अफ़सर-ए-आ’ला (हर रविवार को सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(हर रविवार को सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला के एक साल –
आज अफसर ए आला को लिखते हुए पूरा एक साल हो गया। इसकी शुरुआत एक छोटे से विचार से हुई थी, और आज यह भरोसे की आवाज़ बन चुका है। आप पाठकों ने जिस अपनापन और विश्वास से इसे स्वीकार किया, वही इसकी असली ताकत है। हर रविवार का इंतज़ार अब सिर्फ एक लेख का नहीं, संवाद का होता है। यह मंच बना सवालों का, जवाबदेही का, और सच को सामने लाने का।
ब्यूरोक्रेसी की परतों को समझना आसान नहीं होता, मगर हमने कोशिश जारी रखी। फाइलों की धूल से लेकर फैसलों की दिशा तक, हर पहलू पर रोशनी डाली गई। जहाँ जनता उलझी, वहाँ आवाज़ उठी जहाँ व्यवस्था चुप थी, वहाँ सवाल खड़े हुए। कई मुद्दों पर कार्रवाई हुई, कई जगह हलचल मची, और कई बंद दरवाज़े खुले। यह कॉलम सिर्फ खबर नहीं, जिम्मेदारी का आईना बन गया। पाठकों की संख्या लाखों में पहुँचना सिर्फ आंकड़ा नहीं, भरोसे की मुहर है। आपकी प्रतिक्रियाएँ, सुझाव और सराहना हर सप्ताह ऊर्जा देती रही। हमने कोशिश की कि आलोचना हो तो तथ्यों के साथ, और प्रशंसा हो तो संतुलन के साथ। सत्ता और सिस्टम के बीच खड़ी आम जनता की आवाज़ को केंद्र में रखा गया। इस सफर में कई सच सामने आए, कई कहानियाँ बदलाव की बनीं। अफसर ए आला ने दिखाया कि कलम जब ईमानदार हो, तो असर ज़रूर होता है। एक साल में यह सिर्फ कॉलम नहीं, एक भरोसेमंद परंपरा बन चुका है। आगे का रास्ता और भी जिम्मेदारियों से भरा है, और हम तैयार हैं। आपका साथ रहा तो यह सफर और लंबा, और मजबूत होगा। धन्यवाद इस एक साल को मायने देने के लिए।

69 करोड़ का खेल –
जनसंपर्क विभाग से जुड़े उपलब्ध दस्तावेज़ों में दर्ज अलग-अलग भुगतानों को जोड़ने पर एक बड़ा कुल आंकड़ा सामने आता है। दस्तावेज़ों के अनुसार Banyan Infomedia Pvt. Ltd. को दो अवधियों में मिला कुल भुगतान ₹3.11 करोड़ , JVD Films से जुड़ा भुगतान ₹4.38 करोड़ , Vinayak Advertising को किया गया भुगतान ₹43.11 करोड़ समेत विभिन्न टीवी न्यूज़ चैनलों को किया गया कुल भुगतान (ग्रैंड टोटल शीट अनुसार) ₹18.57 करोड़ इन सभी प्रमुख मदों को जोड़ने पर कुल राशि लगभग ₹69.18 करोड़ , यानी लगभग 69 करोड़ रुपये का सरकारी विज्ञापन व्यय इन दस्तावेज़ों में दर्ज दिखता है। सवाल रकम होने या न होने का नहीं, बल्कि प्रक्रिया की पारदर्शिता का है। और सवाल यह भी है कि किस आधार पर चयन हुआ? किस प्लेटफ़ॉर्म की पहुँच कितनी थी? क्या ऑडिट और प्रभाव मूल्यांकन हुआ? दस्तावेज़ सिर्फ आंकड़े बताते हैं अब ज़रूरत है कि व्यवस्था इन आंकड़ों के पीछे की पूरी प्रक्रिया भी साफ़ करे, ताकि जनता का भरोसा कागज़ों पर नहीं, व्यवस्था पर टिके।

डिजिटल धक्का
सरकार ने घोषणा की व्यवस्था बदल गई है।
राजपत्र छप गया, नियम नया हो गया, प्रक्रिया आधुनिक हो गई। सुनने में लगा जैसे जमीन डायवर्सन अब मोबाइल की एक क्लिक पर हो जाएगा। लेकिन जनता ने जब क्लिक करना चाहा… तो स्क्रीन पर सन्नाटा मिला। कागज़ पर डिजिटल क्रांति उतर आई, ज़मीन पर सर्वर अभी पैदा ही नहीं हुआ। न पोर्टल, न सॉफ्टवेयर, न आवेदन की खिड़की बस आदेश है, और इंतज़ार है। पहले लोग एसडीएम दफ्तर के चक्कर काटते थे, अब वे इंटरनेट के अदृश्य दफ्तर के बाहर लाइन में खड़े हैं। फर्क सिर्फ इतना आया है कि पहले बाबू कहते थे कल आना, अब सिस्टम कह रहा है जल्द शुरू होगा। कोई गांव में मकान बनाना चाहता है,
शहर में कोई दुकान खोलना चाहता है, किसी का बैंक लोन अटका है, किसी की रजिस्ट्री रुकी है डिजिटल सुधार ने सबको बराबरी से रोक दिया है। सवाल ये नहीं कि ऑनलाइन सिस्टम क्यों आया, सवाल ये है कि सिस्टम आया कहाँ है? पहले सॉफ्टवेयर बनना चाहिए था, फिर पुराना रास्ता बंद होना चाहिए था। यहाँ पहले पुल तोड़ दिया गया, फिर घोषणा हुई नया पुल जल्द बनेगा। विभाग कहता है, सॉफ्टवेयर ट्रायल मोड में है। जनता पूछ रही है हमारा धैर्य किस मोड में है? जब तक सिस्टम टेस्ट हो रहा है, तब तक लोगों के सपने पेंडिंग में पड़े हैं। डिजिटल सुधार बुरा नहीं होता, लेकिन बिना तैयारी के किया गया सुधार सुधार कम, प्रयोग ज्यादा लगता है और प्रयोगशाला बनती है जनता की ज़िंदगी। अब असली सवाल यही है क्या व्यवस्था सच में आधुनिक हुई है, या सिर्फ़ समस्या ऑफलाइन से ऑनलाइन कर दी गई है?

