो, कोई कार्रवाई हो, कोई राहत हो कागज़ पर चाहे जितनी मंज़िलें लिखी हों, असली परिक्रमा कुछ चुनिंदा चौखटों की ही होती है। गलियारों में चर्चा है कि पुलिस महकमे का हाउस इन दिनों एक बगुले की नज़र में चलता है वही ऊपर से शांत, भीतर से सजग और मौके पर चोंच मारने में माहिर खिलाड़ी है। उधर प्रशासनिक दुनिया में भी एक छोटी कद-काठी वाले साहेब का असर ऐसा बताया जाता है कि फाइलें पैरों से कम, इशारों से ज़्यादा चलती हैं। अब सच क्या है, यह फाइलें जानें और मंज़िलें समझें, लेकिन नीचे बैठे अफसरों की भाषा में एक बात बार-बार सुनाई देती है कागज़ नियम से चलता है, पर फैसला रिश्ते से। इसीलिए राजधानी में अब मज़ाक चलता है दिल्ली दूर है, लेकिन बगुलों और छोटे कद-काठी वालों के दरबार बहुत पास हैं।

यक्ष प्रश्न –

1 – उस कुख्यात अफसर का नाम क्या है, जिसके खिलाफ एक साथ 10 ध्यानाकर्षण लगे, लेकिन एक भी स्वीकार नहीं हुआ आखिर ऑफर कितना बड़ा था?

2 – पिछले हफ्ते यूपीएससी से पत्र आया छत्तीसगढ़ का डीजीपी कौन? क्या कोई बड़ा फेरबदल होने वाला है?

3 – जून 2024 के बाद शराब की “वसूली” की चर्चा क्यों थम गई अब यह काम आखिर कर कौन रहा है?

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