नशे पर नोटिस
कमिश्नर प्रणाली लागू होने के बाद रायपुर में जारी यह पहला बड़ा आदेश है और विषय है नशे से जुड़ी गतिविधियाँ। आदेश में उन सामग्रियों की बिक्री पर रोक की बात कही गई है, जिनका उपयोग नशे के सेवन में किया जा सकता है। कागज़ पर यह सख्ती दिखती है, लेकिन असली सवाल इससे आगे शुरू होता है। अगर शहर में गांजा, चरस या अन्य मादक पदार्थों का सेवन बढ़ रहा है, तो क्या सिर्फ़ सेवन के साधन रोक देने से समस्या खत्म हो जाएगी? नशा वहाँ पनपता है जहाँ सप्लाई मौजूद होती है, सिर्फ़ उपयोग की सामग्री पर रोक लगाना इलाज नहीं, लक्षणों पर पट्टी है।
यह वैसा ही है जैसे शराबखोरी रोकने के नाम पर गिलासों की बिक्री बंद कर दी जाए, लेकिन अवैध शराब की सप्लाई पर सख्त कार्रवाई न हो। मुद्दा साधनों का नहीं, स्रोत का है और स्रोत पर चोट किए बिना हर कार्रवाई अधूरी है। यह आदेश अस्थायी रूप से लागू किया गया है। यहीं से अगला सवाल उठता है यदि समस्या गंभीर है, तो समाधान अस्थायी क्यों? क्या नशे की चुनौती समयबद्ध नोटिस से खत्म हो सकती है? आदेश में यह भी उल्लेख है कि इसे बीच में वापस लिया जा सकता है। यानी सख्ती की अवधि भी स्थिर नहीं है। ऐसे में संदेश क्या जाता है दीर्घकालिक नीति या तात्कालिक प्रतिक्रिया? रायपुर ही नहीं, पूरा प्रदेश नशे की समस्या से जूझ रहा है। युवा पीढ़ी इसकी चपेट में है, परिवारों पर असर है, अपराध की परछाईं लंबी हो रही है। ऐसे में अपेक्षा थी कि कमिश्नर प्रणाली की शुरुआत ही सप्लाई नेटवर्क, तस्करी चैन और अवैध कारोबार पर सीधी कार्रवाई से होती। प्रशासनिक आदेश जरूरी हैं, पर असली बदलाव तब दिखता है जब कार्रवाई जड़ पर हो। नशे के खिलाफ जंग कागज़ से नहीं, ज़मीन पर जीती जाती है।

सवालों का साया –
सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं ने फिर से व्यवस्था की जवाबदेही पर बहस छेड़ दी है। मामला एक बड़े राष्ट्रीय परीक्षा विवाद से जुड़ी पुरानी आशंकाओं और उसके बाद के प्रशासनिक फैसलों का है। ऐसे मामलों में सबसे बड़ा नुकसान छात्रों का होता है, जिनका भविष्य सीधे दांव पर लग जाता है। देश उम्मीद करता है कि जांच निष्पक्ष हो, जिम्मेदारी तय हो और सुधार साफ दिखाई दें। लेकिन बहस तब गहरी होती है जब विवादों में आए नाम बाद में अहम पदों पर नजर आते हैं। और सबसे बड़ा सवाल यहीं आकर ठहर जाता है यदि किसी अधिकारी का नाम कभी परीक्षा गड़बड़ी के आरोपों के संदर्भ में चर्चा में आया हो, और बाद में वही अधिकारी हाउस में बैठकर बड़ी जिम्मेदारी संभालते दिखें, तो आम लोगों के मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है। क्या यह निर्णय पूरी जांच और तथ्यों की समीक्षा के बाद लिया गया था? या समय बीतने के साथ विवाद को अप्रासंगिक मान लिया गया? जनता जानना चाहती है कि छात्रों के भविष्य से जुड़े मामलों में जवाबदेही कहाँ तक जाती है। यदि आरोप निराधार थे, तो स्पष्ट आधिकारिक सफाई सामने क्यों नहीं आई? और अगर सवाल वाजिब थे, तो वही नाम बड़ी जिम्मेदारियों में क्यों दिखते हैं? विश्वास केवल नियुक्तियों से नहीं, बल्कि उन नियुक्तियों के पीछे की पारदर्शिता से बनता है। प्रणाली तब मजबूत मानी जाती है जब वह फैसलों के साथ उनकी प्रक्रिया भी सार्वजनिक करे। परीक्षा देने वाला छात्र राजनीति नहीं समझता, वह सिर्फ निष्पक्ष परिणाम चाहता है। सवाल पूछना समाज का हक है, और जवाब देना व्यवस्था की जिम्मेदारी।

यक्ष प्रश्न

1 – 5 फरवरी को प्रभारी डीजीपी का एक साल पूरा होने जा रहा है। कृपा आख़िर कहाँ अटक गई है?

2 – वन प्रमुख इन दिनों किस जोड़-तोड़ में व्यस्त हैं? चर्चा तो यहाँ तक है कि पश्चिम बंगाल तक चढ़ावा पहुँचाया गया सच क्या है?

 

 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *